मुद्दा. आम बजट में वित्त मंत्राी निर्मला सीतारमण ने गरीब और छोटी जोत के किसानों का ख्याल रखा है. इसमें जलवायु परिवर्तन से कृषि जगत को बचाने के साथ-साथ तमाम ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे आने वाले दिनों में देश की कृषि दशा कुछ हद तक सुधर सकती है.

सरकार ने जैविक उत्पादांे को बढ़ावा देकर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है. जहां एक ओर जैविक उत्पादों की बढ़ी वैश्विक मांग से किसानों को कम लागत में लाभ मिल सकेगा, वहीं अत्यधिक रासायनिक खाद व दवाओं के प्रयोग पर अंकुश भी लगेगा.

इससे न केवल भूमि की उर्वरा क्षमता को बचाया जाएगा वरन सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा. जीरो बजट की प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए पोर्टल ऑनलाइन राष्ट्रीय जैविक उत्पादन बाजार को मजबूती देने की योजना है. गत दो वर्षों के मुकाबले उर्वरक सब्सिडी तेजी से बढ़ी है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019-20 में उर्वरकों पर सब्सिडी की रकम लगभग 80 हजार करोड़ रूपए हो जाएगी हालांकि कुछ क्षेत्रा ऐसे भी हैं जिन पर बजट में विशेष ध्यान नहीं दिया गया है.

देखा जाए तो देश को इस समय खाद्य तेल, पोषक तत्वों वाली बागवानी फसलों और कृषि क्षेत्रा में अनुसंधान के लिए विशेष प्रोत्साहन की सख्त दरकार है लेकिन आम बजट में इन तीनों क्षेत्रों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है.

जहां जैसी जरूरत, वहां वैसी खेती को तरजीह देने पर जोर देना था. स्थानीय पैदावार को बढ़ावा देकर कई तरह की चुनौतियों से निपटने की तैयारी की जा सकती थी. तिलहन फसलांे की बात करें.

इसके उत्पादन को लेकर बजट में कुछ खास प्रावधान नहीं किया गया है, जबकि देश को खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता को कम करने की आज सख्त जरूरत है. इस समय खाद्य तेलों की घरेलू जरूरत का 60 फीसद हिस्सा आयात से पूरा होता है.

इस पर सालाना तकरीबन 70 हजार करोड़ रूपए की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. यह चिंता की बात है. प्याज समेत अन्य संवेदनशील फसलों की खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था.

गैर परंपरागत क्षेत्रों में प्याज और आलू की खेती के पायलट प्रोजेक्ट को मिली सफलता के बाद इसे और विस्तार देने का फैसला किया जा सकता था. प्याज, आलू और टमाटर जैसी फसलें हर दो-तीन साल बाद उपभोक्ता के समक्ष मुश्किलें पैदा करती रही हैं.

इस तरह की चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने योजनाएं शुरू तो की हैं लेकिन वे बहुत कारगर साबित नहीं हो सकी हैं. इस दिशा में कृषि मंत्रालय ने प्याज को लेकर एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया जिसके नतीजे बहुत अच्छे रहे हैं.

भारत में तिलहनी फसलों की उत्पादकता दुनिया में सबसे कम है जबकि हमारे वैज्ञानिक संस्थानों में बेहतर प्रजातियां तैयार हैं जो किसानों के खेतों तक नहीं पहुंच पाती हैं.

ऐसे में देश में कृषि प्रसार प्रणाली को दुरूस्त करने की दरकार थी जो नहीं हुई है. सरकार को खाद्य तेलों के आयात को हतोत्साहित करने की कोशिश करनी चाहिए थी. इसके लिए आयातित खाद्य तेलों को महंगा करना चाहिए था.

इन फसलांे के न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने और इनकी खरीद की गारंटी देनी चाहिए थी. इसके साथ-साथ सरकार घरेलू किसानों को तिलहनी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर सकती थी. प्याज की खेती गैर परंपरागत क्षेत्रों में शुरू कराने का प्रयास किया गया है जिसके नतीजे शानदार रहे हैं.

