नई दिल्ली. कोरोना वायरस संकट की वजह से तेल की कीमतें गिरने की आशंका जताई जा रही है. रिस्टैड एनर्जी के विश्लेषकों का कहना है कि तेल की वैश्विक मांग में भारी गिरावट आएगी और इसकी वजह है कि दुनिया के ज्यादातर देशों में तेल भंडारण की जगह ही नहीं बची है. इससे तेल की आपूर्ति तो बढ़ेगी, लेकिन मांग घटती जाएगी, जिसका असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा.

चीन में कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद पूरी दुनिया के तेल भंडार औसतन तीन-चौथाई तक भर चुके हैं. कोरोना संकट के चलते तेल उद्योग को आने वाले सप्ताह और महीनों में तेल को स्टोर करके रखना पड़ेगा. भारत एशिया में चीन और जापान के बाद तेल की खपत करने वाला तीसरा बड़ा देश है, लेकिन यहां भी लॉकडाउन होने की वजह से तेल की खपत में भारी गिरावट आई है.

विश्लेषकों के मुताबिक, कनाडा में घरेलू उत्पादन की वजह से कुछ ही दिन में तेल भंडार भर सकते हैं. आपूर्ति बढ़ जाएगी, जबकि मांग नहीं है. अभी की जो स्थिति है, इसके चलते रेल से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात में भी भारी गिरावट आएगी. खनन से जुड़ी कई परियोजनाएं भी ठप हैं

रिस्टैड ने इंडस्ट्री को चेतावनी दी है कि तेल की कीमतें इस साल 10 डॉलर प्रति बैरल तक नीचे आ सकती हैं. पिछले कुछ सप्ताह से तेल की कीमत लगातार 30 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई है. साल की शुरुआत में ये 65 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा की कीमत पर बिक रहा था.

शिपिंग सर्विसेज की कीमतें आसमान छूने लगी हैं. तेल भंडारण में मुश्किल होने से कीमतें और गिरेंगी. दुनिया भर में अगले महीने मांग की तुलना में तेल की आपूर्ति और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है.

नॉर्वे की सबसे बड़ी इंडिपेंडेंट एनर्जी कंसल्टेंसी रिस्टैड एनर्जी के मुताबिक,स्टोरेज भरने की मौजूदा दर को देखते हुए तेल की कीमतों का वही हाल होने जा रहा है, जो 1998 में हुआ था. उस वक्त कच्चे तेल की कीमतों में सबसे बड़ी गिरावट आई और कीमतें 10 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गई थीं.

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