रूबी. आज हम आपको रेल के इतिहास के विषय में बताना चाहेंगे. भारत में पहले यातायात के साधन बहुत पिछड़े हुए थे. वे केवल ऊंट, बैलगाड़ी, घोड़े आदि तक ही सीमित थे. ब्रिटिश कम्पनी जो एक व्यापारिक कम्पनी थी, ने माल को लाने ले जाने के लिए किसी सस्ते और आसान परिवहन साधन की खोज करनी आरंभ की. 1847 में लॉर्ड डलहौजी भारत में गवर्नर जनरल बने. वे उद्योग व व्यापार के विकास में रेलों की आवश्यकता से भली-भांति परिचित थे.

जून 1849 में ईस्ट इंडियन रेलवे की स्थापना हुई और उसके बाद उसी साल अगस्त में ग्रेट-इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे कंपनी की स्थापना भी हुई. उस समय रेलों के लोकोमोटिव यात्राी डिब्बे और माल-डिब्बे सभी का आयात किया जाता था. फरवरी 1852 में भारत में पहुंचने वालें प्रथम लोकोमोटिव का नाम ‘लॉट फाकलैंड’ था और सबसे पहली रेलवे लाईन 1853 मुंबई से थाना तक बिछाई गयी थी. यहां गाड़ी 16 अप्रैल 1853 को चली थी. उसमें मात्रा 33.6 कि.मी. की दूरी तय हुई थी. उसमें कुल चौदह डिब्बे थे और 400 यात्राी थे जो जे.जी. रेलवे कंपनी के प्रबंधक द्वारा उद्घाटन यात्रा के लिए आमंत्रित किए गए थे.

1905 तक लगभग 25,000 मील रेल पटरियों का जाल बिछ चुका था. आरंभ में भारतीयों को रेलों के निर्माण से कोई विशेष लाभ न हुआ क्योंकि रेलवे लाइनें मुख्य रूप से भारत का कच्चा माल उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को निर्यात बन्दरगाहों से जोड़ने के लिए बिछाई गई थीं. इन रेलों द्वारा भारत का कच्चा माल धड़ल्ले से इंग्लैंड जाने लगा और वहां का बना हुआ माल तेजी से भारत आने लगा. इससे भारतीय उद्योग धन्धों को हानि हुई किन्तु बाद में रेलों द्वारा ही भारतीय व्यापार कोे बढ़ावा भी मिला और देश का आंतरिक व्यापार खूब चमका. पूर्व दिशा में रेलों का विस्तार समतल क्षेत्रा के कारण तेजी से हुआ.

हावड़ा और दिल्ली को रेल द्वारा 1860 में जोड़ा गया. हावड़ा और मुंबई 1865 में एक-दूसरे से जुड़े. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 20वीं शताब्दी के पहले के कुछ दशकों में रेल तकनीक में आश्चर्यजनक विकास हुआ जिसमें इंजन की गति बढ़ी. देशों के साथ-साथ उपमहाद्वीपों में भी दूरियां तय की जाने लगीं. कोयले द्वारा रेलें चलने का प्रचलन काफी वर्षों तक भारत में रहा. आज भी कहीं-कहीं कोयले से रेलें चलती हैं. इसे वाष्पीय इंजन कहा जाता है. कोयले की सहायता से पानी गरम होता है.

फिर इसी गरम पानी के द्वारा भाप बनती है और इसी से इंजन चलता है. कोयले से चलने वाली रेल चलने पर जो धुंआ इंजन से निकलता है वह काफी हद तक वातावरण दूषित करता है इसीलिए धीरे-धीरे बिजली या डीजल द्वारा रेलें चलने लगीं. पिछली शताब्दी के लगभग अंत तक, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मोटरकारों की खोज और सड़क यातायात में विकास के कारण तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वायु यातायात में उन्नति के कारण रेल ट्रांसपोर्ट की प्रसिद्धि में थोड़ी बाधा अवश्य हुई थी. उसके कारण 1950 से 1960 तक रेलवे का विकास स्थिर ही रहा. वर्तमान भारत का रेलवे नेटवर्क संसार में बड़ा माना जाता है.

मार्च सन् 1994 में भारत का रेलवे नेटवर्क कोंकण रेलवे को छोड़कर 62,462 किलोमीटर था जो संसार में चौथा स्थान रखता है. भारत में आज भी रेल माल यातायात का लगभग 60 प्रतिशत तथा यात्राी यातायात का 40 प्रतिशत वहन करती है. आज भी हम देखते हैं कि निम्न वर्ग से लेकर उच्चवर्गीय लोग रेल की यात्रा करना पसंद करते हैं. वर्तमान भारत में कोयले से या भाप से चलने वाली रेलें लगभग समाप्त हो गयी हैं.

आज मेट्रो रेलें चलने लगी हैं. राजधानी एक्सप्रेस जैसी तेज चलने वाली रेलों में तो वायुयान की तरह सुख सुविधाएं उपलब्ध हैं. हमारे देश के बड़े-बड़े चिडि़याघरों में टॉय ट्रेन भी चलती है. दार्जिलिंग में टॉय ट्रेन का प्रचलन काफी है. उम्मीद है कि आगामी वर्षों में रेल की और भी अधिक प्रगति होगी.

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