न्यायालयों के निर्णय भी भारत में धर्म-जाति के चश्में से देखे जाने लगे हैं.फिल्म जगत के सुप्रसिद्ध अभिनेता को मिली सजा हो या अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का दुरुपयोग रोकने का निर्णय.ऐसे अनेक निर्णयों पर सार्वजनिक प्रश्न उपस्थित किये जा रहे हैं.न्यायपालिका की साख तार-तार हो रही है.ऐसे भी अवसर देखे गये हैं जब अधीनस्थ अदालतां को छोड़िये देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णयों की भी खुलेआम अवहेलना की गई.प्रजातन्त्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है.
अभी फिल्म जगत के सुप्रसिद्ध अभिनेता सलमान खान को न्यायालय द्वारा काले हिरण के शिकार के जुर्म में पाँच वर्ष की सजा सुनायी गयी.इससे पहले इन्हें ही हिट एण्ड रन के मामले में महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया था.बरी करने को न्याय माना गया.सजा मिलने पर देश में यह बहस छेड़ी गयी कि, उन्हें मुस्लिम होने का परिणाम भोगना पड़ा.कुछ टी.वी. चैनलों ने हमेशा की तरह स्थायी पेनलिस्टों को बुलाकर हिन्दू-मुसलमानों को देश की अदालतां से मिलने वाले न्याय की बाकायदा तीखी बहस करा दी.इस सजा पर पाकिस्तानी, भारतीय मुसलमानों को भड़कायें; वहाँ के विदेश मंत्री बेतुकी बात कहें, भारत-पाक के बीच चल रहे कटुतापूर्ण सम्बन्धों के मद्देनजर कूटनीतिक चाल मानी जा सकती है.किन्तु अपने ही देश के अन्यों की क्या कहें, मशहूर शायर मुनव्वर राना जैसे प्रतिष्ठित लोग भी अदालती निर्णय पर संदेह प्रकट करने लगे हैं.उन्होंने दो अलग-अलग ट्वीट करते हुए लिखा कि, आदमी कत्ल करो और वजारत में रहो, अब हिरण मारने वालों को सजा होती है.उनका दूसरा ट्वीट था, अदालतों में ही इंसाफ सुरखुरू है मगर, अदालतों में ही इंसाफ हार जाता है.पता नहीं जनाब मुन्नवर साहब चाहते क्या हैं.वन्य प्राणियों को अगर कोई सेलीब्रिटी मारे, खासतौर पर जब उनका मजहबी हो, नियम-कानून को धता बताते हुए उसे छोड़ दिया जाना चाहिये? कुछ महीने पहले ही एक और अभिनेता संजय दत्त सजा पूरी कर जेल से छूटे हैं.जब उन्हें सजा हुई थी तब किसी ने सलमान की सजा होने पर मचाये जा रहे धर्म, मजहब जैसा हो-हल्ला नहीं किया.कई बार लगता है कि क्या हम उसी देश के हैं जिसके बारे में कहा जाता है, सारे जहाँ से अच्छा या भारतीय होने से पहले हम हिन्दू, मुस्लिम आदि धर्मावलम्बी हैं.सवर्ण, दलित, पिछड़े, अनुसूचित जाति, जनजाति के हैं.न्याय-अन्याय की सोच जाति-धर्म आधारित होने लगी है.क्या देश में ऐसी न्याय व्यवस्था की जरूरत समझी जाने लगी है कि मुस्लिम का केस में मुस्लिम जज ही निर्णय करें.ऐसे ही समान जाति-धर्म के न्यायाधीश समानधर्मी प्रकरणों की सुनवाई करें.अभी कुछ ही दिन पहले देश की सर्वोच्च अदालत ने अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का दुरुपयोग रोकने का निर्णय सुनाया.इस अधिनियम का कितना दुरुपयोग होता है, सब जानते हैं.अनेक निर्दोश सिर्फ एफ.आई.आर. होते ही बगैर किसी जाँच, पड़ताल, सुनवाई के जेल जा चुके हैं.वैसे ऐसा कहने वाले, लिखने वाले भी जातीय तराजू से तौले जाने लगेंगे.अधिनियम की प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध थी.सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियागत सुधार का ही आदेश दिया था.पूरे देश में मानो तूफान आ गया.