नजरिया. एमपी की शिवराज सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है- कोरोना संकट पर काबू पाना? लेकिन, इसके तुरंत बाद एक और संकट उनका इंतजार कर रहा है जो शिव-राज की परीक्षा लेगा, यह है- विधानसभा उपचुनाव!

जब कोरोना संकट एमपी में प्रवेश कर रहा था, उस वक्त सत्ता पर नजर रखने वाले तमाम दल इससे बेखबर हो कर सियासी रस्साकशी में उलझे थे.

कोरोना की ढाल भी कमलनाथ की कुर्सी नहीं बचा पाई, किन्तु अब कुर्सी बचाने की चुनौती शिवराज सिंह के समक्ष है?

खबर है कि.... मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का प्रेस से कहना था कि- उन्हें इस बात का भरोसा कभी नहीं था कि उनके दल के 22 विधायक टूटकर चले जाएंगे?

कमलनाथ का यह भी कहना था कि उनके साथ ही वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह को भी इस बात का भरोसा नहीं था कि 22 पार्टी विधायक इस तरह प्रलोभन के चलते हमारा साथ छोड़ देंगे!

लेकिन, अब उनका यह भी कहना है कि आने वाले समय में राज्य में कुल 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं, मतदाता जागरुक हैं और वे समझ गए हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है? इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है कि इनमें से अधिकांश सीटों पर वे चुनाव जीतेंगे और फिर यह सरकार कैसे सत्ता में रहेगी?

हालांकि, यह पाॅलिटिकल ओवर कांफिडेंस ही था, जिसके कारण ज्योतिरादित्य की सियासी ताकत का अंदाज दोनों वरिष्ठ नेता नहीं लगा सके और एमपी की सत्ता कोग्रेस के हाथ से निकल गई!

बहरहाल, जहां कांग्रेस का पूरा फोकस अधिकतम सीटे जीतने पर है, वहीं बीजेपी के सामने बहुमत बनाए रखने के लिए जरूरी सीटें जीतने की चुनौती है?

बीजेपी के सामने अपने पुराने नेताओं और नए नेताओं के बीच संतुलन कायम करने की भी बड़ी चुनौती है?

देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता की जोड़तोड़ में तो बीजेपी कामयाब हो गई, चुनाव में जीत पाती है या नहीं!

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