बाजार का नियम है कि उपभोक्ता को जो पसंद है, उसी के अनुरूप बाजार में उत्पाद की बिक्री की जाए. फिर वह खाद्य पदार्थ हो या साज-सजावट के सामान. बदलते समय में अखबार के पाठक भी उपभोक्ता में तब्दील हो चुके हैं और उनकी रूचि तथा पसंद के अनुरूप अखबारों में बदलाव अपरिहार्य हो गया है. खासतौर पर हिन्दी में प्रकाशित होने वाले अखबारों के लिए यह और भी जरूरी है. अंग्रेजी प्रकाशनों के पाठकों की जरूरतें और हिन्दी प्रकाशनों के पाठकों की जरूरतें अलग-अलग हैं. हिन्दी के पाठक अखबारों में छपने वाली खबरों से लेकर विज्ञापन तक को आधार बनाकर अपनी जिंदगी में बदलाव लाने की कोशिश करते हैं वहीं अंग्रेजी के पाठक अमूनन स्वविवेक से उपयोग करते हैं. बदलते समय में इंटरनेट के प्रभावी दखल ने रूचि को परिष्कृत किया है. इस अर्थ में अब अखबारों को कंटेंट के साथ ही साज-सज्जा पर भी विशेष ध्यान देना होगा. ऐसा नहीं है कि अखबारों में बदलाव नहीं हो रहा है किन्तु जिन अखबारों में बदलाव हुआ, वे लोकप्रिय हुए और जो अखबार परम्परागत रहे वे आज हाशिये पर खड़े हैं. मीडिया को जब उद्योग कहा जा रहा है तब पैकेजिंग पर भी ध्यान देना अनिवार्य हो गया है. 

आजादी के पहले से हिंदी अखबार लोकप्रिय रहे हैं, आजादी के बाद बीसवीं सदी में अखबारों की लोकप्रियता और जरूरत लगातार बढती गई, लेकिन इक्कीसवीं सदी में डिजीटल क्रांति ने अखबार की जरूरत और लोकप्रियता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है? बीसवीं सदी में 1980 के दशक तक हिंदी साप्ताहिक अखबारों, पत्रिकाओं का दबदबा चारों ओर था और यही वजह है कि धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माया, दिनमान,रविवार ,करंट, ब्लिट्स आदि का विशेष महत्व था, धर्मवीर भारती, रघुवीर  सहाय, आर  के  करंजिया, महावीर अधिकारी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा, कमलेश्वर आदि प्रमुख हस्ताक्षर थे, 

हिंदी  के दैनिक अखबारों में इंदौर की नई दुनिया की एक अलग ही पहचान थी जैसे कोई अखबार न हो, प्रशिक्षण संस्थान हो, जहां एक बार जाने की तमन्ना सभी हिन्दी पत्रकारों को रहती थी,  उधर राजस्थान में कर्पुरचन्द कुलिश के निर्देशन में राजस्थान पत्रिका ने खास पहचान बनाई तो इधर नई दुनिया में राहुल  बारपुते और राजेन्द्र माथुर के निर्देशन में पत्रकारिता को नई दिशा मिली, लेकिन 1980 के दशक तक अखबार में खबरों के प्रस्तुतीकरण की भाषा लगभग सरकारी जनसंपर्क विभाग जैसी थी, लेकिन 1984 में जनसत्ता के प्रकाशन के बाद प्रभाष जोशी के सम्पादकीय नेतृत्व के समय खबरों के प्रस्तुतीकरण में बडा बदलाव आया, खबरें प्रभावी और धारदार हो गई, न्यूज के साथ व्यूज का उपयोग बढ गया, उसी दौर में शरद जोशी के नवभारत  टाइम्स में 'प्रतिदिन' स्तंभ  की लोकप्रियता ने रीडर्स की बदलते  रूचियों को भी रेखांकित किया, बीसवीं सदी विदा होते होते ब्लैक एण्ड व्हाइट अखबार बहुरंगी हो गए, समाचारों के प्रस्तुतीकरण में रंगीन फोटो और डिजाइनिंग ने नई जान डाल दी! बीच में हिंदी पत्रकारिता के कालखंड में अख़बारनुमा साप्ताहिकों का दौर भी उल्लेखनीय रहा है. इसकी शुरुआत दिल्ली से प्रकाशित चौथी दुनिया ने की. हालांकि अखबार के आकार में एक्सप्रेस समूह का मुंबई से प्रकाशित हिंदी फि़ल्मी साप्ताहिक 'स्क्रीन'  का प्रयोग भी अनुकरणीय कहा जा सकता है. इस प्रयोगधर्मिता  में संडे मेल, संडे आब्जर्वर, दिनमान जैसे भी कई उल्लेखनीय नाम हैं.  इसी दौरान नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जागरण, महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश के  नवभारत समूह , प्रभात खबर, दैनिक नवज्योति ,रायपुर के देशबंधु जैसे प्रमुख अखबारों ने भी अनेक लोकप्रिय प्रयोग किए, लेकिन 1990 के दशक में एडिटोरियल को मार्केटिंग का तडका लगा तो दैनिक भास्कर ने जयपुर में धमाल मचा दी! संपादकीय सामग्री के प्रस्तुतीकरण में बदलाव को लेकर पहला बडा अभियान 2003 में दैनिक भास्कर ने-ऑपरेशन स्मार्ट लुक, शुरू किया, समाचार विश्लेषक प्रदीप द्विवेदी बताते हैं कि भास्कर समूह के एमडी सुधीर अग्रवाल चाहते थे कि बदलते समय के साथ रीडर्स की बदलती जरूरत के अनुरूप संपादकीय सामग्री और प्रस्तुतीकरण में बदलाव हों ताकि रीडर्स में एक नया जोश और आकर्षण पैदा हो! 

