खबरार्थ. पता नहीं कि यह एक-समान बौद्धिक स्तर का मामला है या है एक सरीखी राजनीतिक समझ का असर. सोनिया गांधी कर्नाटक में कानून के निशाने पर आ गयी हैं और प्रियंका गांधी वाड्रा सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रही हैं. मां सोनिया के खिलाफ पीएम केयर को लेकर फर्जी जानकारी प्रसारित करने का मामला दर्ज करवाया गया है. इधर, प्रियंका पर आरोप है कि वह प्रवासी श्रमिकों के नाम पर सस्ती वाहवाही लूटने की राजनीति कर रही हैं. कांग्रेस अध्यक्ष का मामला अब कानून के पास है, इसलिए उस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है. लेकिन उनकी कांग्रेस महासचिव बेटी प्रियंका से कुछ सवाल तो किए ही जा सकते हैं. पहला प्रश्न यह कि क्या उनके लिए उत्तरप्रदेश ही समूचे भारत का पर्याय है. प्रवासी मजदूर तो राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित पंजाब में भी फंसे हुए हैं. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार ही है.

तो फिर श्रीमती वाड्रा क्यों नहीं इन राज्यों के लिए बसों के इंतजाम में कोई रूचि ले रही हैं? शायद मामला खुन्नस निकालने का है. आखिर उत्तरप्रदेश की बदली आबोहवा का ही असर है कि कांग्रेस वहां से अपनी परंपरागत सीट अमेठी तक हार चुकी है. बीते लोकसभा चुनाव में जिस उत्तरप्रदेश की जिम्मेदारी के साथ प्रियंका का विधिवत राजनीतिक पदार्पण हुआ था, उसी राज्य में उनकी पार्टी केवल एक सीट ही जीत सकी. कहां तो प्रियंका ख्वाब देख रही थीं वाराणसी सीट से नरेंद्र मोदी को हराने का और कहां अमेठी सीट पर अपने भाई राहुल को हारने से नहीं बचा सकीं. श्रीमती वाड्रा ने भाजपा को कमजोर करने के लिए भीम आर्मी से हाथ मिलाने का प्रयास किया, लेकिन आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर रावण ने पूरी बदतमीजी के साथ उनका हाथ झटक दिया था. इसलिए प्रियंका उत्तरप्रदेश में अपने और अपने कुनबे के घनघोर सियासी पराभव की तिलमिलाहट से उबर नहीं पा रही हैं.

देखिये ना, बीमारी से बड़ी संख्या में तो राजस्थान में भी बच्चों की मौत हुई थी, लेकिन प्रियंका ने उस पर मुंह भी नहीं खोला था. जबकि उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में ऐसी ही मौतों को लेकर वे पूरा समय योगी सरकार को गरियाती नजर आ रही थीं. ठीक इसी तरह का आचरण वह प्रवासी श्रमिकों की समस्या को लेकर कर रही हैं. मजेदार बात यह कि यूपी वाली होशियारी दिखाने से पहले प्रियंका ने अपनी मां के ऐसे ही एक कदम की नाकामी की तरफ कोई ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी. चार-छह दिन पहले ही सोनिया ने प्रवासी श्रमिकों से ट्रेन का किराया लिए जाने का मामला उठाया था. आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस गरीब तबके पर रहम नहीं कर रही. तब वे जोश मे यह भी कह गयीं कि कांग्रेस श्रमिकों का किराया देने को तैयार है. जैसा कि होना था, मामला टांय-टांय फिस्स हो गया. न केंद्र ने सोनिया के आरोप को खास तवज्जो दी और न ही श्रमिक उनसे प्रभावित हुए, और किराया, उसका तो अब तक कोई अता-पता ही नहीं है.

इतने प्रत्यक्ष उदाहरण के बावजूद प्रियंका ने उत्तरप्रदेश के लिए एक हजार बसें भेजने की बात कह दी. उत्तरप्रदेश सरकार ने भी जवाबी राजनीति शुरू कर दी. पता चला कि जिन वाहनों को बस बताकर उनके नंबर दिए गए, उनमें से कई दो और तीन पहिया वाहनों के नंबर निकले. चौबीस घंटे से अधिक हो गए. प्रियंका आरोप लगा रही हैं कि उनकी बसों को राज्य में घुसने नहीं दिया जा रहा. कोई उनसे पूछे कि यदि ऐसा है तो फिर इन बसों का रुख राजस्थान, छत्तीसगढ़ या पंजाब की तरफ क्यों नहीं कर दिया जा रहा. श्रमिक तो हर जगह भटक ही रहे हैं. जाहिर है कि आपकी रूचि प्रवासी श्रमिकों की समस्या के समाधा में नहीं है. उनका पूरा ध्यान इस तरफ है कि किस तरह उत्तरप्रदेश की योगी सरकार को श्रमिक-विरोधी के तौर पर प्रचारित किया जा सके. कोरोना की त्रासदी से भी अधिक पीड़ादायक त्रासदी उस पर हो रही राजनीति है.

इस बीमारी का खौफ जब खत्म होगा, तब यह भी सामने आएगा कि वैसा होने तक देश के राजनीतिक वातावरण में किस कदर बदनीयती के विषाणुओं का और प्रसार हो चुका है. उत्तरप्रदेश में यदि सरकार प्रियंका द्वारा उपलब्ध कराई गयी बसों का उपयोग बेवजह नहीं कर रही, तो निश्चित ही यह भी घोर आपत्तिजनक आचरण है.

क्योंकि ये समय किसी भी तरह, किसी के भी द्वारा अधिक से अधिक लोगों के लिए राहत सुनिश्चित किए जाने का है. अलग-अलग राज्यों में फंसे मजदूरों की आबादी करोड़ों में है. निश्चित ही कुछ विशेष ट्रेन या बसों के माध्यम से उन सभी को सुरक्षित वापस नहीं लाया जा सकता है. इसलिए ऐसे में प्रियंका की बसों वाली पेशकश सराही जा सकती थी, बशर्ते वे यह साफ कर पाती कि इन वाहनों के नाम पर दो और तीन पहिया वाहनों के नंबर देने जैसा गड़बड़झाला नहीं किया गया है. उनका सम्मान और बढ़ जाता, यदि वे वाकई इतनी संख्या में उपलब्ध बसों को अन्य राज्यों के लिए उपलब्ध करवा देतीं. केवल उत्तरप्रदेश पर मेहरबानी और केवल इसी राज्य की सरकार से दुश्मनी, ये ऐसे तत्व हैं, जो प्रियंका की राजनीति में संकीर्ण विचारों के वायरस की मौजूदगी की तरफ इशारा कर रहे हैं. अब इससे कांग्रेस को उत्तरप्रदेश में कोई फायदा हो पाएगा या नहीं कहना मुश्किल है. अभी तो कांग्रेस वहां चौथे-पांचवें नंबर की पार्टी है.

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