नजरिया. कोरोना संकटकाल में जो सबसे ज्यादा परेशान हैं, वे संभवतया बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं? उनकी सियासी रेल पटरी से उतरती ही जा रही है! कोरोना संकट ने वैसे भी तमाम उपलब्धियों पर पानी फेर दिया है और मजदूरों की घर वापसी मुद्दे पर भी नीतीश सरकार सवालों के घेरे में हैं. इधर, खबर है कि भारतीय रेलवे यांत्रिक एवं अभियंत्रण संस्थान (इरिमी) को जमालपुर से लखनऊ में शिफ्ट किए जाने की कवायद की सूचना के बाद बिहार में राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है.

नतीजा? नीतीश सरकार ने इस मुद्दे पर सख्त तेवर दिखाते हुए कहा है कि इसे बिहार से कतई नहीं जाने देंगे, तो उधर विपक्ष ने भी आंदोलन की चेतावनी दी है. उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के महाप्रबंधक (यांत्रिक) की ओर से 27 अप्रैल को इरिमी, जमालपुर के निदेशक को एक पत्र भेजा गया था, जिसमें कहा गया कि निर्माण कार्य के लिए मोहीबुल्लापुर रेलवे स्टेशन (लखनऊ जंक्शन-सीतापुर खंड) के पास जगह उपलब्ध है.

इसे इरिमी को स्थानांतरित किए जाने के लिए अनुमोदन दे दिया गया है? इस खत के बाद से ही खासा हंगामा खड़ा हो गया? सीएम नीतीश कुमार ने एक मई को रेल मंत्री पीयूष गोयल को इस संबंध में पत्र लिखा और इस मामले में पहल करने को कहा है. खबर यह भी है कि इस मुद्दे पर हंगामा होने के बाद सीएम नीतीश कुमार के पत्र के मद्देनजर बदलाव आया है और जमालपुर में इस संस्थान को रहने देते हुए लखनऊ में भी इसी तरह का संस्थान बनाने का प्रस्ताव है.

याद रहे, कभी नीतीश कुमार, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे, लिहाजा इस संस्थान के वे दिल से करीब हैं. यही नहीं, उन्होंने तो वर्ष 2015 में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग भी की थी. हालांकि, खबरों की माने तो इसके उलट उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का तो कहना है कि जमालपुर से इस संस्थान को दूसरे राज्य में स्थानांतरित किए जाने का कोई प्रस्ताव नहीं है, बल्कि रेल मंत्रालय तो इसे और बेहतर बनाने जा रहा है? वैसे, इसे लेकर विपक्ष को भी नीतीश सरकार को घेरने का मुद्दा मिल गया है.

राजद नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव का कहना है कि- केंद्र सरकार एशिया के प्रसिद्ध रेल कारखाना जमालपुर के साथ अन्याय कर रही है. बहरहाल, बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अजीब सियासी उलझन में हैं? विरोधी तो राजनीतिक मौके की तलाश में रहते ही हैं, सहयोगी पार्टी बीजेपी की केन्द्र सरकार भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष परेशानियां खड़ी करती रही है, जिसके कारण उन्हें कभी मजदूरों के मोर्चे पर तो कभी रेल जैसे मुद्दों को संभालने पर अपनी सियासी ताकत खर्च करनी पड़ रही है!

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