विश्लेषण. आखिरकार  देशभर में शराब की बिक्री की शुरुआत कर दी गई और जैसी कि आशंका थी, वैसा ही हुआ भी.  दुकानें खुलने भर की देर थी कि भारी भीड़ सुरापान का आनंद लेने के लिए शराब पर टूट पड़ी. सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़नी ही थी, सो उड़ी. इस भीड़ को नियंत्रित करने का कोई भी मैकेनिज्म स्थानीय पुलिस के पास नजर नहीं आया सिवाय इसके कि वह शराब के लिए उमड़े लोगों को  समझाती, डराती, धमकाती या लठियाती रही. सुरा प्रेमी खरीदारों के लिए बनाए गए गोले कामयाब नहीं हुए और भारी भीड़ और धक्का-मुक्की करीब करीब हर उस राज्य एवं शहर में देखने को मिली जहां-जहां भी शराब की बिक्री खोली गई थी.

शराब की बिक्री खोलने के निर्णय पर बुद्धिजीवी, पत्रकार और  सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं विपक्ष की आपत्ति भरी उंगलियां उठनी ही थी और उठी भी. भारत में आमतौर पर कम से कम मध्यम वर्ग और निम्न मध्य वर्ग में शराब का सेवन बहुत अच्छा नहीं माना जाता है और आज भी इस वर्ग के लोग शराब को छिपा कर पीने में ही यकीन रखते हैं.  हालांकि उच्च वर्ग में सुरा पान अब एक बहुत सामान्य बात है. उन्हें मद्यपान को छिपाने की जरूरत भी महसूस नहीं होती, साथ ही साथ इस वर्ग में इतना सामथ्र्य एवं कौशल है कि उसे शराब खरीदने के लिए किसी मधुशाला के सामने जाकर खड़ा नहीं होना पड़ता बल्कि होता तो यह है कि अपनी अमीरी का इस्तेमाल करते हुए वह शराब हासिल कर लेते हैं. इस बार भी मधुशालाओं के सामने लगी हुई भीड़ में उसी प्रकार से यह उच्च वर्ग शामिल नहीं था जैसे नोटबंदी के समय बैंकों के आगे लगी लाइन में यह दिखाई नहीं दिया था बल्कि अपनी सुरापान की इच्छा को पूरा करने के लिए इस वर्ग ने निर्धन एवं निम्न मध्यवर्गीय लोगों को इस्तेमाल किया.

सामान्य सी समझ की बात है कि लाकडाउन के लगभग 50 दिन पूरे होने को आ रहे हैं और लाइन में वह वर्ग ही सबसे अधिक संख्या में लगा हुआ है जिसके भूखों मरने की आशंका सबसे ज्यादा थी यानी एक बहुत ही औचित्य भरा प्रश्न यह खड़ा होता है कि आखिर इस वर्ग के पास शराब खरीदने के लिए पैसे आए कहां से? अस्तु ऐसे प्रश्न उठते रहेंगे.

अब आते हैं उस मुद्दे पर कि आखिर सरकारों को शराब की बिक्री खोलने का निर्णय लेना ही क्यों पड़ा तो इस विषय में यदि सरकारी सूत्रों एवं अर्थशास्त्रियों की मानंे तो शराब की बिक्री खोलना सरकार के लिए इसलिए जरूरी था क्योंकि शराब की बिक्री से उसे भारी मात्रा में राजस्व की प्राप्ति होती है और पिछले 50 दिनों से जिस प्रकार लाकडाउन के चलते हुए अर्थव्यवस्था की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था, उसे कम करने के लिए कहीं न कहीं से सरकार को व्यवस्था तो करनी ही थी. एक प्रकार से कहंे तो लाकडाउन थ्री की शुरुआत में ही प्रधानमंत्राी ने जान के साथ जहान भी बचाने की जो बात कही थी, वह एक प्रकार से शराब की बिक्री खोलने का संकेत भी रहा होगा.

वैसे जिस योजना के तहत सरकार ने शराब की बिक्री खोली, उसकी पूर्ति भी होती दिख रही है क्योंकि विभिन्न राज्यों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि पिछले चार-पांच दिनों में ही भारत के केवल कुछ ही राज्यों में हजारों करोड़ रुपए की शराब की बिक्री हुई. शराब की बिक्री खुलने के पहले ही दिन अकेली दिल्ली के लोग करीब 225 करोड़ रुपए की शराब पी गए ,वहीं उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा लगभग 800 करोड़ का निकला. इतना ही नहीं, जब इन प्रदेशों में शराब से प्राप्त होने वाले राजस्व पर दूसरे राज्यों की निगाह गई तो उन्होंने भी कोरोना विस्फोट के खतरे के बावजूद भी शराब की बिक्री खोल दी.