विशेष क्षेत्र की पत्रिकाओं में जहां बीसवीं सदी में मनोहर कहानियां की लोकप्रियता बुलंदियों पर थी वहीं पॉलटिकल मैगजीन में माया, दिनमान, रविवार आदि का अलग ही आकर्षण था, ग्लैमर की दुनिया में माधुरी की खास जगह रही तो मायापुरी ने अलग ही पहचान बनाई, दैनिक अखबार के आकार में साप्ताहिक संडे आब्जर्वर, चैाथी दुनिया, दिनमान टाइम्स आदि प्रयोग भी हुए, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ राजनीति, अपराध से हटकर करियर से संबंधित प्रतियोगिता दर्पण जैसी पत्रिकाओं का महत्व बढ गया, एक्कीसवीं सदी की शुरूआत में ब्यूटी और ग्लैमर की मैगजीन हनीमनी की ग्रुप एडिटर श्रीमती अनिता ने तो अपनी मंथली मैगजीन को एडिटोरियल प्रजेंटेशन में न्यूज, व्यूज के साथ-साथ यूज पर भी फोकस किया, जिसे अच्छा रेसपोंस मिला, आज, न्यूज-व्यूज-यूज, बेस्ड अखबार की ही ज्यादा जरूरत है! न्यूज- खबर क्या है? व्यूज- खबर का भावार्थ क्या है? यूज- रीडर्स के लिए खबर का उपयोग क्या है? 

डिजीटल क्रांति ने प्रिंट मीडिया पर सवाल खडा किया है तो प्रिंट मीडिया को भी एक बडे बदलाव की जरूरत है? प्रिंट मीडिया को डिजीटल मीडिया से आगे बढ कर सोचने की जरूरत है और इसी के सापेक्ष एडिटोरियल प्रजेंटेशन सहित कई अन्य बदलाव करने होंगे! डिजीटल क्रांति के इस नए दौर में समाचार विश्लेषक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, लिहाजा आनेवाले समय में समाचार विश्लेषकों के नेतृृत्व में निकलने वाले अखबार ही कामयाब होंगे?

भोपाल से प्रकाशित मीडिया एवं सिनेमा की रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के सम्पादक मनोज कुमार मानते हैं संचार की सुविधाओं के विस्तार के साथ पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं की रूचि में परिवर्तन आया है. अब बोलचाल की भाषा सर्वोपरि है और हिन्दी के विवाद में पडऩे के बजाय सुविधाजनक शब्दों का उपयोग किया जा रहा है. सिटी पेज, सीएम, पीएम, कमिश्रर और कलेक्टर जैसे शब्द चलन में हैं और पढऩे और समझने के साथ बोलने में भी सुविधाजनक हैं. ऐसे में इन शब्दों को हिंग्लिश कहकर नकारने के बजाय इसकी स्वीकार्यता होना चाहिए. इंटरनेट में हिन्दी की सुविधा है लेकिन हिंग्लिश की सूरत में. तब हमें प्रकाशनों में भी इसे ही एक्सेप्ट करना होगा. जहां तक लेआउट की बात है तो आज प्रिंटिंग के संसाधन बढ़ गए हैं. कल तक दुर्घटना की खबरें ब्लेक एंड व्हाइट में छपती थी लेकिन आज हेडलाइन से लेकर दुर्घटना की तस्वीरें बहुरंगी छपने लगी है. जब एक बुरी खबर रंगीन हो सकती है तो विविध खबरों की दुनिया भी बहुरंगी हो जाए तो शिकायत नहीं होना चाहिए. समय के साथ जो चलेगा, वह बाजार में टिका रहेगा क्योंकि बाजार का सिद्धांत है जो दिखता है, वही बिकता है. आज के दौर में मूल्यों की जगह कीमत ने स्थान ले लिया है और जो उपभोक्ता कीमत चुकाता है, वह अपनी पसंद और जरूरत की प्रोडक्ट की मांग करता है. 

 

समय बदल रहा है, अब जानकारियों के लिए लोगों के पास अखबार एकमात्र मीडिया नहीं है, यही नहीं, बढती प्रोडक्शन कास्ट, महंगा होता डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और घटते विज्ञापन के बीच प्रिंट मीडिया में ऐसे बदलावों की जरूरत है जिनसे मीडिया में अखबार का महत्व बना रहे! प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया से जीत तो नहीं पाएगा. इस बात का गवाह इंदौर का प्रतिष्ठित अखबार नईदुनिया, छत्तीसगढ़ का देशबन्धु और नवभारत समाचार पत्र समूह ऐसे ग्रूप  हैं जिन्होंने समय के साथ कदमताल नहीं किया तो उनके बाद के अखबारों ने पाठकों के बीच अपनी जगह बना ली. कंटेंट के साथ आकर्षक लेआउट भी पाठक की जरूरत में शामिल है क्योंकि अखबार की सूरत में वह टेलीविजन की फिलींग चाहता है. बदलाव को समझ कर बदलाव नहीं किया गया तो आनेवाले समय में अखबार, मीडिया के इतिहास की एक सुनहरी याद बन कर रह जाएगा? 


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