230 लाख टन प्याज उत्पादन के बावजूद कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक नहीं है. खरीफ और पिछैती खरीफ सीजन में प्याज के कुल उत्पादन का 30 फीसद पैदावार होता है. देश के मात्रा तीन राज्यों मेें मुट्ठी भर प्याज व्यापारियों के हाथों में कारोबार सिमटा हुआ है. सूत्रों के मुताबिक केवल तीन दर्जन आढ़तियों के पास 80 फीसद प्याज का स्टॉक रहता है.

बाजार इनके इशारे पर ऊपर-नीचे होता है. अतः इस समस्या पर ध्यान देना अति आवश्यक हो जाता है. आम बजट में बागवानी फसलों को तरजीह न देना भी एक बड़ी चूक है.

देश में इस समय 40 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जो हमारी जीडीपी को सीधे प्रभावित करते हैं. इस समस्या से उबरने के लिए हमें बागवानी फसलों यानी फल, फूल और सब्जियों की खेती को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है.

बागवानी फसलें छोटे किसानों को जहां कम लागत में ज्यादा पैदावार देती हैं वहीं कुपोषण जैसी समस्या से निपटने में भी मदद करती हैं. प्याज की चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने प्याज की खेती गैर परंपरागत क्षेत्रों में कराने का फैसला लिया है. इसके तहत चार क्षेत्रों में प्याज की खेती नई तकनीक से कराई गई.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में 500 हेक्टेयर में खरीफ सीजन की प्याज की खेती प्रायोगिक तौर पर कराई गई. इस महंगाई के दौर में वहां के किसानों ने अपने खेतों पर 55 से 60 रूपए प्रति किलोग्राम की दर से ज्याद बेचा. उत्पादकता का स्तर 18 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया. प्याज की खेती के हिसाब से यह गैर परंपरागत क्षेत्रा है.

इसी तरह पंजाब में प्याज की प्रति व्यक्ति खपत सबसे अधिक है जबकि वहां की जरूरतों के हिसाब से केवल एक तिहाई पैदावार होती है. यहां के चुनिंदा किसानों के यहां कुल 200 हेक्टेयर में प्याज की खेती कराई गई.

पूर्वोत्तर के राज्यों में मैदानी क्षेत्रों से प्याज की आपूर्ति होती है जो बहुत महंगी पड़ती है. यह पूरा क्षेत्रा अगले दो सालों में प्याज के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा. चौथा क्षेत्रा लेह व लद्दाख है जहां की जरूरतों को भी स्थानीय पैदावार से पूरा किया जा सकता है.

आलू और टमाटर की खेती को भी गैर परंपरागत क्षेत्रों में कराने का प्रयास किया जा सकता है. यह तभी संभव होगा, जब इसमें आधुनिक टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा. स्थानीय पैदावार शुरू हो जाने से जिंसों की लागत घट जाएगी.

आम बजट में कृषि अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्रा को भी अनदेखा किया गया है जबकि प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने जय जवान जय किसान के साथ जय विज्ञान का भी नारा दिया था. अफसोस कि आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्राी ने इसे कोई खास तवज्जो नहीं दी. जबकि कृषि के विकास के लिए इसकी नितांत आवश्यकता है.

प्रधानमंत्राी ने किसानों की आय को दोगुना करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कृषि क्षेत्रा का मशीनीकरण बेहद अहम है. अपेक्षित प्रसार न होने से इसका लाभ ज्यादातर किसानों तक नहीं पहुंच रहा है. बोआई से लेकर फसलों की कटाई की पूरी कड़ी में जिन मशीनों की जरूरत है, वे उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं.

छोटी जोत वाले किसानों के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी वाली मशीनरी की कमी है. धान, मक्का, गन्ना, ज्वार, बाजरा, दलहन जैसी फसलों की बोआई व कटाई में मशीनों का उपयोग बढ़ाने की जरूरत है.

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