प्रदीप द्विवेदी. कोरोना संकट को लेकर केन्द्र सरकार की लापरवाही और मजदूरों को रोकने की जिद ने देश को बड़े संकट में डाल दिया है!

बड़ा सवाल यह है कि- क्या इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी इस्तीफा देंगे? शायद नहीं, क्योंकि कुर्सी का मोह उन्हें कभी ऐसा करने नहीं देगा!

लेकिन, ऐसी स्थिति में जो मजदूर रेल हादसे में मारे गए हैं या फिर जो पैदल अपने घर जाते दुर्घटना में मौत का शिकार हुए हैं, उनकी नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा?  

किसी भी संकटकाल में नेताओं की सोच और क्षमता का पता चलता है, यही वजह है कि योगी लाओ, देश बचाओ के स्वर बढ़ते जा रहे हैं?

आज प्रधानमंत्री मोदी भारत की जनता से हाथ जोड़ कर सहयोग की बात कर रहे हैं, लेकिन 10 फरवरी 2020 को इन्होंने ही चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को पत्र लिखकर कोरोना वायरस के प्रकोप से निपटने में भारत की ओर से मदद की पेशकश की थी?

मतलब.... कोरोना संकट से अनजान नहीं थे पीएम मोदी और बावजूद इसके, 24 फरवरी को नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम आयोजित किया गया.

आज मुंबई, दिल्ली जैसे शहर जो कोरोना सजा काट रहे है, इसकी शुरूआत यहीं से हुई थी?

कोरोना वायरस अटैक से निपटने को लेकर तो दिल्ली और मुंबई की सरकारों पर पीएम मोदी टीम सियासी हमले कर रही है, लेकिन वह कोरोना लाने और फैलान की जिम्मेदारी पर खामोश क्यों है?

कमाल है, नमस्ते ट्रंप पर देश का पैसा बर्बाद किया जा सकता है, चीन को मदद की पेशकश की जा सकती है, किन्तु भारत के मजदूरों को मदद नहीं दी जा सकती है?

यदि कोरोना को लेकर जांच आयोग बनता है तो बहुत सारी सच्चाइयां सामने आ सकती हैं कि केन्द्र सरकार ने कोरोना लापरवाही क्यों दिखाई? देश में कोरोना किसने फैलाया? लाॅकडाउन में इतनी देर क्यों हुई? मजदूरों को उनके घर क्यों नहीं जाने दिया गया? यही तमाम सवाल पीएम मोदी को जनता की अदालत में भी खड़ा करते हैं!

इस वक्त भी पीएम मोदी टीम की यही कोशिश है कि जैसे-तैसे जनता का ध्यान कोरोना से हटाया जाए और इसीलिए कभी पाकिस्तान की चर्चा गर्म होती है, तो कभी चीन से निकलने वाली कंपनियों कोे भारत लाने की बात होती है?

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार सिद्धांतवादी सरकार थी, तो पीएम मोदी की सरकार सत्तावादी सरकार है.

पीएम मोदी के इस्तीफे से बीजेपी को कोई नुकसान नहीं होगा और न ही कांग्रेस को कोई फायदा होगा, क्योंकि जो भी नया प्रधानमंत्री होगा, वह बीजेपी का ही होगा?

लेकिन, नोटबंदी से लेकर देशबंदी तक पर नजर डालें तो यह स्पष्ट है कि देशवासियों को यह फायदा जरूर होगा कि देश को एक जिद्दी और लापरवाह प्रधानमंत्री से मुक्ति मिल जाएगी!

राजनीतिक विचारकों का मानना है कि हो सकता है, कभी बहुमत सत्य के साथ नहीं हो, लेकिन सत्य हमेशा सत्य ही रहता है? 

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