नजरिया. केवल प्रेरक प्रवचन से स्वदेशी बाजार में जान नहीं आएगी, इसके लिए प्रायोगिक कदम उठाने होंगे?

जाहिर है, या तो विदेशी सामान की होली जलाइए या फिर स्वदेशी आंदोलन को भूल जाइए!

आजादी से पहले जब स्वदेशी आंदोलन चला था, तो वह केवल भाषणों तक सीमित नहीं था, उस समय बकायदा विदेशी सामान की होली जलाई गई थी.

आज तो बीएमडब्ल्यू कार, रोलेक्स घड़ी, आईफोन, काॅपर विजन चश्मा जैसे विदेशी प्रोडक्ट के साथ फोटो खिंचवाना शान की बात है?

ट्विटर के फोलोअर्स के दम पर देसी नेता की लोकप्रियता की पहचान होती है?

कोरोना संकट में देश की जो भी दशा हो, मजदूरों का जो भी हाल हो, विदेशी प्रमाण-पत्र हमारी कामयाबी के सबूत बनते हैं?

अभी भी हम स्वदेशी की बात कर रहे हैं, लोकल की बात कर रहे हैं, आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं और चीन से हटनेवाली विदेशी कंपनियों के भारत में स्वागत की तैयारियां कर रहे हैं?

हम सत्तर साल के विकास पर तो सत्तर हजार सवाल उठाते हैं, लेकिन इन पांच-छह वर्षों में फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्विटर जैसा एक भी स्वदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्म तैयार नहीं कर पाए हैं?

प्रधानमंत्रीजी! स्वदेशी का कोरा जिक्र मत कीजिए, इसके लिए वास्तविक प्रयास कीजिए?

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