डा. सूर्यप्रकाश अग्रवाल. भारत में जहां कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए चिकित्सीय व शासकीय उपाय अपनाये गये, वहीं सम्पूर्ण नागरिकों की दैनिक व्यवस्था को भी लाकडाउन के हवाले कर दिया गया. 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू लगाया गया. फिर 25 मार्च 2020 से इक्कीस दिन का लाकडाउन लगाया गया जिसको 17 मई 2020 तक बढ़ा दिया गया. लाकडाउन के खुलने के बाद भी विभिन्न छूटें नागरिकों को नहीं मिलेंगी अपितू नागरिकों को विभिन्न प्रतिबन्धों में रहने के लिए विवश होना पड़ेगा.

यदि शासन व प्रशासन द्वारा निर्धारित प्रतिबंधों का नागरिकों ने उल्लंघन किया तो कोरोना वायरस का आक्रमण दुबारा होते देर नहीं लगेगी. यदि नागरिकों को भविष्य में मुसीबतें नहीं चाहिए तो उन्हें मजबूर होकर ही सही, लाकडाउन के उपरान्त भी स्वयं को प्रतिबंधों में रहना पड़ेगा. लाकडाउन को भारत जैसा विकासशील देश अधिक समय तक बर्दास्त नहीं कर सकता. लाकडाउन का प्रत्येक दिन अपनी आर्थिक कीमत चुकाता है इसलिए प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी के द्वारा पहले जान है तो जहान है पर जोर दिया गया और फिर जान के साथ जहान पर भी जोर दिया जायेगा. सरकार की तरफ से वर्तमान में विभिन्न वर्गो के द्वारा जो छूट दी जा रही है.

उनकी एक कीमत होती है जो नागरिकों को ही चुकानी पड़ेगी. अतः नागरिकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छूटों का दुरुपयोग न हो अर्थात छूटों की फिजूलखर्ची न हो. गरीब, किसान, उद्योगपति, व्यापारी, छात्रा, अभिभावक, रेहडे़ वाले, खोंमचे वाले, रिक्शा वाले, कुली, आवासीय निर्माण क्षेत्रा के दैनिक मजदूर इत्यादि विभिन्न वर्ग सरकार से ही भारी मात्रा में छूट मांगते है. सरकार ने 1.75 लाख करोड़ रुपये का एक पैकेज जारी भी किया है. उधर भारतीय रिजर्व बैंक ने भी 50 हजार करोड़ रुपये की निवेश सहायता जारी की है. विश्व में प्रत्येक परिवार व व्यक्ति को कुछ न कुछ सहन करना ही पड़ रहा है.

लगभग चार लाख लोगों का कोरोना वायरस का परीक्षण भी हुआ. कोरोना वायरस के टेस्ट से लेकर चिकित्सा तक, पीपीई, थर्मल स्क्रीनिंग गन तक मुफ्त में तो नहीं आ जाता. रात दिन चिकित्सक, नर्स, चिकित्सीय कर्मचारी व अधिकारी दिन रात मेहनत करके लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचा रहे है. सरकार की आमदनी बंद अथवा कम हो गई है, व्यय कई गुना बढ़ गये है तो नागरिकों को ही इसकी भरपाई देर सवेर करनी ही पड़ेगी.

अगर हम लाकडाउन मंे निर्धारित अनुशासन में नहीं रहे और हमने अपनी बेबकूफी से ही कोरोना वायरस को आमंत्राण देना जारी रखा तो यह आर्थिक मार हम सब की कमर तोड़ देगी. अतः संयम व अनुशासन का वातावरण हमें बनाना ही पड़ेगा. भारत में करोड़ों लेागों ने रेहड़ी लाकडाउन की अवधि में नहीं लगायी है. वे हर दिन 250-400 रुपये कमा लेते थे. अब गुजारा उधार से चल रहा है. नेशनल हॉकर्स फेडरेशन के अनुसार देश भर में साढे़ चार करोड़ से अधिक रेहड़ी, पटरी, ठेले वालों में 95 प्रतिशत घर पर बैठे है अर्थात 9 हजार करोड़ रुपये दैनिक का टर्नओवर देने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के इस हिस्से की पूंजी तेजी से बिखर रही है.

पांव भाजी, गोल गप्पे, चाट वाले, फल सब्जी वाले, मसाले, अनाज, मोबाइल एसेसरीज बेचने वाले, घरों में कारखाने चलाने वाले, बिजली, एसी व अन्य उपकरणों को ठीक करने वाले मैकेनिक, परचूनियों की दुकान में सामान की आपूर्ति करने वाले, छोटे किसान, दैनिक विभिन्न मजदूरी पर काम करने वाले इत्यादि करोड़ों लोग जो आज उस स्थिति में पंहुच चुके है, जैसी उन्होंने गत पांच दशक में भी नहीं देखी होगी.

