गुरिन्द्र भरतगढि़या. महाराजा पटियाला भूपेन्द्र सिंह यद्यपि बहुत बड़े विद्वान, व्यवहार- कुशल,गहरी सूझ-बूझ वाले और नम्र ह्रदय वाले व्यक्ति थे, तथापि सुन्दर स्त्रिायाँ और शराब उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी.उनके पिता महाराजा राजिन्दर सिंह अत्यधिक शराब पीने के शौकीन कारण ही मात्रा 28 वर्ष की अल्पआयु में स्वर्ग सिधार गए थे. महाराजा भूपेन्द्र सिंह के शुभचिंतकों एवं सलाहकारों ने उनको इन आदतों से दूर रखने के भरसक प्रयास किए मगर फिर भी युवा अवस्था तक पहुँचते- पहुँचते वह स्वार्थी और लालची दरबारियों द्वारा रचे गए षड्यंत्रों का शिकार हो कर सुरा और सुंदरियों के रसिया हो गए.

चालबाज दरबारी उनके लिए दूर-दूर से कमसिन, चंचल और सुन्दर लड़कियाँ ढूँढ-ढूँढ कर लाते. महाराजा भूपेन्द्र सिंह भी आखिर पुरुष थे. वे कब तक अपने आप को बचा पाते. दीवान जर्मनी दास अपनी ‘महाराजा’ नामक पुस्तक में लिखते हैं कि जब महाराजा का स्वर्गवास हुआ तो उनके रनिवास में 332 स्त्रिायाँ थीं जिनमें दस महारानियाँ और पचास रानियाँ थीं. शेष उनकी चहेतियाँ, रखैलें और परिचारिकाएँ थीं जिनका कार्य था हर समय महाराजा की सेवा में रहना. महाराजा का जब भी जी चाहता, उनके साथ अपनी काम-पिपासा शान्त कर सकते थे. कुछ मामलों को छोड़ कर महारानियों, रानियों और महाराजा की चहेतियों में कई बातों में फर्क रखा जाता था.

जैसे महारानियों को जिन बर्तनों में भोजन परोसा जाता था वे सोने के होते थे. रानियों को चाँदी के और अन्य सभी स्त्रिायों को पीतल व कांसे के बर्तनों में भोजन परोसा जाता था. स्वयं महाराजा हीरे-जवाहरात जडि़त स्वर्ण बर्तनों में भोजन करते. खाने-पीने के शौकीन होने के कारण कई बार उनके सामने लगाई जाने वाली व्यंजनों की प्लेटों की संख्या डेढ़ सौ से कम नहीं होती थी. खाना परोसने का कार्य इटैलियन, अंग्रेज और हिन्दुस्तानी बैरे करते थे. विशेष अवसरों पर बड़ी-बड़ी दावतों का आयोजन होता जिसने 250 से 300 तक महाराजा के निकट सम्बंधी और विशिष्ट अतिथि उपस्थित होते. भोजन सामग्री और शराब बड़े ऊँचे दर्जे की होती थी.

ऐसी दावतों के बाद दूर निकट से आई प्रसिद्ध गायिकाएँ एवं सुन्दर नर्तकियाँ अपनी कला का प्रदर्शन करतीं और बड़े इनाम पातीं. दीवान जर्मनी दास जो पटियाला रियासत में उच्च पद पर आसीन थे, लिखते हैं कि महाराजा के रनिवास में यूरोप, नेपाल और साइप्रस द्वीपों से लाई हुई कई युवा सुंदरियाँ थीं जो स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझती थीं. कारण, वे सब एक से बढ़ कर एक बहुमूल्य आभूषण व रत्न जडि़त परिधान पहनती. ऐसे परिधान एवं आभूषण फ्रांस, इंग्लैंड के राजपरिवारों और हालीवुड के जाने- माने सिने सितारों के भाग्य में भी नहीं थे. इसके अतिरिक्त देश-विदेश की शाही यात्राएं और बहुत सी अन्य सुविधाएँ. अपने शयनकक्ष में जाते समय महाराजा अपने पसन्द की स्त्राी को साथ ले जाते. शेष सब मारे ईर्ष्या के मन ही मन कुढ़ती रहतीं.

