छत्तीसगढ़ के आदेड़ गाँव की बारह वर्षीय जमलो मडकामी रास्ते में मर गयी. वह अन्य मजदूरों के साथ तेलंगाना से अपने गाँव पहुँचने के लिए पैदल चल रही थी. कुछ ही किलोमीटर का सफर बचा था. थकी हारी नन्ही जमलो गाँव नहीं पहुँच पायी. ऐसे कारुणिक दृष्य पूरे देश में हैं. कोई अपने गांव पहुंचने के लिए पैदल ही चल पड़ते हैं. जान की परवाह किये बगैर सीमेन्ट-कांक्रीट के मिक्सर में तो कोई टैंकर में घुस कर चल देते हैं. यात्रा के लिए वाहन मिलने की झूठी खबर से शहरों की सड़कों पर हजारों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है. कभी गाँव जाने की माँग करते लोग गुजरात के सूरत में पुलिस की लाठियाँ खाते हैं. सरकार, स्वयंसेवी संगठनों सहित सक्षम परिवारों द्वारा खाने पीने की व्यवस्था किये जाने के बाद भी बड़ी संख्या में लोगों को खाना नहीं मिल पाता. भूखे ही सोना पड़ता है. जहान की चाहत में जान बचाने का संघर्ष पूरे देश में जारी है. जब किसी भी हालत में जान बचती नहंी दिखती तब ‘मरता क्या न करता’ को चरितार्थ करते हुये बारह वर्ष नन्हीं जानें सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल देती हैं. दम धुटने की परवाह किये बगैर टैंकरों और मिक्सरों में घुसकर चलने की मजबूरी आ जाती है. इन्हें पकड़ने वाले पुलिस बल की वाह-वाही होती है. मीडिया को मसाला मिल जाता है. ऐसी अमानुषिक दशा का कारण नेपथ्थ में चला जाता है. आजकल एक चैनल में विज्ञापन आ रहा है, जिसमें कहा जा रहा है कि भारत की सड़कों पर बीस लाख से ज्यादा बच्चे हैं. इनके खाने और सुरक्षा के लिये दान दीजिये. 

देखा जाय तो इन सब कारूणिक दृष्यों का संबंध कुप्रबन्ध तथा बगैर पुख्ता तैयारी के लागू की जा रही व्यवस्थाओं से है. इससे भी अधिक, अव्यवस्था का सम्बन्ध जनसंख्या के ताण्डव से है. बड़े शहरों में लाखों लोग जगह के अभाव में किश्तों में सोते हैं. डबलबैड के आकार वाली झुग्गी या खोली में दसों लोग रहते हैं. शौचालय के बाहर पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपनी बारी का इन्तजार करते हैं. कितने ही लोग पुलों के नीचे, पुटपाथों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों पर आश्रय खोजते देखे जा सकते हैं. शहरों के आसपास बीसों किलोमीटर के दायरे की उपजाऊ कृषि योग्य भूमि सीमेन्ट-कांक्रीट का जंगल बनती जा रही है। भयानक गति से बढ़ रही जनसंख्या पर कोई गम्भीर नहीं है. भूख, बेरोजगारी, संसाधनों का अभाव आदि सबकुछ जनसंख्या से जुड़ी प्रत्यक्ष समस्यायें हैं.

भारत का यही विशाल जन समुद्र कोरोना वायरस से निपटने में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है. मुम्बई का धारावी हो या सघन आबादी का अन्य कोई इलाका, कोरोना वायरस ज्यादातर ऐसे ही क्षेत्रों में बढ़ रहा है. अब इस जनसंख्या ने शहरों से गाँवों की ओर कूच कर दिया है. बहुत से लोग पहुँच भी गये हैं. इनमें से जो पहले पैदल या अन्य किसी साधन से सीधे पहुँच गये वे अपने गाँव वालों से घुल-मिल रहे हैं. पैदल यात्रा का वृत्तान्त सुना रहे हैं. अभी तक यह जानकारी नहीं आई कि इनमें कोई बीमार है या कोरोना संक्रमित है. सरकारी व्यवस्था के तहत टेªन अथवा बसों से भेजे जा रहे लोगों का पहले कोरोना टेस्ट किया जाता है. उन्हें निर्धारित अवधि तक क्वारेन्टाइन भी कराया जाता है बावजूद इसके संक्रमण ग्रामों में नहीं पहुँचेगा, कहा नहीं जा सकता. 

