प्रदीप द्विवेदी. प्रसिद्ध गैर-व्यवसायिक पत्रकार नारायण बारेठ लिखते हैं.... गाँधी का ख्वाब था भारत को सेल्फ रिलायंस यानि आत्म निर्भरता की तरफ ले जाए? अब नेता मिल कर रिलायंस की तरफ ले गए? जियो मेरे लाल जियो! बहरहाल, कोरोना संकट के कारण ही सही, हमें अचानक स्वदेशी आंदोलन याद आ गया?

पांच साल बाद ही सही, अब हम आत्मनिर्भर तो हो पाएंगे! पीएम मोदी, टीवी पर आए और आत्मनिर्भर होने का नया ज्ञान प्रदान किया, उन्होंने स्वदेशी के लिए प्रोत्साहित भी किया, लेकिन बहुत अच्छा होता यदि वे हाथों-हाथ विदेशी वस्तुओं की होली भी जलवा देते?

कम-से-कम हमें पता तो चलता कि कौन-कौन-सी वस्तुएं विदेशी हैं! मैं तो अक्सर लोगों के सूट-बूट देखकर ही चकरा जाता हूं कि यह स्वदेशी हैं कि गांधीजी की धोती स्वदेशी थी? गांधीजी ने सूट-बूट छोड़कर धोती अपना ली और एक हम हैं कि धोती छोड़कर सूट-बूट में आ गए हैं! मैं तो यह भी समझ नहीं पा रहा हूं कि बोइंग हवाई जहाज, बीएमडब्ल्यू कार, रोलेक्स घड़ी, आईफोन, काॅपर विजन चश्मा आदि स्वदेशी हैं या विदेशी हैं? मेरे स्वदेशी मोबाइल में धड़क रहा पार्ट चीनी है या स्वदेशी है?

स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में तो विदेशी भी हैं? फेसबुक, व्हाट्सएप्प, यू-ट्यूब आदि का स्वदेशी आंदोलन के प्रचार-प्रसार में योगदान स्वर्णअक्षरों में लिखा जाएगा! हमने ताली-थाली बजाई, दीप जलाए, तो इस बार विदेशी सामान की होली हो जाए?

*हाड़ा का एक कार्टून काफी है राजनेताओं का असली चेहरा दिखाने को....

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