इंदिरा गांधी और धीरेन्द्र ब्रम्हचारी को है भारत में योग शिक्षा को स्कूलों में अनिवार्य बनाने का श्रेय

हर तरफ योग है। टीवी पर योग है। अखबारों में योग है। कुछ योग है, कुछ प्रयोग है और कुछ संयोग भी है। भारत में योग है। योग में भारत है। चीन में योग है। पाकिस्तान में योग है। अमरीका में योग है। दुनिया में योग है। और योग में दुनिया है। सुंदर प्रयोग है। राजनीति में योग है। कूटनीति में योग है। पक्ष में योग है। विपक्ष में योग है। समाज में योग है। सरकार में योग है। घर में योग है। बाहर में योग है। मोदी के मन में योग है। पर कांग्रेस के मन में रोग है। राहुल बाबा कहते हैं कि नाटक है। दिग्गी राजा कहते हैं, योग अच्छा है। 40 सालों से कर रहा हूं। पर किसी को बताता नहीं। ये ठीक बात नहीं है। क्यों भाई - आपको जो अच्छा लगता है तो आप अकेले में ही करते हैं। ठीक है करिये। अकेले में भोग तो ठीक है। पर योग में क्या भोग है। योग तो प्रयोग है। सब मिलकर करें। क्या विरोध है i मोदी को अच्छा लगता है, तो खुद भी करते हैं और देश को भी कराना चाहते हैं। पर आप कहते हैं कि नाटक है। आप करें तो योग और देश करे तो नाटक i यह तो कोई मनोरोग है। 

क्या संयोग है i आज मैं भी योगमय हूं। योगी तो नहीं हूं, पर रोगी भी नहीं हूं। पता नहीं कि इसमें योग का रोल है या ईश्वर का। पर मोदी का रोल तो हर्गिज नहीं है। याद आ रहा है कि कभी मैंने भी योग की विधिवत शिक्षा ली थी। तब बाबा रामदेव का नामोनिशान नहीं था। तब भारत के रासपुतिन माने जाते थे - योगी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी। मैंने उनके कटरा (जम्मू-कश्मीर) स्थित विश्वायतन योगाश्रम में योग की शिक्षा ली थी। यह 1986 की बात है। तीन महीने का कठोर योग प्रशिक्षण। देश के चुनिंदा प्रशिक्षणार्थियों में शामिल था मैं। धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने खुद साक्षात्कार लेकर प्रशिक्षण के लिए चुना था। और प्रशिक्षण देने भी वे खुद और उनके केन्द्र के एक निष्णात योगी योगाचार्य अरुण कुमार डे आते थे। अद्भुत प्रशिक्षण था वहii मेरे जीवन के स्वर्णिम दिन थे वे। आसन, प्राणायाम से लेकर ध्यान, धारणा और समाधि तक की विधि का प्रशिक्षण।

हठ प्रदीपिका में वर्णित हठयोग के चारों अंग - आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्डसंहिता में वर्णित सातों अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में वर्णित आठों अंग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का सांगोपांग अध्ययन और अभ्यास भी।

स्थूल व्यायाम से लेकर सूक्ष्म व्यायाम, नाड़ी शोधन क्रियाओं से लेकर त्राटक और सम्मोहन तक। सबकुछ सीखा हमने, पर ना सीखी वह होशियारी, जो किसी बाबा ने सीख ली। योग को उत्पाद बना दिया। योग का बाजार बना दिया। आज योग में बाजार है। और बाजार में योग है। राजपथ पर योग है और अग्निपथ पर राहुल हैं।

पर ये योग है क्या? मैंने तभी पढ़ा था कि, जीवात्मा का परमात्मा से मिलन योग है। सूर्य और चंद्र का मिलन योग है। अपान का प्राण से मिलन योग है। योगदर्शन में पंतजलि कहते हैं - 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है 'योग: कर्मसु कौशलम्‌' (कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं)। श्रीकृष्ण कहते हैं- 'योगस्थ: कुरु कर्माणि' यानी योग में स्थित होकर कर्म करो। बौद्धमुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मतावलंबी भी अलग अलग तरीके से अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ योग का सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं। संसार को मिथ्या माननेवाले अद्वैतवादी भी इसका समर्थन करते हैं और अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी। आज तो दुनिया के तमाम मुल्क योग को स्वीकार कर रहे हैं। इसमें ईसाई मुल्क भी हैं और मुस्लिम देश भी। क्योंकि मोटी मोटी बात ये है कि योग से शरीर ठीक रहता है।