देश में कोरोना की स्थिति विकराल होती जा रही है. संक्रमितों की संख्या पचास हजार से आगे की तरफ बढ़ रही है. पहले हजार-पन्द्रह सौ संक्रमित मिलते थे. अब संक्रमितों की संख्या में प्रतिदिन अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है. कोरोना जाँच में लाई गई तेजी को इस वृद्धि का कारण बताया जा रहा है. वायरस से निपटने के लिये सभी संदिग्धों की जाँच जरूरी है. दक्षिण कोरिया ने अधिकतम जाँच कर मरीजों को ढूँढ़ने और उनका इलाज करने की नीति से कोरोना पर विजय पायी है. जानकर आश्चर्य होगा कि वहाँ एक भी दिन का लाॅकडाउन नहीं किया गया. दक्षिण कोरिया की ऐसी सफलता राज वहाँ की जनसंख्या भारत से सत्ताइस गुना कम होना भी है. भारत मंे हालत यह है कि लाॅकडाउन के तीसरे चरण के पहले दिन जैसे ही शहरों में शराब की दुकानें खोलने की छूट दी गयी, हंगामा हो गया. दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर की कतारें लग गईं. शराब पाने के लिये कोरोना संक्रमण की परवाह किये बगैर लोग गुत्थमगुत्था हो गये. यह भीड़ देश में हर तरफ है. राशन की लाईन में हैं. खाने के पैकेट झपटने में हैं. अपनी बाल्टी लेकर पानी के टैंकर के सामने हैं. शराब की दुकान में है. यह भीड़ कोरोना संकट को कितना बढ़ा देगी इसकी बानगी संक्रमितों की बढ़ रही तादात से समझी जा सकती है. लाॅकडाउन से देश में अब तक कोरोना को काफी हद तक नियन्त्रित किया जा सका है. इसकी पूरे विश्व में चर्चा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी तारीफ की है. सवाल यह है कि लाॅकडाउन कब तक ? किम् किंचित विमूढ़ता की हालत है. क्या करें, क्या न करें. सरकार कभी कहती है जो जहाँ है वहीं रहे. भोजन पानी के इन्तजाम में दिक्कत के चलते भागमभाग होने लगती है. विपक्षी दलों को राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका मिल जाता है. बढ़ती आलोचना तथा प्रबन्धन की मजबूरी से प्रवासियों की घरों में रवानगी शुरू कर दी जाती है. ऊहापोह के चलते दारू की दुकानें खोलने और बाद में भीड़ की वजह से पुनः बन्द करने के निर्णय लिये जाते हैं.

कुछ भी हो कोरोना आपदा ने अनेक विषयों पर पुनर्विचार करने का मौका दिया है. जनसंख्या नियन्त्रण पर विचार और कठोर निर्णय इनमें सबसे महत्वपूर्ण है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने, ऐसी अकस्मात् आपदाओं से निपटने की तैयारियाँ रखने, आम जनजीवन से जुड़े मसलों पर रातों-रात निर्णय लेने से पहले जरूरी प्रबन्ध सुनिश्चित करने जैसे विषयों पर भी व्यापक विचार आवश्यक है. जीवन के लिये चुनौती बने कोरोना से देर सबेर मानव निश्चित ही निपट लेगा. पूरे विश्व में वैज्ञानिक लगे हैं. दवा तथा टीका बनने का इन्तजार है. तब तक सावधानी ही इससे बचाव का एकमात्र रास्ता है. 


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