सियासत के सितारे. इनदिनों एक बार फिर राहुल गांधी की चर्चा है कि वे इतनी मेहनत करने के बाद भी कामयाब क्यों नहीं हो पा रहे हैं?
खबर है कि.... कांग्रेस के करीबी रहे पंकज शंकर का कहना है कि राहुल गांधी पिछले 15 साल से राजनीति कर रहे हैं. उनके नेतृत्व में कांग्रेस की सीटें तीन अंकों से सिमटकर, दो अंकों में रह गई हैं. सभी इस बारे में जानते हैं. यह ऐसा इंटर्नशिप है जो खत्म ही नहीं हो रहा है!

उका कहना है कि- राहुल गांधी 2004 में सक्रिय राजनीति में आए थे, लेकिन यह 2019 चल रहा है? यही नहीं, उन्होंने प्रियंका गांधी को पार्टी का नेतृत्व संभालने की बात कही और कहा कि- केवल मैं ही नहीं, बल्कि देशभर में किसी भी कांग्रेस कार्यकर्ता से पूछें या विपक्ष में किसी से भी पूछें, वे इस बात से सहमत होंगे कि अगर प्रियंका गांधी ने पार्टी का नेतृत्व किया होता तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति इतनी खराब नहीं होती?

वैसे तो पंकज शंकर के नजरिए में दम है, लेकिन राजनीति ऐसा क्षेत्र है जहां कामयाबी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं- भाग्य और नेता की सियासी प्रकृति!

नेता का भाग्य उसे उस जगह तक पहुंचा देता है, जहां कोई सोच भी नहीं सकता? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संजय गांधी में प्रधानमंत्री बनने की बेहतर संभावनाएं थी, इस बात का अहसास इंदिरा गांधी को भी था, लेकिन प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी!

सियासत के सितारों पर भरोसा करें तो राहुल गांधी की कामयाब राजनीतिक पारी शुरू होगी 2023 में, यह पल-पल इंडिया में दो साल पहले ही लिखा गया था?

तब, यह भी लिखा गया था कि 2023 तक पीएम नरेन्द्र मोदी को केन्द्र की गद्दी से उतारना आसान नहीं है!

दिलचस्प ज्योतिषीय समीकरण यह है कि प्रियंका गांधी की सफल राजनीतिक पारी राहुल गांधी से पहले 2022 में शुरू हो जाएगी?

क्योंकि, प्रियंका गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी की राजनीतिकधारा के ज्यादा करीब हैं, तो राहुल गांधी अपने पिता राजीव गांधी की सियासी-प्रकृति के हैं, लिहाजा यदि भाग्य ने फैसला किया तो राहुल गांधी कामयाब रहेंगे और यदि सियासी समीकरण साधने का समय आया तो प्रियंका गांधी सफल रहेंगी!

क्या इन दोनों में से कोई प्रधानमंत्री बन पाएगा? इस सवाल का जवाब हां भी है और नहीं भी! कारण? वर्ष 2023 के बाद इन दोनों के सियासी सितारे तो बुलंद हैं, लेकिन कोई और भी हो सकता है जिसके सियासी सितारे इनसे बेहतर हों!

याद रहे, कौन बनेगा प्रधानमंत्री? के लिए की गई ज्यादातर भविष्यवाणियां इसीलिए गलत साबित होती रही है कि ज्योतिषी केवल उस वक्त के उम्मीदवारों को देखकर गणना करते हैं, जबकि किसी और के सितारे भी तो सबसे बुलंद हो सकते हैं? यदि ऐसा नहीं होता तो न ही एडी देवगौड़ा पीएम बनते और न ही पीवी नरसिंव्हाराव, नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते!

राहुल गांधी की राजनीतिक कामयाबी में और भी कई बाधाएं हैं....

एक- सियासी चतुराई का अभाव! पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद हार की जिम्मेदारी स्वयं पर लेते हुए राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया? तीन राज्यों के चुनाव हारने के बाद भी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो ऐसा नहीं किया था! उनकी टीम अपनी हार दूसरों के सियासी खाते में और दूसरों की कामयाबी अपने राजनीतिक खाते में डलवाने की सियासी चतुराई रखती है? यदि किसी राज्य में जीत मिले तो वह पीएम मोदी के कारण होती है और यदि हार मिले तो उस राज्य के मुख्यमंत्री के कारण होती है!

दो- उनमें राजनीतिक क्रूरता का भी अभाव है? जिसके कारण संगठन पर उनकी सशक्त पकड़ नहीं बन पाई और विरोधी भी उनके लिए कुछ भी बोल देते हैं!

तीन- वे सियासी सच्चाई को भी ठीक से स्थापित नहीं कर पाए, जबकि विरोधी कईं झूठ को भी चतुराई से सच में बदलते गए?
चार- उन्हें अज्ञानी साबित करने का अभियान कईं वर्षों से चल रहा है, लिहाजा उनके अनेक सच्चे-झूठे किस्से सोशल मीडिया पर खूब चलते रहे हैं.

पांच- आजकल सियासत में पाॅलिटिकल हूटिंग का रोल बढ़ गया है, इस मोर्चे पर तो राहुल गांधी कमजोर हैं ही, कांग्रेस के पास समर्पित सक्रिय समर्थकों का भी अभाव है, इसलिए बीजेपी को जहां भी नाकामयाबी मिलती है, या तो पब्लिक की नाराजगी के कारण मिलती है या फिर बागियों के कारण मिलती है?

लेकिन, फिर भी सियासी सयानों का मानना है कि कोई कितना ही चतुर हो, समय की मार से बचना संभव नहीं है, कवि प्रदीप कह भी गए हैं कि.... कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे ना रे भाई!

वह समय ही था जिसने अर्जुन जैसे सवश्रेष्ठ योद्धा को हथियार डालने को विवश कर दिया था और तब चले थे, समय के व्यंग्यबाण....
समय पुरुष बलहीन है, समय पुरुष बलवान!

वही अर्जुन का धनुष था, वही अर्जुन के बाण!!

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