नजरिया. वर्ष 2018 में एक समय ऐसा आया था जब ज्यादातर राज्य मोदी-शाह की बीजेपी के रंग में रंगे नजर आने लगे थे तथा कांग्रेस मुक्त भारत के इरादे गुंज रहे थे, लेकिन 2018 के अंत में हुए विधानसभा चुनावों में तीन बड़े राज्य- एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ बीजेपी के हाथ से निकल गए तो रंग उड़ने लगे? अभी, हरियाणा में भी बीजेपी ने सरकार तो बना ली, किन्तु इसमें दूसरा रंग भी मिक्स करना पड़ा है! यदि महाराष्ट्र में अपनी बात पर कायम रही शिवसेना, तो बीजेपी की तो उल्टी गिनती ही शुरू हो जाएगी? वैसे, सियासी जोड़तोड़ में बीजेपी एक्सपर्ट है, लिहाजा हो सकता है कि शिवसेना को चकमा देकर इस बार भी बीजेपी प्रदेश में सरकार बना ले,

किन्तु अब सरकार चलाना आसान नहीं होगा, क्योंकि शिवसेना तो सख्त हुई ही है, शरद पवार और कांग्रेस की संयुक्त ताकत भी बढ़ गई है? शरद पवार चुनाव से पहले के सियासी झटके को भूले नहीं होंगे, जाहिर है, पिछली बार की तरह बीजेपी को सत्ता तक पहुंचने का अवसर तो नहीं देंगे! खबर है कि.... महाराष्ट्र में सरकार गठन की रस्साकशी के बीच शिवसेना नेता संजय राउत ने आरोप लगाया कि विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए अपराधियों और सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है? उनका कहना है कि बीजेपी-शिवसेना, दो दलों में बातचीत केवल मुख्यमंत्री के पद को लेकर ही होगी, यदि ऐसा नहीं होता है तो शिवसेना का मुख्यमंत्री होगा!

उनका तो यह भी कहना है कि हमें 170 से ज्यादा विधायकों का समर्थन है और यह आंकड़ा 175 भी हो सकता है? अभी तक सरकार बनाने को लेकर हमारी बीजेपी से कोई बातचीत नहीं हुई है, मुख्यमंत्री पद पर सहमति बनने के बाद ही चर्चा होगी! यही नहीं, शिवसेना के मुखपत्र सामना में साप्ताहिक कॉलम में राउत ने सरकार के गठन पर गतिरोध की तुलना- अहंकार के कीचड़ में फंसे रथ, से की है, तो महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर उन्होंने कहा कि अगर ऐसा होता है तो यह भाजपा की- सदी की सबसे बड़ी हार होगी? याद रहे, महाराष्ट्र विधानसभा में कुल सीटें 288 सीटें हैं, लिहाजा बहुमत के लिए 145 विधायक चाहिएं.

इस वक्त भाजपा के 105, शिवेसना के 56, राकांपा के 54, तो कांग्रेस के 44 विधायक हैं. विधानसभा चुनाव शिवसेना और भाजपा ने मिलकर लड़ा था, किन्तु अब सीएम की कुर्सी को लेकर दोनों ही दल आमने-सामने हैं. बीजेपी अपने 50-50 के वादे से पलट गई है, तो शिवसेना अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है? देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी की सियासी जोड़तोड़ कामयाब रहती है या शिवसेना की जिद की जीत होती है!

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