अर्थ व्यवस्था. कोविड-19 इस समय सारी दुनिया एक महा विपत्ति के दौर से गुजर रही है. विगत एक शती में स्पेनिश फ्लू के बाद महामारियों में जन धन की इतनी व्यापक हानि नहीं हुई. स्पेनिश फ्लू (1918 - 1920) में मरने वालों का न्यूनतम वैश्विक आंकड़ा पांच करोड़ था. हालांकि उस समय चिकित्सा की सुविधायें नाममात्रा की थी किन्तु अमेरिका में कुछ शहरों में मास्क और सोशल डिस्टैंसिंग को आजमाया गया था और मृत्यु दर पर कुछ नियंत्राण किया जा सका था मगर डेनवर शहर में एक बड़ी भूल हो ही गयी.

वहां जबकि लाकडाउन और सोशल डिस्टैंसिंग से अपेक्षित परिणाम मिलने आरंभ हो गये थे और मृत्यु दर नियंत्रित हो चली थी, अनेक राजनीतिक और आर्थिक दबावों और प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के उत्सव अभिलाषियों की आकांक्षा के कारण सरकार को लाकडाऊन एक माह के भीतर हटाना पड़ा जिसके भीषण परिणाम हुये और मृत्यु दर सहसा अनियंत्रित हो गयी. स्पेनिश फ्लू ने लगभग सभी को अपने चपेट में ले लिया था. हमें इतिहास का यह सबक नहीं भूलना है.

कोविड के मामले में ज्यादातर आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं. फूंक फूंक के कदम उठाना है. भारत में भी सामाजिक आर्थिक कारणों से सरकार पर लाकडाउन खत्म करने का दबाव है. विरोधी दल अभी तो चुप हैं मगर वे भी जनता की नब्ज पहचान कर लाकडाउन के विरोध में उतर सकते हैं. अभी तो प्रधानमंत्राी मोदी के आह्वान पर जनता का भरपूर सहयोग व समर्थन मिल रहा है, इसलिए विरोधियों का मुंह सिला हुआ है मगर एक जमाती समुदाय लाकडाऊन का धुर विरोध अपने पत्थरबाजी, थूक आदि साधनो से यथासंभव तो कर ही रहा है.

मगर यदि लाकडाउन एकदम से खत्म हो जायेगा तो फिर संक्रमण के बेकाबू हो जाने का पूरा अंदेशा है. खास आकलन यह है कि अभी भारत के शहरों में ही मुख्यतः संक्रमण सिमटा हुआ है और हाट स्पाट चिह्नित कर इसे फैलने से रोकने के प्रयास सरकारें जी जान से कर रही हैं. अभी तो इसने गावों का रुख ही नहीं किया है. जैसे ही शहरों और गांवों का बेरोक-टोक आवागमन शुरु होगा, गांव गांव इससे सुरसा रुपी संक्रमण के चपेट में आ जायेंगे.

इसलिये लाकडाउन खुलने के अभिलाषियों को अभी अपने मन पर काबू रखना होगा. लाकडाउन शनैः शनैः-शनैः जोखिम मूल्यांकन करके ही खुलना चाहिये भले ही लाख दबाव हों. और एक नग्न यथार्थ तो अब सामने आ ही गया है कि महामारी के बाद दुनिया कुछेक वर्षों तक वैसी नहीं रह जायेगी जैसी वह अब तक रही है. मौज मस्ती, सैर सपाटा, सेमिनार सम्मेलन के स्टीरियोटाइप गये समझिये. ये सब क्रिया कलाप डिजिटल दुनिया में स्थान पायेंगे.

जूम और गूगल मीट जैसे ऐप और डिजिटल सुविधायें आ भी गयीं हैं. मीटिंग सम्मेलन कुछेक वर्ष अन्तर्जाल तक ही सीमित हो जायेंगे. ब्याह शादी, मुंडन जन्मदिन के उत्सव आयोजन बस एक घरेलू कार्यक्रम तक ही सीमित रखना बुद्धिमानी होगी. मृत्युभोज के भव्य आयोजनों पर भी कोरोना का चाबुक चल गया है. कर्मकांड के तेरह ब्राह्मणों का भी जुगाड़ मुश्किल हो गया है. भले ही द्रव्यलोभी चंद मूढ़ ब्राह्मण अभी भी सचेत नहीं हुये हैं मगर गांवों में संक्रमण से वे भी सजग हो जायेंगे. नया कोरोना हमारे बीच ही कुछेक वर्षों के लिये स्थायी तौर पर रहने के लिये आ गया है. यह कटु सत्य जितना शीघ्र लोगों की समझ में आ जायेगा, वे सुरक्षित हो लेंगे.

बस केवल एक मूलमंत्रा - भौतिक दूरी और आवागमन पर यथा संभव बंदिश. जान बची रहेगी. निजी सेक्टर की नौकरियाँ तो बड़े पैमाने पर जायेंगी मगर संभव है कि कुछ नये क्षेत्रा में नौकरियां मिलें जैसे इन्श्योरेन्स जो जन धन के एवज के आकर्षक पैकेज लेकर आयेंगी. भारत में हो सकता है कई विदेशी इन्श्योरेन्स कंपनियां नौकरियों की नयी संभावनायें जगायें. उत्पादन से जुड़े कई उद्योग भी नयी हिम्मत और निवेश से उठ खड़े होंगे जहां श्रमिक वर्ग लाभान्वित होगा मगर इन्हें भी फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ ही अपने उत्पादन प्रक्रिया को समंजित करना होगा.

सिनेमाहालों और माल संस्कृति के शायद अवसान के दिन हों. माल तो फिजिकल डिस्टैंसिंग अपना कर संभल जायेंगे मगर सिनेमाहालों में तो हिम्मती ही जान जोखिम उठाकर जायेंगे. विदेश के आवागमन प्रतिबंधित होंगे. हो सकता है कि बिना ‘डिजिटल इम्युनिटी कार्ड‘ के बाहर जाने की अनुमति न मिले. सरकारें विदेश यात्रियों के लिये पासपोर्ट के साथ ही उनका इम्युनिटी स्तर जांचने के तौर तरीके ढूंढेगी और इस दिशा मंे शोध को बढ़ावा देंगी. आईसीएमआर जैसी सामान्यतः गुमनाम सी संस्थाओं की शोहरत होगी और यहां नौकरियों के आकर्षक पैकेज होंगे. चिकित्सा वैज्ञानिकों का सम्मान बढ़ेगा और इस क्षेत्रा में नौकरियां भी बढ़ेंगी.

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