प्रदीप द्विवेदी. जैसा कि सभी जानते हैं निर्भीक पत्रकार कीर्ति राणा जब लिखते हैं, तो किन्तु-परन्तु के लिए जगह नहीं छोड़ते हैं. लंबे समय से मध्यम वर्ग परेशान है, लेकिन उसके अहसास को बहुत कम शब्द मिल पाए हैं. कीर्ति राणा ने बेबस भारतीय मध्यम वर्ग के अहसास, डर, परेशानियों, जरूरतों और वास्तविकता को शब्द दिए हैं- बेबस भारतीय मध्यम वर्ग और उसका उधार का सिंदूर! में, वे कहते हैं..... मध्यम वर्ग बोले तो उधार का सिंदूर, बाकी की तरह वह भी दो महीने से घरों में कैद है लेकिन इज्जत और झिझक की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पा रहा है. मध्यम वर्ग की तड़क भड़क उधारी या बैंक लोन बिना संभव ही नहीं, यह हकीकत सरकार को और सेवा करने वाले संगठनों को भी समझ नहीं आ रही है. इन सब को यही लगता है बढ़िया फ्लैट, मकान, गाड़ी, फ्रिज, टीवी सब तो है, इन्हें काहे का संकट. इस वर्ग की चुनौती यह है कि मकान बनाना या फ्लैट-गाड़ी-व्हीकल खरीदना हो, हर सपना पूरा करने के लिए बैंक लोन पर निर्भर रहना है. बच्चों के बेहतर एजुकेशन के लिए, पब्लिक स्कूल का खर्चा बाद की ऊंची पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन, अचानक बीमारी-दुर्घटना में महंगे इलाज में राहत के लिए इंशुरेंश की किश्त, टीवी-फ्रिज आदि के लिए लोन यानी घर की खुशहाली का अखंड दीपक उधार के सिंदूर से ही रोशन रहता है!

देश की कुल आबादी के इसआधे हिस्से की हालत तनख्वाह का दिन आने तक नतीजा ठनठन गोपाल जैसी हो जाती है. बैंक किश्तों केपीडीसी पहले ही तैयार रहते है, उसके बाद महीने की उधारी चुकाने के बाद बचा पैसा बिजली, पानी, दूध आदि के बिल भरने के बाद आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया वाली हालत हो जाती है. टैक्स चुकाने वाले इस मध्यमवर्ग की इस कोरोना काल ने कमर तोड़ दी है. निजी संस्थान बंद रहने से फिलहाल तनख्वाह भी नहीं है, लेकिन बैंक की किश्तों का मीटर, महीने का बाकी खर्च तो चालू है, थोड़ी बहुत जो बचत कर रखी थी वह भाप की तरह उड़ती जा रही है!

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https://www.facebook.com/kirtiranaji/posts/10207054660641379

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