जे॰के॰ शास्त्राी. कई महिलाएं स्वभाव से बेहद भावुक व संवेदनशील होती हैं. हर किस्म के व्यक्ति से बड़ी आत्मीयता से जुड़ जाती हैं. प्रथम परिचय में ही वे पास-पड़ोस की महिलाओं से दीदी, भाभी, चाची, मौसी आदि संबंध बना लेती हैं. इसके साथ ही शुरू होता है वस्तुओं का आदान-प्रदान, परिवार के सहभोज का कार्यक्रम एवं त्यौहारों पर भेंट का सिलसिला परंतु कोरी भावुकता और आतुरता से जुड़े अधिकतर संबंध रेत के महल की भांति छोटी-छोटी बातों पर टूटकर अक्सर जगहंसाई का कारण बन जाते हैं.

सच यह है कि इस प्रकार के संबंध वस्तुओं के आदान-प्रदान, छोटे-मोटे मजाकिया बोल चाल, बच्चों के झगड़ों तथा मान प्रतिष्ठा के प्रश्न को लेकर अक्सर टूट जाते हैं. परिणामस्वरूप जो परिवार कभी रक्त संबंधों से अधिक हमदर्द होते हैं, परंपरागत दुश्मन बन आत्मीय संबंधियों के भेद उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. वस्तुतः भावुक होना अच्छी बात है पर क्या जरूरी है कि भावुकता से जुड़े प्रत्येक स्नेह संबंध को किसी पारिवारिक रिश्ते का नाम दिया ही जाए. प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि संबंधों के मामले में अपनी भावुकता पर काबू रखे. किसी के लिए उतना ही त्याग करें जितनी आपकी सामर्थ्य हो.

अपनी पारिवारिक स्थिति को देखकर ही आप किसी की आर्थिक मदद कर सकते हैं. कई बार एक पक्ष तो स्नेह की डोर से बंधा होकर दूसरे पक्ष की हर सेवा व मदद को अपना फर्ज समझता है लेकिन दूसरा पक्ष इसे मूर्खता समझता है. कृत्रिम आत्मीयता दिखाकर वह इन संबंधों का तब तक लाभ उठाता है, जब तक उसका - स्वार्थ सिद्ध होता रहे. स्वार्थ के निकलते ही क्षुद्र बातों को लेकर लड़ाई-झगड़े, संबंध टूटने का एवं कुछ न मिल पाने का दर्द भी भावुक महिलाएं उठाती हैं.

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