मतदान बैलेट पेपर से कराया जाय चाहे ईवीएम से हारने वाला चुनाव में बे-ईमानी होने की बात जरूर करता है। भारतीय जनता पार्टी जब आज की तरह जहां चाहे जीतने की स्थिति में नहीं थी तब उसने ही देश में सबसे पहले इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन  पर आशंका व्यक्त की थी। पहले इंदिरा गांधी जीता करती थीं। उनकी पार्टी कांग्रेस चाहे जिसको जहां से जीत दिलाने का माद्दा रखती थी। अब नरेन्द्र मोदी का जमाना है। जब जीतते नहीं थे तब भाजपा वाले वोटिंग प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाते थे। जीतने पर भाजपा शांत है। उत्तर प्रदेश में मायावती और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ईवीएम पर शंका व्यक्त कर रहे हैं। कांग्रेस में भी वोटिंग बैलेट पेपर से किये जाने की बातें होने लगी है। ईवीएम में हेराफेरी, गड़बड़ी, धोखाधड़ी संभव है, इसे चुनाव आयोग भले ही स्वीकार नहीं करे पर ज्यादा शोर-शराबा शुरू होने पर आम मतदाता के मन में जरूर ईवीएम के प्रति शंका उत्पन्न हो जायेगी।

इस संबंध में भारतीय प्रशासनिक सेवा के ऐसे वरिष्ठ अधिकारी से बेवाक जानकारी ली गयी जिन्हें तीन चार जिलों का जिलादण्डाधिकारी रहने के साथ-साथ लोकसभा, विधान सभा से लेकर अन्य तमाम तरह के निर्वाचन निर्विघ्न सम्पन्न कराने का अनुभव है। उन्होंने बताया कि ईवीएम मशीने सभी राज्यों के जिला मुख्यालयों के स्ट्रांग  रूम में रखी जाती हैं। इस स्ट्रांग रूम का ताला लाकर की तरह दो चाभियों से खुलता है। एक चाभी कलेक्टर एवं जिलादण्डाधिकारी और दूसरी कोषालय अधिकारी के कब्जे में रहती हैं। स्ट्रांग रूम के भीतर दस-दस ईवीएम तालाबंद बक्सों में रखी जाती हैं। 

ईवीएम के साथ कंट्रोल यूनिट लगाये जाने पर ही वोटिंग संभव होती है। किस ईवीएम पर कौन सा कंट्रोल यूनिट लगेगा यह भी पूर्व निर्धारित नहीं होता। कंट्रोल यूनिट अलग बक्सों में रखे जाते हैं। कौन सी ईवीएम किस क्षेत्र में जाएगी और किस मतदान केन्द्र में पहुंचेगी इसकी किसी को भी जानकारी नहीं होती। चुनावों से पहले अथवा घोषणा के पश्चात् प्रत्येक जिले में भारत इलेक्ट्रानिक कार्पारेशन के दो-दो इंजीनियर पहुंचकर सभी ईवीएम का संचालन देखते हैं। जरूरत होने पर मशीन सुधारते हैं। मतदान क्षेत्रों में भेजने से पहले सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम चलाकर दिखाई जाती है। अपनी संतुष्टि के लिए दल चाहे जितनी बार बटन दबाकर पता लगा सकते हैं कि वोटिंग का परिणाम ठीक आ रहा है कि नहीं। रेंडम आधार पर मशीनें निर्वाचन क्षेत्रों और वहां से इसी प्रणाली के अनुसार मतदान केन्द्रों तक पहुंचाई जाती है। इस प्रक्रिया तक किसी को पता नहीं होता कि कौन चुनाव लड़ रहा है। किस पार्टी का चिन्ह किस स्थान पर ईवीएम में रहेगा। इसका पता तभी चलता है जब नामांकन की तिथि के पश्चात् नाम वापसी की तिथि निकल जाती है। नाम वापसी की तिथि के बाद ही ईवीएम में प्रत्याशियों के नामों का क्रम और चिन्ह निर्धारित होता है। वोटिंग से पहले भी प्रत्येक मतदान केन्द्र पर प्रत्याशियों के अभिकर्ताओं को मॉक पोलिंग के जरिये मशीन के सही होने तथा वास्तविक परिणाम देने की संतुष्टि दिलाई जाती है। यह प्रश्न करने पर कि मशीन में कोई ऐसा प्रोग्राम डाल दिया जाये कि प्रारंभ के दस-पांच नहीं दो-चार सौ वोट तक तो वहीं रहे जो वोटर चाहते हैं। इसके बाद के सभी वोट आपेक्षित दल को डल जाये। अधिकारी के मत से ऐसा संभव नहीं है। पहले तो ईवीएम का किसी नेट से जुड़ा नहीं होने से ऐसी प्रोग्रामिंग नहीं हो सकती। दूसरा ईवीएम में चिप लगाकर प्रोग्रामिंग की जाय इसके लिए हजारों लोगों को बे-ईमान होना पड़ेगा। मतलब यह कि हजारों मशीनों मे चुनाव की घोषणा ओर प्रत्याशि तय होने के बाद ताबड-तोड़ तरीके से चिप फिट करना होगी।

देश में ‘‘ऊंट की चोरी निहुरे-निहुरे‘‘ कहावत क्षेत्रवार अपनी अपनी स्थानीय भाषाओं में प्रचलित है। इसका मतलब है कि ऊंट जैसे विशाल पशु को छिपा कर नहीं चुराया जा सकता। उसी तरह निर्वाचन में लगे हजारों अधिकारियों को बे-ईमान भी नहीं बनाया जा सकता। ईवीएम में किसी भी तरह गड़बड़ी जिला निर्वाचन अधिकारी की जानकारी और स्पष्ट सहमति के बगैर किसी भी हालत में नहीं की जा सकती। ईवीएम राज्यों के आधिपत्य में जिलेवार स्ट्रांग रूमों में तीन-तीन तालों के भीतर बंद रहती है। इन मशीनों में अभियान चला कर चुपचाप चिप कैसे फिट की जा सकती है। मायावती जी को संभव है किसी ने समझा दिया हो पर अरविंद केजरीवाल जैसे उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति कैसे ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। समझ से परे है। 

चुनाव की घोषणा से पहले राज्यों का सत्तारूढ़ दल अकसर जिलों में अपनी पसंद के अधिकारियों की पदस्थापना कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश के बारे में तो ख्यात है कि वहां थानेदार से लेकर कलेक्टरों की बड़ी संख्या को जातीय आधार पर पोस्टिंग मिलती रही है। ऐसे अपने अधिकारियों और जिला निर्वाचन अधिकारियों के होते हुए भी ईवीएम मोदी-मोदी करने लगे क्या अपनों ने ही अपनों को हरा दिया। वास्तविकता जो भी हो उसे सब राजनीतिक दलों को स्वीकार करना चाहिए। यदि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव होती तो मोदी-शाह की जोड़ी पंजाब को हाथ में न जाने देती। वहां भी कमल खिलता। गोवा में तो सब कुछ इनके हाथ में था। वहां आधी-अधूरी बदनामी वाली जीत क्यों ओढ़ते। मणिपुर में भी ईवीएम को मोदी-मोदी कहने पर मजबूर कर देते। 

 

भारत के इतने मजबूत प्रजातंत्र, जहां न्यायापालिका की स्वतंत्रता है। जहां मीडिया हर क्षण देख रहा है। जहां कि बहुसंख्यक नौकरशाही चुनाव में निष्पक्ष हो जाती है। वहां फिलहाल ईवीएम में छेड़छाड़ संभव नहीं लगती। 


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