यहाँ तक केन्द्र सरकार की मंशानुसार एटार्नी जनरल वेणुगोपाल को सर्वोच्च न्यायालय से अपना निर्णय बदलने का आग्रह यह कहते हुए करना पड़ा कि देश में आपातकाल जैसी स्थितियाँ हैं.हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय को ही सर्वोच्चता देते हुए अपना निर्णय बदलने से इंकार कर दिया.फिर भी कोशिशें जारी हैं कि न्यायालय का निर्णय बदलाया जाय अथवा शाहबानों प्रकरण की तरह इस मसले में भी न्याय का गला घोंटते हुए कानून ही दंगाईयों के मनमाफिक कर दिया जाय.हालात ऐसे हो रहे हैं, आतंकवादियों की सजा रूकवाने आधी रात में न्यायालय खुलवाये जा रहे हैं.न्यायालय द्वारा पùावती फिल्म प्रदर्शन के स्पष्ट आदेश के बावजूद दंगाई कानून-व्यवस्था को चौपट कर देते हैं.अत्याचार निवारण अधिनियम में न्यायालय के आदेश का विरोध करते हुए फसादी एक दिन में बीसों हजार करोड़ की राष्ट्रीय सम्पत्ति आग के हवाले कर देते हैं.दसियों लोगों की जान दंगा की भेंट चढ़ जाती है.यह भी देखा गया है कि, ऐसी हिंसात्मक गतिविधियाँ उन राज्यों में ज्यादा जोर पकड़ती हैं, जहाँ चुनाव नजदीक हैं.अभी हाल की घटना में मध्य प्रदेश सर्वाधिक प्रभावित हुआ.यहाँ दंगाइयों ने जमकर उत्पात मचाया.जान-माल को क्षति पहुँचायी.भावना भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने वाले सक्रिय हो गये.अफवाह फैलायी गयी कि न्यायालय ने अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम को रद्द कर दिया है.

बहरहाल, जलते तवे में रोटी सेकने का विरोधी दलों को भी मौका मिल गया.हिंसा की भड़कती आग में उन्होंने भी खूब घी उड़ेला.मध्य प्रदेश की विशेष चर्चा में पायेंगे कि, किसानों, मजदूरों, सरकारी-अर्द्धसरकारी अमले आदि को खुश करने की गरज से मुख्यमन्त्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा तड़ा-तड़ जा रही घोषणाओं और उनकी अतिसय सक्रियता को देखते हुए सुप्तावस्था में पड़े विपक्ष को मौका मिल गया.
अब सबके जहन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या न्यायालयों द्वारा संविधान की मर्यादा के अनुरूप नियम-कानून की परिधि में रह कर दिये जा रहे निर्णयों को किसी धर्म, जाति या जातियों के हित में करने के लिये पुनः संवैधानिक संशोधन किया जायेगा.ऐसा किया जाना भारत जैसे मजबूत प्रजातान्त्रिक राष्ट्र, जहाँ न्यायालय की गरिमा तमाम प्रश्न चिन्हों के बावजूद आज भी बरकरार है, के लिये अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण होगा.वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर केन्द्र सरकार के समक्ष बड़ा मौका है कि वोट की चिन्ता छोड़ दृढ़ता का परिचय दे.पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता, सम्पत्ति, शासन सुख भोग रहे परिवारों को दलित-पिछड़ा मानना बन्द कर दे.तद्नुसार संविधान में संशोधन करे.बाबा साहब आम्बेडकर की मंशा के अनुरूप वास्तविक दलित, पिछड़े, गरीब, कमजोर अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ा वर्ग के परिवारों को ही संविधान में प्रदत्त सुविधाओं का लाभ देकर सबकी बराबरी में लाने का कानून बनाये.निश्चित ही इससे वोट बैंक घटने की बजाय बढ़ेगा.ऐसा करने से देश का भला होगा.हजारों वर्षों से दबे-कुचले गरीब भी अपने सजातीय बन्धुओं के समकक्ष होने लगेंगे.अन्यथा इस मामले में भी न्यायालय को ही पुनः आगे आना पड़ेगा.


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