देश का व्यापक हित का सोचने वाले अपना व्यक्तिगत हानि लाभ नहीं देखते. शायद इसी दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने देश की शतप्रतिशत आबादी को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाला निर्णय लिया. मंशा व्यक्त की कि इससे काली कमायी के धनकुबेर बर्बाद होंगे. आतंकवादियों की रीढ़ टूटेगी. नकली करेंसी, जो कि कुल प्रचलित करेंसी का कोई बीस प्रतिशत तक पहुंच गई, बताई जाती थी, का चलन एकदम ठप हो जायेगा आदि. इन सबसे दीर्घकाल में देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा सुधार आयेगा. गंदगी से लिप्त होती जा रही और दिन प्रतिदिन बदनाम हो रही राजनीति साफ-सुथरी होगी. ऐसे लुभावने वादे प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री सहित मौजूदा केन्द्र सरकार के मंत्रियों, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनके प्रवक्ताओं की तरफ से किये जा रहे हैं. यदि ऐसा हो जाय तो तमाम परेशानियों के बावजूद प्रधान मंत्री के निर्णय का समर्थन है. साथ ही इस शर्त के साथ स्वागत है कि निर्णय से परेशान हो गए अधिकांश देशवासियों की दिक्कते जल्द से जल्द दूर हो जाएंगी. फिलहाल ज्यादातर देशवासियों ने राष्ट्रहित के मद्देनजर आर्थिक आपातकाल जैसे विकराल हालातों के बावजूद भी निर्णय को सराहा है. लोगों की दिक्कत के बारे में मोदी जी ने स्वीकार किया है कि इसे पेन (दर्द) है पर गेन (उपलब्धि) ज्यादा है. 

प्रधानमंत्री द्वारा हजार और पांच सौ की करेंसी अचानक बंद करने की घोषणा को एक और सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है. यह निर्णय होने के लगभग दो दिन तक सब के सब हक्के बक्के थे. बहुत अधिक साइड इफेक्ट भी नजर नहीं आ रहा था. बात-बात में सरकार की आलोचना करने वाले विरोधी दल तथा कदम-कदम पर प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसने वाले राजनीतिज्ञ हतप्रभ से रह गये. केवल बिहार के मुख्यमंत्री नीतेश कुमार ने पहले ही दिन नोट बंदी का समर्थन किया. शेष ने चुप्पी साध ली. राजनीतिज्ञ लाभ-हानि का गुणा भाग करने में जुट गये. हाथी के पेट में भरी माया तथा नाते रिश्तेदार, सगे संबंधियों को राजनीति के व्यवसाय में उतार कर देश के बडे़ प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाये राजनीतिक घराने सदमें में आ गये. कांग्रेस ने भी शुरू के दो दिन निर्णय का समर्थन करती सी दिखने वाली आंशिक आलोचना की. राजनीतिक दलों ने जब देखा कि बैंकों तथा एटीएम में लंबी कतारें लगी हैं, आम जनजीवन को पैसे की दिक्कत होने लगी है तब आलोचना के स्वर तीव्र किये. सबसे पहले कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मैदान में आये. लाइन में लगकर बैंक से चार हजार रूपये लिये. जिस उद्देश्य से उन्होंने यह किया मीडिया के सामने उसकी पूर्ति की. आम जनता की परेशानी का हवाला देते हुए सरकार को जमकर कोसा. इसके बाद मुलायम सिंह, मायावती, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल भी शुरू हो गए. इनमें बहुतों का कहना था कि नोट बंद करने से पहले समय दिया जाना चाहिए था. मन्तव्य स्पष्ट है कि बैंकों के स्ट्रांग रूम से भी कई गुना बड़े कमरों में भरे बड़े नोटों को चलाने के लिए समय चाहते थे. 

काला धन जिस गति से बढ़ रहा था उस पर प्रभावी अंकुश के लिए ऐसा ही कठोर कदम उठाने की जरूरत थी. पिछले सात दसकों में स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार, कालेधन, स्विस बैंकों में जमा काली कमाई, हवाला कारोबार आदि के बारे में बढ़ चढ़ कर बतोलीबाजी करने वालों की संख्या बहुत बड़ी है पर रोकने के लिए ठोस कदम किसी ने भी नहीं उठाये. नतीजा भ्रष्टाचार का तांडव दिनों दिन बढ़ता गया. कालेधन के कुबेरों के पास कितनी अकूत सम्पत्ति जमा हो गई इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. पिछले दो ढाई साल में मोदी सरकार ने जरूर देश की इन विकराल समस्याओं पर कई कारगर कदम उठाये. बेनामी सम्पत्ति के विरूद्ध कानून बनाया. काला धन उजागर करने वालों को समय भी दिया. इसी क्रम में सबसे बड़ा, कठोर और प्रभावी कदम हजार-पांच सौ के नोट बंद करने का है. प्रधानमंत्री ने कहा है कि कालेधन पर आगे और भी सख्ती होगी. 