भारत में अर्थव्यवस्था से जुडी संस्था फिक्की के अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिदिन 40-50 हजार करोड़ रुपये की हानि हो रही है. विभिन्न उद्योगों व व्यापारिक संस्थानों के घाटे में जाने के कारण वर्ष 2020 में ही अप्रैल-सितम्बर माह में लगभग 3-4 करोड़ युवाओं की नौकरियां समाप्त होने की स्थिति में पहंुच जायेंगी. व्यापारियों व उद्योगपतियों के प्रतिष्ठानों पर ताला लगाने पर वे भी बेरोजगार होने की स्थिति में आ जायेंगे. बैंकों तथा विभिन्न रेटिंग एजेंसियों ने अर्थव्यवस्था के बढ़ने के अनुमान को पहले से कम कर दिया है.

एशियन डेवलमेंट बैंक चार प्रतिशत का अनुमान लगा रहा है. वर्ष 2020 के पूर्वानुमान को बार्कलेय ने ढाई प्रतिशत से घटा कर शून्य कर दिया है. फिच रेंिटंग्स का अनुमान है कि इसमें दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है. वर्ल्ड बैंक ने दक्षिणी एशिया के आर्थिक फोकस रिपोर्ट में इस बढ़ोत्तरी को ड़ेढ से 2.8 प्रतिशत के बीच रखा है जो गत दशक में सबसे कम है. विभिन्न संस्थानों के अर्थशास्त्राी मानते है कि अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ जा सकती है. लाकडाउन में सभी आर्थिक गतिविधियां बंद पड़ी हैं तथा लाकडाउन के ख्ुालने के उपरान्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर आते आते समय लग सकता है, अतः अर्थव्यवस्था में बढोत्तरी की सम्भावना कम ही है.

इससे बेरोजगारी बढ़ सकती है. वर्ष 1929-30 में विश्वव्यापी मंदी लगभग 10 वर्ष तक चली थी और उसे ग्रेट डि़प्रेशन का नाम दिया गया था. उस समय अमेरिका में वर्ष 1933 में बेरोजगारी की दर 24.9 प्रतिशत हो गयी थी. कुल कामगारों में बेरोजगारों का प्रतिशत बेरोजगारी की दर मानी जाती है. मंदी के दौर में बेरोजगारी की दर बढ़ जाती है क्योंकि बाजार में वस्तुओं की मांग कम हो जाती है तो उद्योग उत्पादन कम कर देते हैं. व्यापार कम हो जाता है तथा कामगारों की बड़ी मात्रा में छंटनी कर दी जाती है जिससे लोगों के पास क्रय शक्ति मुद्रा के अभाव व आय न होने के कारण से कम हो जाती है जिसका सीधा सीधा प्रभाव मांग पर पड़ता है.

कम्पनियों की आय कम हो जाती है. इसलिए प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी ने सभी व्यावसायी संस्थानों को अपने अपने कर्मचारियों की छटनी नहीं करने के लिए कहा है परन्तु लाकडाउन में आमदनी कम होने से आखिर कब तक कम्पनियां हानि उठा कर नौकरों का वेतन देती रहेंगी. दिल्ली, मुम्बई इत्यादि बड़े शहरों से जिस प्रकार बड़ी तादाद में श्रमिक अपने अपने स्थानों को लौट गये है फिर से उनके वापस आने की गति भी धीमी होगी जिसका सीधा सीधा प्रभाव उत्पादन पर पड़ेगा. किसान के खेत में अनाज की फसल तैयार है परन्तु मजदूर सब वापस चले गये. किसान के पास दूध है परन्तु होटल, रेस्टोरेंट व हलवाइयों का कारोबार बंद है तो दूध की मांग में 40-50 प्रतिशत की कमी होने से किसानों की आय कम हो गयी है.

गाय तो चारा खायेगी ही खायेगी अर्थात दूध की लागत तो आयेगी ही. किसान को सब्जी व फलों को बाजार तक पंहुचाने के लिए मजदूर व यातायात के साधनों का अभाव है. भारतीय रिजर्व बैंक ने भी केन्द्र सरकार का साथ देते हुए 17 अप्रैल 2020 को 50 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है जिससे उद्योग व वित्तीय संस्थाओं को बचाने का प्रयास किया जा रहा है. आर बी आई ने अगले वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है. वर्तमान सभी देशवासी एक जुट होकर इस लाकडाउन से उत्पन्न होने वाले खतरों का अनुशासन में रहते हुए मुकाबला करंे तो जहां लोग अपनी जान को बचा पायेंगे वहीं उनके धन में भी बृद्धि सम्भव हो पायेगी.

तेल की गिरती कीमतों तथा आरबीआई के पास पर्याप्त नकद कोष का फायदा देश को होगा. वह देश की अर्थव्यवस्था को गिरने नहंी देगी. लोंगों को लॉकडाउन से उत्पन्न होने वाली व्यापक हानि को झेलते हुए अनुशासन में रह कर ही इसका मुकाबला सुनिश्चित करना चाहिए.

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