पश्चिम बंगाल की यह खबर खुशी से ज्यादा चिंता में डालने वाली है. ‍इसलिए कि राज्य की ममता बैनर्जी सरकार ने कोलकाता के 202 पुराने हिंदू हायर सेकंडरी स्कूल प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़ाई शुरू करने की इजाजत दे दी है. हिंदू स्कूल बंगाल के महान पुनर्जागरण काल की ‍जीवित  निशानी है. इसकी स्थापना राजा मोहन राय और डेविड हेयर ने 20 जनवरी 1817 को की थी. ममता सरकार के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा था कि सरकारी स्कूल अगले सत्र से अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्रदान करेंगे ताकि छात्र उस भाषा में निपुण हो सकें और निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाने में अक्षम लोगों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके.

यहां सवाल हो सकता है कि इस ऐतिहासिक स्कूल में फिर से अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई शुरू करने में गैर क्या है? वो स्कूल जिसने कभी अंग्रेजी में पढ़ और पढ़ाकर ही देश के कई समाज सुधारक, वैज्ञानिक और नेता पैदा किए, वहां फिर से अंग्रेजी माध्यम से अध्यापन एक सही फैसला ही है. यह उस स्कूल की लंबी और गौरवपूर्ण शैक्षणिक परंपरा का हिस्सा भी है.

ऊपरी तौर पर यह बात एकदम सही लगती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा की वापसी न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे भारत की दो दर्जन से अधिक भाषाअो और सैंकड़ों बोलियों के धुंधलाते भविष्य की अोर भी गंभीर इशारा करती है.  अगर बंगाल की ही बात करें तो वहां स्कूल में प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी के स्थान पर बंगला भाषा में पढ़ाने की नीति तत्कालीन लेफ्ट सरकार ने  1983 में लागू की. फैसला हिमांशु बिमल मजुमदार आयोग की सिफारिश पर किया गया था. माना गया था कि बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्राथमिक स्तर तक शिक्षा उनकी अपनी मातृ भाषा में ही दी जानी चाहिए ( आज भी अधिकांश शिक्षाशास्त्री यही मानते हैं). लेकिन इसके कुछ साल बाद ही देश और दुनिया का आर्थिक परिदृश्य बदला. राज्य की वामपंथी सरकार ने दूसरा रंजू गोपाल मुखर्जी आयोग बनाया. उसने सिफारिश की कि पश्चिम बंगाल के बच्चे अंग्रेजी ज्ञान ठीक न होने से प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ रहे हैं. इसलिए प्राइमरी स्तर पर अंग्रेजी में भी शिक्षा दी जाए. इस रिपोर्ट पर फैसला वर्तमान ममता बैनर्जी सरकार ने किया और प्रदेश के 65 सरकारी स्कूलों में 5 वीं तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने की इजाजत दे दी. इसमें एक हिंदू स्कूल भी है. और फिर बंगाल ही क्यों, हाल में आदिवासी बहुल झारखंड ने भी सरकारी स्कूलों में छोटे बच्चो को अंग्रेजी में ‍िशक्षा करने का ऐलान किया है.  मध्यप्रदेश में यह पहले ही लागू हो चुका है. क्योंकि एक अध्ययन में सामने आया था कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई न होने से हर साल 3 लाख बच्चे सरकारी स्कूल छोड़कर निजी स्कूलों में जाने लगे हैं. यह भी कड़वा सच है कि अंग्रेजी का साथ छोड़ते ही ज्यादातर सरकारी स्कूलों की हैसियत राज्य में तीसरे दर्जे की हो गई.

अब प्रश्न यह है कि बीते तीन दशकों में अंग्रेजी के प्रति यह बेलगाम प्रेम क्यों उमड़ रहा है? बीपीएल व्यक्ति भी किसी तरह अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाना चाहता है. यूं इस देश में  अंग्रेजी  पहले भी पढ़ाई  जाती थी, अनेक स्कूलो में वह पढ़ाई का माध्यम भी वह थी, लेकिन उसे लेकर ऐसा जुनून, जरूरत और जिज्ञासा न थी. अंग्रेजी पहले भी थी, लेकिन भारतीय भाषाएं और संस्कृति भी समांतर पटरी की तरह उसके साथ साथ चल रहीं थीं. लेकिन आज लगता है कि भाषाअों की फर्राटा रेस में अकेली अंग्रेजी ही दौड़ रही है. बाकी भारतीय भाषाएं और  बोलियां फिनिश लाइन के करीब आने के बजाए उल्टे दूर होती चली जा रही हैं. नई पीढ़ी में भी अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को लेकर अजब सी बेपरवाही है.

आजादी के अर्द्धशतक बाद अंग्रेजी का यूं मस्ट वाली  वर्दी में लौटना वाकई चिंताजनक है. यह प्रवृत्ति भारत ही नहीं लगभग पूरे विश्व में है. पहले अंग्रेजी उपनिवेशवाद और पूंजीवाद की शक्ल में यहां उतरी  थी. आज वह कारपोरेटवाद के रूप में अपने पैर और पंजे पसार  रही है. कहीं वह राष्ट्रवाद के साथ है तो कहीं उसने रोजगार से हाथ मिला लिया है. बावजूद तमाम राष्ट्रप्रेम इत्यादि  के आज ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अंग्रेजी को ही अपनी कामकाज की मुख्य भाषा बना लिया है. चीन और जापान इसके उदाहरण हैं. जापान की सबसे बड़ी आॅनलाइन मार्केटिंग कंपनी राकुतेन के सीईअो हिरोशी मिकितानी  इसे इंग्लिसाइजेशन की संज्ञा देते हैं.