एक उदाहरण याद आ रहा है - भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी की सुपुत्री निवेदिता जोशी किसी ऐसी बीमारी से ग्रसित थीं कि बैठ तक नहीं पाती थीं। यह कोई 18-19 साल पहले की बात है। आखिर में दक्षिण भारत के प्रसिद्ध योगी डॉ. वीकेएस अयंगर ने निवेदिता को योग के उपचार से ठीक किया। यह बात मुरली मनोहर जोशी ने स्वयं कई साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने विज्ञान भवन में बतायी थी। आज निवेदिता खुद एक कुशल योग प्रशिक्षक हैं। दिल्ली के दीन दयाल शोध संस्थान में योग सिखाती हैं। उन्हें योग का ज्ञान बाबा रामदेव से ज्यादा ही होगा। पर उन्होंने इसका स्वयं प्रचार नहीं किया। इसीलिए उन्हें भी कम लोग ही जानते हैं।

भारतीय दर्शन में वेदों को अपौरुषेय माना गया है। अर्थात वेद परमात्मा की वाणी हैं। इन्हें करीब दो अरब वर्ष पुराना माना गया है। ओशो रजनीश ऋग्वेद को करीब 90 हजार वर्ष पुराना मानते हैं। और इन वेदों में योग की चर्चा है। इससे समझा जा सकता है कि योग विद्या भारत में कितनी प्राचीन है। लगभग 3000 ई.पू. सिन्धु घाटी सभ्यता के समय की मोहरों और मूर्तियों में योगाभ्यास का प्रामाणिक चित्रण मिलता है। 'योगसूत्र' 200 ई.पू. योग पर लिखा गया पहला सुव्यवस्थित और प्रामाणिक ग्रंथ है। हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म में योग का अलग-अलग तरीके से वर्णन है। इन सबका मूल वेद और उपनिषद ही रहा है। वैदिक काल में यज्ञ और योग का बहुत महत्व था। ब्रह्मचर्य आश्रम में वेदों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र और योग की शिक्षा भी दी जाती थी। भारत में योग की करीब 41 प्रामाणिक पुस्तकें हैं। और अब तो योग पर दुनिया भर की भाषाओं में पुस्तकें उपलब्ध हैं।

महर्षि पातंजलि ने सबसे पहले 200 ई.पू. में वेदों में बिखरी योग विद्या का सही-सही रूप में वर्णन किया। पातंजलि के बाद योग का प्रचलन बढ़ा और यौगिक संस्थानों, पीठों तथा आश्रमों का निर्माण होने लगा, जिसमें सिर्फ राजयोग की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी। सन 1920 में पुरातत्व वैज्ञानिकों ने 'सिंधु सरस्वती सभ्यता' को खोजा था, जिसमें प्राचीन हिंदू धर्म और योग की परंपरा होने के सबूत मिलते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता को 3300-1700 बी.सी.ई. पुराना माना जाता है।

योग के अनेक प्रकार हैं। दरअसल योग की उच्चावस्था समाधिमोक्षकैवल्य आदि तक पहुँचने के लिए साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उन्हीं को योग के प्रकार कहते हैं।

शिवसंहिता के अनुसार -

मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोगस्तृतीयकः।

चतुर्थो राजयोगः (शिवसंहिता, 5/11)

 

जबकि गोरक्षशतक के अनुसार है -

मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात्,                                                                           एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते॥ (गोरक्षशतकम् )

तो उपर्युक्त दोनों श्लोकों के अनुसार योग के चार प्रकार हुए: मंत्रयोग, हठयोग लययोग व राजयोग।

पर आज की राजनीति में इन तीनों योगों की परिभाषा और व्याख्या सबकी अलग अलग है। मौजूदा राजनीति को देखें। मोदी सत्ता में हैं, राजयोग कर रहे हैं, तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी विरोध में हठयोग करते दिख रहे हैं। देश और दुनिया में इस लययोग की बयार है, तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे कुछ नेता इसको राजनीतिक मुद्दा बनाकर बयानबाजी के जरिये मंत्रयोग कर रहे हैं।

