अपने तात्कालिक फैसलों को लेकर लगातार चर्चा में बने रहने वाले योगी का रास्ता केन्द्र सरकार से जुदा-जुदा दिखाई दे रहा है. इससे ऐसा लगता है कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगीआदित्यनाथ का इन दिनों केन्द्र सरकार पर या तो भरोसा उठ गया है या वे खुद एक नई राह चुनने जा रहे हैं. मीडिया में जिस तरह का कव्हरेज योगी को मिल रहा है, उससे उनका उत्साहित होना हैरान नहीं करता है लेकिन केन्द्र सरकार के समकक्ष लिए जाने वाले फैसले आगे आने वाले दिनों के लिए कुछ संकेत करते हैं. योगी का ताजा फैसला है गंगा सेवा यात्रा के लिए 4सौ करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट मंजूर करना। योगी को गंगा सेवा यात्रा की प्रेरणा पिछले दिनों मध्यप्रदेश के डिंडौरी में नर्मदा सेवा यात्रा के समय मिली और वहीं पर उन्होंने इस प्रकार का उपक्रम गंगा नदी के लिए करने की घोषणा की थी। मध्यप्रदेश से लौटते ही आनन-फानन में उन्होंने गंगा सेवा यात्रा का ऐलान कर बजट भी मंजूर कर दिया.

मुख्यमंत्री योगी का फैसला फौरीतौर पर एक और लोकलुभावन फैसला दिखता है। हालांकि मीडिया में गंगा सेवा यात्रा के इस बड़े फैसले को लेकर अभी कोई चर्चा नहीं हुई है। शायद इसका एक कारण मीडिया का पूरा ध्यान पहले सुकमा में नक्सली हमला और बाद में सीमा पर पाक की नापाक कार्यवाही के कारण रहा होगा। खैर, गंगा सेवा यात्रा एक किस्म का केन्द्र सरकार के खिलाफ का फैसला दिखता है। गंगा जी में प्रदूषण और उसकी स्वच्छता को लेकर निरंतर चर्चा होती रही है और मोदीजी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद इसका जिम्मा उमा भारती को दिया गया था। उमाजी का मंत्रालय योजना बनाकर गंगा नदी की सफाई में जुटा हुआ है कि इस बीच मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नदी नर्मदा को बचाने के लिए नर्मदा सेवा यात्रा आरंभ कर दिया। इस पूरी यात्रा को राजनीतिक स्वरूप देते हुए इस तरह प्लान किया गया जिसमें शिवराजसिंह चौहान को चौतरफा ख्याति मिले। यही नहीं, नर्मदा सेवा यात्रा के बहाने उन्होंने 2018 में होने वाले चुनाव के लिए अपनी जमीन भी टटोल ली। इस यात्रा में शिवराजसिंह सरकार ने देश और दुनिया भर के सेलिब्रेटी को आमंत्रित किया और प्रचारित किया गया कि दुनिया में पहली दफा किसी नदी के संरक्षण के लिए यह अभियान चलाया गया है।

नर्मदा सेवा यात्रा में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी आमंत्रित किया गया। अन्य मेहमान तो आए और शिवराजसिंह चौहान की तारीफ कर अपनी मंजिल की ओर लौट गए लेकिन योगी ने यहीं से एक और रास्ता चुन लिया और गंगा सेवा यात्रा का संकल्प लेकर वापस अपने घर आए। योगी का यह फैसला गलत नहीं है लेकिन जब केन्द्र सरकार का एक पूरा मंत्रालय गंगा सफाई अभियान के लिए काम कर रहा है तब उत्तरप्रदेश सरकार का यह फैसला अपनेआप में विरोधाभाषी हो जाता है। योगी के इस संकल्प और घोषणा से यह ध्वनि भी निकलती है कि क्या योगी को केन्द्र सरकार पर भरोसा नहीं है? क्या उमा भारती की लकीर को छोटा कर वे अपनी बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं? क्या गंगा सेवा यात्रा से शिवराजसिंह चौहान की तरह और लोकप्रिय होने का सपना बड़ा हो चला है? यह सवाल बेकार और बेमानी नहीं हैं क्योंकि जिस उद्देश्य को लेकर पहले से केन्द्र सरकार सक्रिय और सजग है, उसके लिए राज्य सरकार का अलग से एक और पहल करना इन सवालों की पुष्टि करता है। 

उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में योगी की ताजपोशी के बाद जिस तरह से योगी को मीडिया ने शीर्ष पर बिठाया, उससे उनके सपने और बड़े हो चले हैं। किसानों की कर्जमाफी, एंटी मजनूं स्कवाड, पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं को बंद करने का फैसला और उत्तरप्रदेश सरकार का प्रतिष्ठित यश भारती सम्मान की जांच आदि-इत्यादि से उन्हें भरपूर सराहना मिली। महापुरुषों के नाम पर पूर्व में घोषित छुट्टियों में कटौती करने के फेसले का भी देश भर में स्वागत किया गया। एक राज्य सरकार की हैसियत से यह फैसले और कार्यवाही अनुचित नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार के हिस्से के कामों में सेंध लगाकर फैसला करना और कार्यक्रम शुरूआत करने की घोषणा करना योगी सरकार को महंगा पड़ सकता है।

राजनीति गलियारों में इस बात की चर्चा है कि जिस तरह मध्यप्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद उमा भारती को कुछ समय के लिए सत्ता की कुर्सी पर बिठाया गया और आहिस्ता से उन्हें कुर्सी से हटा लिया गया। कुछ ऐसा ही अंदेशा योगी को लेकर भी है। हालांकि योगी और उमा भारती के फैसले और कार्यवाहियों में बड़ा अंतर है लेकिन उमा भारती को मीडिया ने इतना हाइप नहीं दिया जितना कि अपने तीन महीने के कार्यकाल में योगी को मिला। लगातार प्रचार से योगी का कद बढ़ा है जिससे भाजपा और संघ में चिंता की लकीर उभरी है। नाम ना जाहिर करने की शर्त पर संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने बताया कि योगी को अभी थोड़े दिनों की छूट है और इसके बाद उन्हें अपना तेवर ठंडा रखने के लिए कहा जाएगा क्योंकि जनमानस में यह धारणा बनती जा रही है कि मोदी से बेहतर काम योगी कर रहे हैं। ऐसे में हमें आने वाले चुनाव में समस्या का सामना करना पड़ सकता है। मोदीजी के चेहरे को लेकर हम मैदान में उतरेंगे तो परिणाम हमारे पक्ष में नहीं होगा। 

इस नामालूम कार्यकर्ता की बात मानें तो गंगा सेवा यात्रा आने वाले दिनों में योगी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। हालांकि भाजपा के भीतर भी इस बात को लेकर रार शुरू हो गई है और जो लोग योगी को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते थे, उनके लिए तो गंगा सेवा यात्रा एक अस्त्र के रूप में काम करेगा। अब यह तो समय ही बताएगा कि गंगा जी किसे तारती हैं और किसे डुबोती हैं? फिलहाल तो गंगा के एक किनारे पर केन्द्र और उमा भारती हैं तो दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी हैं।


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