अंग्रेजी सीखने-सिखाने का जुनून और जज्बा अब एक सुनियोजित वैश्विक कारोबार का रूप ले चुका है. मार्केट रिसर्च साइट एड्राॅइट की ताजा रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में अंग्रेजी सिखाने का बाजार 7.1 फीसदी  की दर से बढ़ रहा है. 2025 तक इसके 54.8 अरब अमेरिकी  डाॅलर का हो जाने की उम्मीद है. अकेले ग्लोबिल डिजीटल इंग्लिश लर्निंग मार्केट की बात करें तो 2027 तक इस धंधे से 114 अरब अमेरिकी  डाॅलर की कमाई होने की उम्मीद है. वैश्विक स्तर पर भारत को मोटे तौर अंगरेजी ज्ञान वाले देशों में ही ‍िगना जाता है. यहां हिंदी अथवा अन्य किसी भारतीय भाषा की कोई खास गिनती नहीं है. अलबत्ता मंदारिन  चीनी भाषा को जरूर महत्व मिलता है. लेकिन कई जानकारों का मानना है कि अंतत: अंग्रेजी चीनी भाषा पर भी हावी हो जाएगी. इसका आधार यह है कि चीन में भी अंग्रेजी सीखने का ज्वार आया हुआ है. वहां 1 करोड़ लोग इसे लिख और बोल सकते हैं.

अंग्रेजी का बढ़ता साम्राज्यवाद 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में किसी सैन्य पराक्रम, उपनिवेशीकरण अथवा नैतिक विजय का परिणाम न होकर अंग्रेजी की टैक्नोलाॅजी और डिजीटलाइजेशन के ऐसे रथ पर सवारी है, जिसकी लगाम किसी के हाथ नहीं है. वाॅल स्ट्रीट इंग्लिश का सर्वे बताता है कि आने वाले वर्षों में अंग्रेजी पूरी दुनिया के लिए एक अनिवार्यता होगी. क्योंकि जटिल प्रौद्योगिकी को सीखने-समझने, दुनिया के बाजार पर कब्जा करने, अंतरराष्ट्रीय संवाद, फैशन उद्योग,  पर्यटन और काॅरपोरेट के विस्तार के लिए अंग्रेजी जरूरी है. यहां तक उस पोर्न इंडस्ट्री की मुख्‍य भाषा भी अंग्रेजी ही है, जिसे समझने के लिए किसी इंग्लिश कोचिंग में जाने  की जरूरत नहीं है. आज धीरे-धीरे अंग्रेजी ने अघोषित विश्व भाषा का दर्जा हासिल कर लिया है. ब्रिटिश कौंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले सालों में दुनिया की ढाई अरब आबादी अंग्रेजी बोलने-लिखने वाली होगी, यह विश्व की कुल आबादी का करीब 40 फीसदी है.

अंग्रेजी जानने-समझने की यह विवशता ( या गुलामी? ) आज हम तक डिजीटल फाॅर्म में और संचार क्रांति के रूप में पहुंच रही है. दुर्भाग्य से 21 वी सदी के ज्यादातर बच्चों के लिए भाषा और सम्प्रेषण का अर्थ अंग्रेजी ही है. हिंदी अथवा अन्य कोई भारतीय भाषा की हैसियत स्टैंड बाय की तरह है.

अंग्रेजी इस देश में ज्ञान, सत्ता और प्रभुता की भाषा तो सदा से रही है. लेकिन तब भी वह आज की तरह हमारी जिंदगी में प्रदूषित हवा की तरह घुली नहीं थी. चिंता इस बात की नहीं ‍िक बंगाल और मप्र में प्राथमिक स्तर पर भी बच्चे अंग्रेजी में पढ़कर अचानक स्मार्ट हो जाएंगे, ग्लोबल कहलाएंगे बल्कि चिंता  इस बात की है कि ग्लोबल होने के चक्कर में हम लोकल भी नहीं रह पाएं.  भाषा के साथ हमारी अपनी पहचान, संस्कृति आचार‍-विचार और सोच भी डिलीट होती जा रही है. जिस तेजी से अंग्रेजी का घुन फैलता जा रहा है, उसकी चपेट में बहुत कुछ आना है. तर्क यह भी हो सकता है कि आप इस बदलाव को रोक कैसे सकते हैं? क्योंकि अंग्रेजी अब रोजगार की भाषा के रूप में मुकाबिल है. एबीसीडी के इस मिसाइल अटैक का मुकाबला कखगघ के देसी तमंचे से कैसे करें? लेकिन यही वह सवाल है, जिसमें जवाब भी निहित है. अंग्रेजी को अपनाएं, लेकिन उसमे रम न जाएं. क्योंकि अगर ऐसा होता तो कोलकाता का हिंदू स्कूल कब का मर चुका होता.  

 

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