मोदी सरकार ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर राजपथ पर सामूहिक योग करने की योजना बनाई है। लेकिन कांग्रेस इसका मजाक उड़ा रही है। दिग्विजय सिंह कहते हैं कि मोदी के पास कोई विचार नहीं है और वे नौटंकी से अपनी नाकामियों को छिपा रहे हैं। यूपी के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने कहा है कि काश मोदी योग की जगह भूखे-लाचार जनता का पेट भर रहे होते। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि योग दिखावा के लिए नहीं, स्वयं करने की चीज है। वे ये भी कहते हैं कि बिहार में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का योग स्कूल मुंगेर में है, लेकिन योग दिवस पर इस योग स्कूल को शामिल नहीं किया गया है, यह बिहार के प्रति उपेक्षा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए नीतीश ने कहा कि क्या भाजपा अध्यक्ष ने अपना शरीर देखा है? उन्होंने कहा कि सुना है कि अमित शाह पटना में योग करने वाले हैं। भाजपा अध्यक्ष ने अपना शरीर देखा है? शाह यदि घर में योग करेंगे और नियमित योग करेंगे तो उनका स्वास्थ्य बढिया रहेगा।

 

राहुल गांधी कहते हैं कि मोदी अपने वादों से मुकर रहे हैं। लोगों को रोजगार चाहिए। पर मोदी ने पहले स्वच्छता की बात की और लोगों को झाड़ू पकड़ा दिया। अब वे राजपथ पर योग करने जा रहे हैं।

मोदी सरकार ने इस योग कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत तमाम कांग्रेस नेताओं को बुलावा भेजा है। पर कांग्रेस यह तय नहीं कर पा रही कि वह मोदी सरकार के इस योग कार्यक्रम में जाए या नहीं। वह इस आयोजन को नाटक, या एक फोटो ऑप बता रही है। हालांकि योग का विरोध करने के लिए कांग्रेस के पास कोई ठोस कारण है ही नहीं। राहुल गांधी को तो शायद यह भी पता  नहीं हो कि इस देश में योग शिक्षा की शुरुआत कांग्रेस की सरकार ने ही की थी।

इसका श्रेय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार को है, और तब के प्रसिद्ध योग गुरु धीरेन्द्र ब्रम्हचारी को। धीरेन्द्र ब्रम्हचारी (12 फरवरी 1924 – 9 जून 1994) का व्यक्तित्व आकर्षक था। योग की जबर्दस्त साधना उन्होंने कर रखी थी और उतना ही ज्ञान भी था। आज के बाबा लोगों से कहीं ज्यादा। वे गंभीर पुरुष थे। पर राजनीति में उन्हें भी फ्लाइंग बाबा कहा जाने लगा था। वे इंदिरा गांधी के करीबियों में से थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा गांधी को योग सिखाने के लिए धीरेन्द्र ब्रम्हचारी को लगाया था। इंदिरा आजीवन योग करती रहीं। दिलचस्प तथ्य ये भी है कि राजनीति में इंदिरा गांधी के धुर विरोधी रहे राज नारायण भी आजीवन योग साधना करते रहे। हालांकि कहते हैं कि इंदिरा का धीरेन्द्र ब्रम्हचारी से योग सीखना राजीव गांधी को पसंद नहीं था। पता नहीं कि राहुल गांधी को योग में रुचि है या नहीं।

धीरेन्द्र ब्रम्हचारी को तब सोवियत संघ की सरकार ने अपने अंतरिक्ष यात्रियों को योग सिखान के लिए मॉस्को बुलाया था। वे दूरदर्शन पर योग सिखाने वाले पहले योगी थे। उनके कहने पर ही इंदिरा गांधी ने पहले दिल्ली के स्कूलों में और फिर 1981 में देश के केन्द्रीय विद्यालयों में योग शिक्षा को अनिवार्य बनाया था। हालांकि नौकरशाहों ने योग के साथ शारीरिक व्यायाम विषय को जोड़कर योग शिक्षा का कबाड़ा कर दिया। इससे योग शिक्षक के नाम पर शारीरिक व्यायाम कराने वाले भरते चले गये।

राहुल गांधी को शायद यह भी याद नहीं हो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, जो 1986 में कांग्रेस सरकार ने बनायी थी, उसमें भी साफ लिखा है कि शरीर और मन के समेकित विकास के साधन के रूप में योग शिक्षा पर विशेष बल दिया जाएगा। सभी विद्यालयों और शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में योग की शिक्षा भी सम्मिलित की जाएगी।

बहरहाल महर्षि पतंजलि ने समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। योगाडांनुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेक ख्यातेः (1/28) । इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्तप्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेकख्याति प्राप्त होती है। राजनीति में राहुल गांधी समेत अनेक नेता ऐसे हैं, जिन्हें विरोध का हठयोग करने की बजाय क्रियायोग करने की जरूरत है।


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