नोट बंदी के बाद देश के घर-घर में मची अफरा-तफरी, बैंकों, एटीएम के सामने कतार में खड़े बुजुर्गों, महिलाओं तथा अपना काम धंधा छोड़कर सुबह से लेकर शाम तक खडे़ लोगों को देखकर यह अवश्य महसूस होता है कि समुचित तैयारियां किये बगैर प्रधानमंत्री ने अपने स्वभाव के अनुरूप अप्रत्याशित घोषणा कर दी. देश में प्रचलित 86 प्रतिशत करेंसी का चलन एकदम बंद हो जाने से आम आदमी के प्रायः सभी परिवारों दिक्कत हुयी. निजी अस्पतालों ने बगैर पैसा मिले इलाज से इंकार कर दिया. अनेक घरों  सब्जी-भाजी, दाल-रोटी तक की समस्या खड़ी हो गई. किसानों को खाद-बीज नहीं मिला. शहरों में लगी कतारों को देशवासियों ने मीडिया में देखा पर उन ग्रामीणों की समस्या तो और विकराल हो गयी जिनके ग्रामों से बैंक, एटीएम कोसों दूर हैं. बहरहाल परेशानियों का सिलसिला शुरू के चार-पांच दिरन अधिक था. अब बैंकों, एटीएम में पर्याप्त न सही, काम चलाने लायक नयी मुद्रा आ गयी है. 

नोट बंदी के साथ कई प्रश्न उठने लगे है. यदि हजार-पांच सौ के जाली नोट छप सकते हैं तो दो हजार के क्यों नहीं छप सकते. चार दिन बाद अब पांच सौ का भी नया नोट आ गया है. इसी तरह दो हजार का तुलनात्मक दुबला-पतला, छोटा नोट क्या काला बाजारी और संग्रह करने वालों को अधिक सहूलियत नहीं देगा. पैसा लेकर अवैध कार्य करने वालों की संख्या बहुत बड़ी है. वैध काम करने के लिए भी मांग की जाती है. ऐसा करने वालों को क्या बड़ा नोट लेने में अधिक सुविधा नहीं होगी. तात्पर्य यह कहीं काला बाजार, भ्रष्टाचार और भयावह न हो जाय. 

नोट बंदी की घोषणा के कुछ ही क्षणों पश्चात् पुराने नोटों को ठिकाने लगाने के तमाम प्रयास शुरू हो गये. इंदौर जैसे महानगर में इतना सोना बिका कि दुकानों में झाडू लग गई. तीस हजार का दस ग्राम सोना साठ हजार रूपये तक बिका. काली कमाई को पीली धातु से सफेद करने की ऐसी जुगत हुई कि एक समाचार पत्र के अनुसार चार दिन में पच्चीस टन सोना देश में बिक गया. पुराने नोटों को बीस से पचास प्रतिशत में बदलने की खबरें आयीं. काला धन छिपाने वालों को सहानुभुति दिखाने वाले भी राष्ट्र स्तर पर सामने आ गये. महिलाओं, किसानों, दोस्तों, रिश्तेदारों, नौकर चाकर, कर्मचारियों के बैंक खातों में करोड़ों रूपये जमा हो गए. यह छोटा-मोटा कार्य और धंधा करने वाले छोटे अथवा मध्यम श्रेणी वाले हैं. अभी काली कमाई के बड़े जादूगर तिजोरियों में भरे अरबों खरबों की राशि ठिकाने लगाने के लिए समय और समय की धार देख रहे हैं. खबरें आ रही है कि उत्तर प्रदेश में नोट के बदले टिकिट बांटने वाले दल पहले पुराने नोट बांट रहे हैं. बदले में नये नोट अथवा पीली धातु भेजने पर टिकट देने की सूचना अपने कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं. पुराने नोटों को चलाने के लिए धंधेबाज सरकार के साथ डाल-डाल और पात-पात का खेल, खेल रहे हैं. कुछ भी हो अफवाहों का बाजार गर्म है. उत्तर प्रदेश से प्रकाशित समाचार पत्र ने नोट बंदी की घोषणा से पहले हो हजार का नया नोट शीघ्र प्रचलन में आने तथा प्रचलित बड़े नोट बंद होने की आशंका व्यक्त कर दी थी. सोशल मीडिया में भी दो हजार के नोट की तश्वीरे पहले से दिखाई जाने लगी थीं. केजरीवाल का आरोप है कि सत्तादल को इसकी जानकारी पहले से दी गई थी. अफवाह यह भी है कि अब सोना दबाये रखने वालों पर दबिस की तैयारी है. इसके लिए बैंकों के लाकरों पर सरकार की तिरछी निगाह है. जिन दुकानों से सोना खरीदा गया उनके क्लोज सर्किट टीवी के फुटेज देखे जाएंगे. लाखों, करोड़ों का सोना खरीदने वाले की भी धर पकड़ होगी. कुछ न कुछ तो अवश्य होगा. यह तय है. मध्यप्रदेश की नेता नगरी में बड़ी शांति है. इसकी भी बड़ी अफवाहें हैं. 


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