मुद्दा. किसी बीमारी के टीके की अहमियत अब दुनिया को पता चल रही है लेकिन फिर भी कई लोग टीकाकरण के प्रति गलत धारणा बनाए रखते हैं. दलील देते हैं कि पहले के जमाने में कौन सा टीका होता था. सब पैसा कमाने के धंधे हैं. ऐसे लोग जो बच्चे दिव्यांग पैदा हो रहे हैं, उन्हें माता-पिता के पूर्व जन्मों के गलत कार्यों का परिणाम मानते हैं. जिन लोगों की सोच ऐसी है वे इसे बदल डालें.

एक टीकाकरण ही है जिससे दुनिया सुरक्षित है. टीकाकरण के बूते ही आज शिशु और मातृ मृत्यु दर में बहुत कमी पाई जा चुकी है. बच्चों के लिए टीकाकरण तो एक तरह से वरदान साबित हो रहा है. इंसान हमेशा से अपने अस्तित्व को लेकर बहुत सजग और सतर्क रहा है. भारी खर्च और मेहनत के बाद भी उसका प्रयास निरंतर चलते रहता है. मानव कल्याण या खुद के अस्तित्व को बरकरार रखने को जब-जब इसे जिस-जिस चीज की जरूरत महसूस हुई, उसकी खोज की.

दिनों, महीनों और वर्षों भले ही लगे हों लेकिन हमारे शोध करने वाले विद्वानों का प्रयास रंग लाया है और उनका यह प्रयास इंसानियत के लिए वरदान साबित हुआ है. 21वीं सदी में चिकित्सा के क्षेत्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि ज्यादातर घातक बीमारियों का निदान बचपन मंे ही टीकाकरण द्वारा कर लिया जाता है.

चिकनगुनिया, इबोला, निपाह और कोरोना जैसे वायरस समय-समय पर शोधकर्ताओं को चुनौती देते रहे हैं. चीन से पैदा हुआ कोरोना वायरस महामारी बन चुका है. दुनिया भर में इस बीमारी को लेकर भय व्याप्त है. कोरोना इंसानों के अस्तित्व पर भले ही संकट बना हो लेकिन अमेरिका सहित कई देश और बड़ी दवा कंपनियां दवा और टीके की ईजाद में रात-दिन एक किए हैं.

भारी खर्च और बड़ी मशक्कत के बाद भी रास्ता नहीं सूझ रहा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसकी दवा बनाने में फिलहाल अभी महीनों का वक्त लगेगा जबकि टीका अगले साल ही तैयार हो जाएगा. कोरोना के प्रकोप को टीका विकसित करके ही खत्म किया जा सकता है. टीके के विकास के लिए चीन, अमेरिका सहित कई देशों में शोध चल रहे हैं. भारत में भी इसके लिए प्रयास चल रहा है.

टीकाकरण इंसान को गंभीर बीमारियों की जटिलताओं से बचाता है. खसरा, डिप्थीरिया, हेपेटाइटिस, न्यूमोनिया, गलगंड रोग, काली खांसी जैसी बीमारियों की रोकथाम टीके से संभव हैं. ये बीमारियां अभी भी एक खतरा हैं. पहले भी असरदार टीकों के दम पर ही भारत चेचक व पोलियो मुक्त हुआ. इसके अलावा कई संक्रामक बीमारियों पर अंकुश लगा है. दवाओं से किसी मरीज को ठीक किया जा सकता है लेकिन टीका ही ऐसा विकल्प है जिससे बीमारी से बचाव संभव होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सभी आयु वर्गों में हर साल 20 से 30 लाख मौतें सिर्फ टीकाकरण के दम पर टाली जाती हैं. हर साल 15 लाख बच्चे किसी न किसी रोग की वजह से दम तोड़ देते हैं. इनकी असमय मौत को टीका तैयार करके रोका जा सकता है. हर साल 5 साल से कम आयु के बच्चों की होने वाली मौतों में 29 फीसद वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली होती हैं.

यदि बच्चों को टीके नहीं लगवाए जाते हैं तो वे अन्य उन बच्चों या बड़ों को बीमार कर सकते हैं जो टीके लगवाने के लिए बहुत ही छोटे हैं या फिर जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, जैसे प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ता, कैंसर रोगी और बुजुर्ग. चिकनगुनिया, इबोला, निपाह, कोरोना परिवार के कुछ रोग, सार्स और जीका में से प्रत्येक रोग के टीके को तैयार करने की अनुमानित लागत 2.8-3.7 अरब डॉलर है हालांकि यह उस रोग से होने वाले नुकसान के मुकाबले कुछ भी नहीं है.

