कुत्ता सबसे वफादार जानवर माना जाता है. इसके वफादारी के सबूत समय-समय पर हमें मिलते रहे है. तभी तो ज्यादातर लोग कुत्ते को पालतू जानवर के रूप में अपना घर का सदस्य बना कर रखते है. कुत्ते से लोगों का प्यार जग जाहिर है. लोग कुत्ते की देखभाल उसी तरह से करते है जैसे अपने घर के सदस्य की करते है.

कुत्ते की वफादारी के चलते ही कई लोग घर को कुत्ते के भरोसे छोड़ कर चले जाते है. ऐसे में कुत्ता भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुये चोर-उचकों से घर की देखभाल करता है. इतिहास के पन्नों को उठाकर देखेंगे तो हमें कुत्ते से वफादार जानवर शायद ही कोई मिले.

आज हम आपको कुत्ते की वफादारी की एक ऐसी ही मिसाल पेश कर रहे है जहां कुत्ते ने अपने मालिक और मातृभूमि की रक्षा करते हुये प्राण न्यौछावर कर दिये. बात उस समय की है जब लोहारू रियासत पर ठाकुर मदन सिंह का राज हुआ करता था. ठाकुर मदन सिंह के दो बेटे महासिंह और नौराबाजी थे.

मदन सिंह की सेना में बख्तावर सिंह नाम का एक सैनिक भी था. जिसकी गिनती मदन सिंह के खास सैनिकों में आती थी. बख्तावर सिंह का एक कुत्ता भी था, जो उसका वफादार था. वर्ष 1671 में मुगल शासक औरंगजेब को ठाकुर मदन सिंह ने राजस्व देने से इन्कार कर दिया.

औरंगजेब इस बात से बहुत खफा हुआ. औरंगजेब ने हिसार गवर्नर अलफू खान को लोहारू पर आक्रमण करने के आदेश दे दिये. उधर ठाकुर मदन सिंह ने भी अपने दोनों बेटों महासिंह और नौराबाजी के साथ बख्तावर सिंह को युद्ध के लिये भेज दिया. बख्तावर सिंह के साथ उसका कुत्ता भी रणभूमि में अपने मालिक और मातृभूमि की रक्षा के लिये पहुंच गया.

इसके बाद घमासान युद्ध हुआ. बख्तावर सिंह की तलवार से घायल हुये मुगल सैनिकों को कुत्ता काटकर मौत के घाट उतार देता. बख्तावर सिंह पर कोई यदि पीछे से हमला करता तो कुत्ता उस पर टूट पड़ता और मार देता.

कुत्ते ने एक-एक कर कुल 28 मुगल सैनिकों को मौत की नींद सुला दी थी. जब हिसार गवर्नर अलफू खान ने यह सब देखा तो उसने कुत्ते पर एक साथ हमला करने का आदेश दिया. मुगल सैनिकों द्वारा एक साथ हुये हमले से कुत्ता वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन तब तक ठाकुर मदन सिंह की जीत तय हो गई थी. अलफू खान को रणभूमि से भागना पड़ा. हालांकि युद्ध में मदन सिंह ने अपने दोनों बेटों को खो दिया. वहीं बख्तावर सिंह भी वीरता से लड़ते हुये वीरगति को प्राप्त हुआ.

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