जब ठेकों पर दिल्ली में भारी भीड़ उमड़ पड़ी तब वहां के मुख्यमंत्राी अरविंद केजरीवाल ने इस आपदा को अवसर में बदलने के लिए वहां शराब की खरीदारी पर 70 प्रतिशत का भारी कर लगा दिया. उत्तराखंड में भी शराब के रेट बढ़ाए गए और पंजाब में भी कोरोना सेस लगाया गया लेकिन किसी भी जगह इन वृद्धियों के बावजूद न तो शराब की बिक्री पर अधिक फर्क पड़ा और न ही भीड़ कम हुई. इस आधार पर कह सकते हैं कि नशीली वस्तुओं पर सीमांत तुष्टि गुण का अर्थ शास्त्राीय नियम लागू न होने की बात यहां शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुई.
शराब के साथ साथ ही सरकारों ने पेट्रोल एवं डीजल के दामों में भारी वृद्धि करके भी राजस्व कमाने की नीति अपनाई कह सकते हैं कि आज के समय में डीजल एवं पेट्रोल अब विलासिता की वस्तु नहीं रहे हैं. पहले ही पेट्रोल एवं डीजल पर इतना अधिक टैक्स है कि आम आदमी की कमर ही इससे नहीं टूटी हुई है अपितु मुद्रास्फीति एवं महंगाई बढ़ाने में इन कारों का बड़ा भारी रोल है. चलिए शराब जैसी वस्तुओं की खपत कम करने के लिए आपने भारी टैक्स लगाया तो किसी हद तक इसे स्वीकार किया जा सकता है लेकिन जब सारी दुनिया में डीजल एवं पेट्रोल के रेट लगातार गिर रहे हैं. ऐसे में इनकी कीमतों में वृद्धि करना उचित नहीं जान पड़ता अतः सरकार को इस विषय में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है.

बेशक अर्थव्यवस्था को प्राणवायु देना उसे गति प्रदान करना उसकी मजबूती को बनाए रखना सरकार के लिए आवश्यक है. इसके लिए विपरीत परिस्थितियों के बावजूद व्यवस्थाएं करनी ही होंगी लेकिन अर्थव्यवस्था के साथ साथ व्यवस्थापन यानी योजनाबद्ध प्रबंधन का होना भी आवश्यक है. यदि शराब बेचनी ही है तो हर हाल में ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे भीड़ न लगे और देश में कोरोना का विस्फोट न हो.

पहले ही कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या लगातार एवं अनुपातिक रूप से भी बढ़ रही है और आज देश में करीबन 60000 लोग संक्रमण के शिकार हैं तथा 2,000 से अधिक व्यक्तियों की जानंे जा चुकी हैं. महाराष्ट्र दिल्ली पंजाब कर्नाटक तमिलनाडु उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्थिति बद से बदतर की तरफ बढ़ रही है. सच मानिए यदि किसी भी कारण से कहीं से भी चूक हुई तो भारत के केवल कुछ महानगर ही कोरोना के ऐसे हाट स्पाट बन जाएंगे कि फिर उस पर नियंत्राण असंभव प्राय हो जाएगा और यदि यह संक्रमण महानगरों एवं शहरों से होता हुआ गांवों तक पहुंच गया तो स्थिति अमेरिका ब्रिटेन फ्रांस इटली जैसे देशों से भी बदतर हो सकती है.

भले ही दिल्ली की सरकार ने ई कूपन की व्यवस्था की लेकिन पहले  दिन तो इसका कोई खास असर नजर नहीं आया और ठेकों पर बदस्तूर भीड़ उमड़ती रही जिसकी मुख्य वजह यह भी है कि उसके द्वारा जारी एक कूपन व्यवस्था की जानकारी का सही तरीके से प्रचार नहीं किया गया. सामान्य लोगों की या तो वह पहुंच से दूर रहे या फिर उनकी समझ में ही ई कूपन वाली बात नहीं आई. इसके साथ ही आम भारतीयों की ‘सब चलता है, अरे कुछ नहीं होता’ जैसी सोच की प्रवृत्ति भी इसकी वजह रही.

जिस गति से कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है यदि उसके कारणों की तह में जाया जाए तो निजामुद्दीन की जमात से लेकर मजदूरों का माइग्रेशन लोक डाउन के नियमों की अवमानना करना, सामान्य समझ एवं बुद्धि का उपयोग न करना तथा किसी हद तक व्यवस्थापन में लगे कुछ अधिकारियों एवं कर्मचारियों का व्यवहार भी इसमें शामिल है.
सार रूप में कहना होगा कि भले ही अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के मुकाबले अभी भारत में कोरोना का संक्रमण अधिक नहीं है लेकिन हम अपने आप को खतरे से बाहर भी नहीं मान सकते और यदि इस बारे में जरा सी भी चूक या लापरवाही हुई तो कोरोना का विस्फोट बड़ा ही भयंकर होगा लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि इस देश की केंद्र एवं राज्यों की सरकारें स्थानीय प्रशासन तथा आम जनता के सहयोग से भारत कोविड-19 को मात देने में सफल हो जाएगा.

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