महाराजा का सानिध्य प्राप्त करने के लिए वे प्रायः अस्वस्थ होने का ढोंग करतीं. महाराजा उनका कुशलक्षेम पूछने आते तो वे यूँ अभिनय करतीं कि महाराजा रात भर वहीं रुकने को विवश हो जाते. महाराजा भूपेन्द्र सिंह जब तक जीवित रहे, उन्हें इस भेद का पता ही नहीं चला कि रनिवास की स्त्रिायाँ उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए ही बीमारी का बहाना करतीं थीं. यद्यपि महाराजा उनका भरपूर ख्याल रखते थे और उनसे प्रेम करते थे मगर फिर भी कई कोमलाँगियाँ ऐसी थीं जिन्हें महाराजा के जीवनकाल में एक बार भी आलिंगन और चुम्बन का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ.

अपनी भोग-विलास लिप्सा, आस-पास के रजवाड़ों तथा भारत के वायसराय से राजनैतिक झगड़े होने के कारण महाराजा अस्वस्थ हो गए. उन्हें उच्च रक्तचाप ने आ घेरा. देश-विदेश के कई प्रसिद्ध डाक्टरों से उनका इलाज करवाया गया मगर रोग बजाए घटने के बढ़ता ही चला गया. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि महाराजा बार-बार सतर्क किए जाने के बावजूद भी शराब और औरतों को छोड़ नहीं पाते थे.परिणाम स्वरूप उनकी आँखों की रोशनी धीरे-धीरे अत्यंत क्षीण हो गयी मगर वे नहीं चाहते थे कि उनके अंधे होने की बात महल की किसी औरत को चले.

सदा की भाँति वह अपने प्रिय परिचारक सरदार मेहर सिंह बिला से दाढ़ी और केश संवरवाते, पगड़ी बँधवाते, आँखों में सुरमा लगवाते और दर्पण में मुँह निहारते ताकि नौकर-चाकरों को सन्देह न हो. इस बात को उनके कुछ विश्वसनीय लोग ही जानते थे. यद्यपि उनका स्वास्थ्य काफी गिर चुका था, फिर भी वे शराब और स्त्रिायों को अपने से दूर नहीं कर सके. अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उन्होंने स्त्राी से रति-क्रीड़ा की थी. नौ माह बाद उस स्त्राी के एक पुत्रा हुआ. तब तक महाराजा का स्वर्गवास हो चुका था. उनका उपचार निरंतर चल रहा था मगर डाक्टर जान चुके थे कि वे अब अधिक दिन जीवित नहीं रह पाएँगे. एक रोज दिन के बारह बजे अचानक वह बेहोश हो गए.

आठ घंटे तक वह बेहोशी की हालत में रहे और फिर स्वर्ग सिधार गए. उनकी मृत्यु का समाचार मिलते ही महल की सभी औरतों ने अपने बहुमूल्य आभूषण उतार फैंके और वस्त्रा फाड़ डाले. अपने प्रिय स्वामी और महाराज के न रहने पर उनका रोना कुरलाना करुणामय और ह्रदयविदारक हो गया था. उन्होंने अपने सिर के बाल नोंच डाले तथा रात भर कड़कती सर्दी में जागती और रोती रहीं. अगली प्रातः पटियाला नरेशों की वंश-परम्परा तथा सिख धर्म के अनुसार महाराजा के शव को स्नान करवाया गया, वस्त्रा पहनाये गए, सभी राज चिन्हों और तमगों से सजा कर पगड़ी बांधी गई और राज मुकुट पहनाया गया. उनको पहनाये गए सुर्ख रंग के कोट पर बहुमूल्य रत्नों के अतिरिक्त प्रसिद्ध हीरा ‘सैंससाऊसी’ भी टाँका गया.

यह अनमोल हीरा फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की समाज्ञी भूजीन ने एक दफा पहना था. शव के पैरों में सोने की नक्काशी किए जूते पहनाये गए. तीन घंटे बाद महाराजा के शव को सम्मानपूर्वक सेना की गाड़ी में रखा गया. शोकाकुल लोगों की भारी भीड़ अन्तिम संस्कार के लिए महल से चल पड़ी. पटियाला रियासत के इतिहास में महाराजा भूपेन्द्र सिंह का अन्तिम संस्कार अभूतपूर्व रहा. आसपास के रजवाड़ों के लोग और महाराज की लगभग एक लाख की गिनती में प्रजा अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनको अन्तिम श्रद्धांजलि देने को एकत्रित थी. निस्संदेह महाराजा में अनेक दुर्बलताएँ थीं, फिर भी प्रजा उनसे अत्यधिक प्रेम करती थी.

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