मुद्दा. इस समय चीन में कोरोना वायरस से फैली बीमारी वहां की और सिर्फ वहां की ही नहीं, कई देशों में स्वास्थ्य के अलावा अर्थव्यवस्था पर भी तीखा असर डाल रही है. कोरोना वायरस के कारण चीन ताला-बंद स्थिति में है. चीन आने जाने वाली दो दर्जन से अधिक एयरलाइंस ने उड़ानें बंद कर दी हैं. जापान, हांगकांग जैसे देशों ने चीन आने जाने वाले कई समुद्री जहाज बंदरगाहों से दूर रोक दिए हैं. हजारों लोग इन जहाजों में फंसे हैं. महामारी से जुड़े प्रतिबंधों के कारण हजारों चीनी कारखाने बंद हैं.

उत्पादन ठप्प, यात्रा बंद और आपूर्ति स्थगित होने से चीनी स्टाक एक्सचेंज में एक दिन में 700 बिलियन डालर का नुकसान दर्ज किया गया है. अंतरराष्ट्रीय महाप्रभु बन चुके चीन को कोरोना ने गंभीर स्थिति में पटक दिया है. संक्रमण और मौतों से अलग कोरोना के असर की कुछ खबरें यूं हैं- ह्युंडई मोटर ने चीन से स्पेयर्स आपूर्ति नहीं मिलने के कारण दक्षिण कोरिया में उत्पादन बंद कर दिया है.

दुनिया भर की कार कंपनियां चीन में अपने कारखाने बंद कर चुकी हैं. इनमें टाटा की जगुआर और लैंड रोवर योजना भी हंै. जर्मन स्पोर्ट्स वियर कंपनी एडिडास ने चीन में अपने स्टोर बंद कर दिए हैं. अमेरिका और चीन के व्यापार युद्ध में कोरोना वायरस ने एक नया आयाम जोड़ा है. कोरोना वायरस किस तरह मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी संकट बन गया है, इसका ही प्रमाण है वित्त मंत्राी निर्मला सीतारमण की उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ बैठक.

इस बैठक के बाद वित्त मंत्राी ने यह स्वीकार किया कि कोरोना वायरस के चलते आयात एवं निर्यात प्रभावित हुआ है. माना जा रहा है कि आटो, टेलीकाम, इलेक्ट्रानिक, टेक्सटाइल, फार्मा और केमिकल सेक्टर्स अधिक प्रभावित होने वाले सेक्टर हैं. वास्तव में वे सभी उद्योग कठिनाई का सामना करेंगे जो कच्चे माल अथवा उपकरणों के लिए चीन पर निर्भर हैं या फिर जो अपने उत्पाद चीन भेजते हैं. इस मामले में जो स्थिति भारत की है वही दुनिया के अन्य अनेक देशों की भी.

आवश्यकता केवल इसकी ही नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को कोरोना वायरस के असर से बचाने के लिए समुचित कदम उठाए जाएं बल्कि यह जरूरी सबक सीखने की भी है कि उद्योग-व्यापार के मामले में किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता ठीक नहीं. यदि भारत ने आयात-निर्यात के मामले में चीनी बाजार का कोई विकल्प तलाश रखा होता तो संभवतः आज संकट कहीं अधिक कम होता. कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए कि भारतीय उद्योग जगत अपनी जरूरतों के लिए किसी एक देश पर आश्रित न रहे.यदि चीन जल्द ही कोरोना वायरस के असर से उबरता नहीं तो खुद उसकी अर्थव्यवस्था तो और गोता लगाएगी ही, विश्व अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी.

एक ऐसे समय जब विश्व अर्थव्यवस्था पहले से ही सुस्ती का शिकार है तब चीन में फैला कोरोना वायरस किसी मुसीबत से कम नहीं. यह समय की मांग है कि विश्व समुदाय चीन के समक्ष यह स्पष्ट करे कि इस मुसीबत की जड़ में उसकी लापरवाही और उसके तानाशाही भरे तौर-तरीके ही जिम्मेदार हैं. यदि चीन ने कोरोना वायरस को लेकर अपने लोगों और साथ ही विश्व समुदाय को समय पर सही सूचना दी होती तो शायद हालात कुछ और होते.

जब चीन का संकट पूरी दुनिया के लिए संकट बन गया है तब कम से कम उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तो चीनी प्रशासन से जवाबदेही लेनी ही चाहिए जो वहां पर काम कर रही हैं. यह ठीक नहीं कि इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने आर्थिक हितों के लोभ में चीनी शासन के तानाशाही भरे व्यवहार की परवाह नहीं की. बेहतर होगा कि चीनी शासन भी यह समझे कि वह लोकतांत्रिक परिपाटी की अनदेखी कर न तो अपना हित कर सकता है और न ही अन्य किसी का.

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि भारत सरकार कोरोना वायरस के कारण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए क्या कदम उठाने जा रही है? यह भी गौरतलब है कि अर्थव्यवस्था तभी सुधरेगी जब सभी देश इस बीमारी से फैलने वाली महामारी को रोकने के लिए जल्द से जल्द उपचार, वैक्सिन आदि की व्यवस्था करेगी क्योंकि यह बीमारी हवा से भी फैल सकती है.

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