आलोक सक्सेना. भरपूर आत्मीयता से भरा और जीवट किरदार निभाने वाले हम सब के चहेते ऋषि कपूर साहब जिंदगी का फलसफा (दर्शन शास्त्रा) छोड़ हमारे बीच अब नहीं हैं. ‘चांदनी ओ मेरी चांदनी, तू मेरी चांदनी, रंग भरे बादल से, तेरे नैनो के काजल से, मैंने इस दिल पे, लिख दिया तेरा नाम, चांदनी ओ मेरी चांदनी’ कहते-कहते, सभी के दिलों में बसे ऋषि कपूर इस धरा पर अपनी अभिनय लीला समाप्त कर हमारे बीच से जा चुके हैं.

वह मेरा नाम जोकर, बाबी, प्रेम रोग, याराना, कर्ज, दीवाना, तवायफ, सरगम, सागर और चांदनी आदि फिल्मों से हमारे दिल में बसे. यकीनन बेहतर अभिनय क्षमता के दम पर उन्होंने हम सभी के दिल पर अपना नाम लिख दिया था. भुलाए नहीं भूलेंगे उनके भावनात्मक पारिवारिक किरदार. उनके अंदर जमकर अभिनय करने और हर किरदार निभाने की क्षमता थी. उनके डायलाग प्रस्तुति का तो जवाब ही नहीं था. कमाल का जादू होता था उनकी डायलाग प्रस्तुतिकरण में.

आपको भी याद हैं न उनके डायलाग. ऐसा कोई भी ऋषि कपूर जी का हिंदी फिल्म प्रेमी न होगा जिन्हें आज भी उनके ये अदभुत डायलाग न याद हों, जनाब...., नवाजिश, कर्म, शुक्रिया, मेहरबानी..... मुझे बख्श दे अपनी जिंदगी (लैला मजनंू), हम दिल्ली वाले मुल्क के साथ-साथ दिल पे भी हुकूमत करना जानते हैं (चांदनी), रीत-रिवाज इंसान की सहूलियत के लिए बनाए जाते हैं. इंसान रिवाजों के लिए नहीं (प्रेम रोग), प्रेम तो वो रोग है जो आसानी से लगता नहीं और जब लग जाता है ना..... फिर आसानी से मिटता नहीं (प्रेम रोग), प्यार करने वाले एतबार का सर्टिफिकेट नहीं मांगते (कर्ज), हर इश्क का एक वक्त होता है.

वो हमारा वक्त नहीं था पर इसका मतलब नहीं कि वो इश्क नहीं था (जब तक है जान), सभी इंसान एक जैसे ही तो होते हैं, वही दो हाथ, दो पाव, आंखें, कान, चेहरा. सब एक जैसा ही तो होता है. फिर क्यों कोई एक, सिर्फ एक ऐसा होता है. जो इतना प्यारा लगने लगता है कि अगर उसके लिए जान भी देनी पड़े तो हंसते-हंसते दी जा सकती है (प्रेम रोग), बेखबर सोए हैं वो लूट के वोह नीदें मेरी, जज्बा-ए-दिल पे तरस खाने को जी चाहता है.

कब से खामोश हुए हो जाने-जहान कुछ बोल. क्या अभी और सितम देने को जी चाहता है (लैला मजनंू), गर्मी में गरम चाय, ठंडक पहुंचाती है (बाबी) और दर्द की दवा न हो तो दर्द को ही दवा समझ लेना चाहिए. उन्होंने फिल्मी पर्दे पर तमाम सारे किरदारों में अपनी भूमिका निभाई और जो छाप छोड़ी, उसे उनके प्रत्येक दर्शक के लिए भूल पाना बहुत मुश्किल है. आज उनके सभी चाहने वाले स्तब्ध हैं. चले जाने वाले की याद में, बस रह जाते हैं आंसू. आज उनका हरेक चाहने वाला उन्हें अपनी अश्रुपूर्ण विदाई दे रहा है. उन्होंने सदा सदाबहार किरदारों का अभिनय किया. उन्होंने भी अपने किरदारों को जीवंत बनाने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी.

इसीलिए उन्होंने अपने सभी दर्शकों के दिलों पर खूब राज किया. प्रयोगधर्मी सार्थक, आत्मविश्वासी और समर्पित कलाकार थे. रुपहले पर्दे पर उनका सदाबहार रोमांस हमेशा याद रहेगा. यूं तो सभी फिल्मों में उनका नृत्य बहुत उम्दा ही होता था मगर फिल्म चांदनी में जिस प्रकार, रंग भरे बादल से तेरे नैनो के काजल से मैंने इस दिल पे लिख दिया तेरा नाम चांदनी ओ मेरी चांदनी चांदनी ओ मेरी चांदनी.....! ऐसा जमकर नाचे कि आज वह चांदनी प्रिय ही बन गए. उनके चले जाने का दुःख तो बहुत है मगर सच तो यह भी है कि जीवन की विराट अदालत में हम सब कैदी हैं या रंगमंच के कलाकार . दोनों ही बातों में हमारी चाबी सुपर पावर परमपिता परमात्मा के हाथों में ही रहती है . बस, धरा पर आकर अपना-अपना अभिनय करना ही हमारा कर्म है .

जो समझ लेते हैं वो बेहतर अभिनय कर लेते हैं, अभिनेता बन जाते हैं और लोगों के दिलों पर सदा राज करते हैं . प्रत्येक मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा भी एक पहेली होती है. जो हल कर लेता है, वह सफल हो जाता है . आज फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर जी हमारे बीच नहीं हैं मगर उनके अभिनय का रंगमंचीय प्रभाव एक शक्तिशाली व्यक्तित्व की छवि उजागर करता है जो सदा प्रेरणादायक रहेगा . वह अपने दर्शकों के दिलों में सदा जीवित रहेंगे .

बस, अंत में फिर याद आ रहा है,- कब से तड़प रहा था दीदार के लिए, आंखें तरस गईं अपने यार के लिए (याराना) . और उन्हीं के अंदाज में, दिल पे लिखी तेरी बातों को पोंछ ना लूं मैं कभी भी क्योंकि मैंने इस दिल पे लिख दिया तेरा नाम, ओ ऋषि जी, ओ मेरे ऋषि जी ..... ! रोमांटिक फिल्मी दुनिया के इस कालजयी अभिनेता को आत्मीय, नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि..... .

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