2003 में सार्स महामारी से पूर्वी एशिया में 54 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. वैक्सीन तैयार करने की लागत ऐसा निवेश है जिसका रिटर्न कई गुना अधिक होता है. अलग-अलग वैक्सीन की लागत और मुनाफे का अनुपात भिन्न होता है. डिप्थीरिया के वैक्सीन का यह अनुपात 1ः27 है. खसरे के टीके का यह अनुपात 1ः13.5 है, वैरीसेला का 1ः4.76 तो न्यूमोकॉकल के टीके के लिए यह आंकड़ा 1ः1.1 है. यानी डिप्थीरिया के टीके को बनाने में एक रूपए खर्च होता है तो लोगों को स्वस्थ रखने का रिटर्न 27 रूपए है.

अध्ययनों के आधार पर अनेक कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टरों को यह विश्वास है कि यदि रोगी के शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधी शक्ति को उत्प्रेरित कर दिया जाए तो वह कैंसर के फैलाव को रोक सकती है तथा बीसीजी द्वारा जो कार्य किया जाता है, उससे भी अच्छा कार्य स्वतः ही कर सकती है.

मनुष्य अपनी रोग प्रतिरोधी शक्ति को बढ़ाकर कैंसर का मुकाबला कर सकता है, यह बात आज से 90 साल पहले डॉ.ब्रेडफोर्ड कोले के दिमाग में आई थी. डॉ.कोले के पास एक ऐसा रोगी आया था जिसकी गर्दन पर कैंसर का व्रण तेजी से फैलता जा रहा था. उन्होंने इस दिशा में आगे काम किया. अनेक प्रकार के जीवाणुओं को (जो सभी उसी जीवाणु के रूपांतरित या हल्के रूप में थे) लेकर टीका तैयार किया.

उन्हें आशा थी कि यह टीका इरीसिपेलस त्वचा रोग की भांति कैंसर के लिए प्रभावकारी सिद्ध होगा. उनकी यह आशा भी सही निकली. ‘डॉ.कोले का टॉक्सिन‘ नाम से जाने गए इस टीके से कैंसर के कुछ व्रण अस्थायी रूप से ठीक हो गए तो कुछ व्रण एक लंबे समय तक के लिए ठीक हो गए. जब तक रोग समाप्त नहीं हो जाता है, तब तक टीकाकरण करते रहना चाहिए. टीकाकरण महत्वपूर्ण है. भले ही आज बीमारी के कुछ ही मामले हैं, अगर हम टीकाकरण द्वारा दी गई सुरक्षा को हटा दें तो अधिक से अधिक लोग संक्रमित होंगे और दूसरे लोगों में बीमारी फैलाएंगे. इसलिए यह जरूरी है कि टीकाकरण में सुस्ती या लापरवाही नहीं हो.

लोगों में एक गलत धारणा यह है कि टीका लगाने से उसका साइड इफेक्ट पड़ेगा. ऐसा बिल्कुल नहीं है. बहुत सुरक्षा मानकों का परीक्षण करने के बाद ही उसे बाजार में लाया जाता है. इसलिए टीके का फायदा बहुत है, नुकसान बिल्कुल नहीं है. अनुसंधान बताते हैं कि स्वस्थ लोग किसी भी देश के आर्थिक विकास में किसी बीमार व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा भागीदारी करते हैं.

बीमार व्यक्ति तो अर्थव्यवस्था पर बोझ सरीखा होता है. इसलिए खुद को स्वस्थ रखना और दूसरों को स्वस्थ रखने का माध्यम बनना भी देश के आर्थिक विकास में आपके अप्रत्यक्ष योगदान सरीखा है. स्वस्थ समाज का निर्माण होता है जो हर व्यक्ति को ज्यादा आर्थिक भागीदारी में सक्षम बनाता है.

निरोगी बच्चों की स्कूल में उपस्थिति ज्यादा होती है. सदियों से किए जा रहे अध्ययन और शोध बताते हैं कि किसी भी संक्रामक बीमारी की रोकथाम के लिए टीकाकरण बहुत ही प्रभावी और कारगर तरीका है. व्यापक स्तर पर लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करके ही दुनिया में चेचक, पोलियो और टिटनस जैसे रोगों से निजात पाई है. लिहाजा कोरोना से सबक लेते हुए आज ही अपने स्वजनों को उनके लिए जरूरी टीके जरूर दिलाएं.

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