प्रदीप द्विवेदी. केन्द्र और राज्यों के बीच कोरोना खर्चे के हिसाब-किताब में देश के मजदूरों का दम ही निकल गया. बस हो या रेल, कितना खर्च केन्द्र उठाएगा, कितना खर्च राज्य उठाएगा, इसी में उलझी रही सरकारें और मजदूर, मजबूर हो कर पैदल चलते रहे? इन पांच वर्षों में केन्द्र सरकार ने बेशर्मी के साथ जनता से पेट्रोल के अच्छेखासे दाम वसूल हैं, अभी तेल के भाव जमीन पर आ गए हैं, बावजूद इसके केन्द्र ने यह नहीं कहा कि हम तेल मुफ्त में देंगे, राज्य मजदूरों के लिए अपनी बसें लगाए.

हर राज्य के पास लाखों बसें हैं, यदि केन्द्र मुफ्त तेल दे देता तो लाखों मजदूर बहुत पहले ही अपने-अपने घर पहुंच गए होते, पैदल चल-चल कर उनका तेल नहीं निकल जाता. यही नहीं, जो मजदूर पहले आ गए थे, उनमें कोरोना संक्रमित नगण्य थे, लेकिन अब जो मजदूर आ रहे हैं, उनमें कई कोरोना संक्रमित मरीज हैं, मतलब- इस एक माह में उन्हें रोटी भले ही ना मिली हो, कोरोना जरूर मिल गया? बड़ा सवाल यह है कि ये मजदूर किसी राज्य के नागरिक हैं या देश के, यदि देश के नागरिक हैं, तो क्या केन्द्र की कोई जिम्मेदारी नहीं है.

कितने आश्चर्य की बात है कि मरनेवाले मजदूरों के लिए तो लाखों रुपयों के मुआवजे की घोषणाएं की जा रही हैं, किन्तु जब वे जिन्दा थे तब रेल का किराया देने की कोई व्यवस्था नहीं थी. विभिन्न सरकारों की ओर से मजदूरों को कागजों में इतना राशन बांटा गया कि कई वर्षों तक वे घर पर बैठे-बैठे खाते रहते, लेकिन वास्तव में असंतुलित वितरण के कारण कोई हाथ में कोरा कागज पकड़े ही रह गया, तो किसी के घर में पड़ा-पड़ा खाना सड़ गया. दरअसल, केन्द्र सरकार शुरू से ही चाहती नहीं थी कि मजदूर अपने घर जाएं, लेकिन वह उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाने में नाकाम रही, क्योंकि इसके लिए केन्द्र के पास कोई योजना ही नहीं थी.

आज कई मजदूर जो अपने घरों तक कोरोना संक्रमण ले कर जा रहे हैं, वह उसी जिद का परिणाम है, जिसके तहत न तो उन्हें घर जाने की स्वीकृति दी गई और न ही उनके शहर में ठहरने के लिए सुरक्षित जीवन का कोई पक्का इंतजाम किया गया. दस बाॅय दस के एक कमरे में रहने वाले आधा दर्जन से ज्यादा मजदूर संक्रमण से अपनेआप को कैसे बचाते. बहरहाल, कोरोना संकट के दौरान मजदूरों को जो जख्म मिले हैं, वे किसी भी पैकेज से भर नहीं पाएंगे!

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