मुंबई. शरद पवार दिल्ली में महाराष्ट्र के सत्ता का समीकरण बिठाने के लिए कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी से मिलने गए हुए. लेकिन यंहा मुंबई में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जो एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए एक बड़ा झटका देने वाली खबर यह है कि अब मुकाबला सीधा शरद पवार से ही होगा क्या ? राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की कल शाम एक बैठक पवार के आवास 'सिल्वर ओक ' में हुई थी.

इस बैठक में पवार नहीं थे लेकिन बैठक ख़त्म होने के बाद अजित पवार ने जो बयान दिया उससे यह बात निकलकर कर आ रही है की सत्ता स्थापित करने के जिन विकल्पों की अब तक संभावनाएं जताई जा रही थी और चर्चा हो रही थी उनके अलावा भी एक तीसरा कोण है ? और वह है शरद पवार की ताजपोशी का ! शरद पवार के मुख्यमंत्री के नाम पर ना तो कांग्रेस को कोई एतराज है और ना हीं शिवसेना को. बताया जाता है कि दिल्ली जाने से पूर्व शुक्रवार को पवार ने फोन से सोनिया गांधी से चर्चा भी की है. 

पवार UPA के घटक दलों की बैठक में भी हिस्सा लेने वाले हैं. इस नए घटनाक्रम को लेकर शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत का भी बयान आया है. उन्होंने एक संकेत दिया है कि ,सत्ता स्थापना अब बस एक कदम दूर रह गयी है. हम पहले भाजपा को सत्ता स्थापित करने देंगें और उसके बाद उन्हें विधानसभा में हराकर नयी सरकार निर्माण का कार्य शुरु कर देंगें. यह भी खबर मिली है की सत्ता को लेकर मचे इस संग्राम में शिवसेना ने अपने राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी सलाह मशविरा किया है. बताया जा रहा है कि वंहा से चर्चा का जो निष्कर्ष निकला है उसमें एक बात यह स्पष्ट की गयी है कि महाराष्ट्र में अब शिवसेना को अपना जनाधार बढ़ाना है तो उसे भाजपा की बढ़ती हुई ताकत को कम करना होगा.

इन्हीं बातों की वजह से शिवसेना अड़ी हुई है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने विधायक दल नेता के चयन के लिए बुलाई गयी बैठक में इस बात का संकेत दिए थे कि ,तमाम प्रयासों के बाद भी पार्टी के विधायकों की संख्या नहीं बढ़ी है तो अब क्या किया जाय ? शरद पवार के नाम पर सहमति का एक कारण और भी है. जब से शिवसेना ने विधायक दल का नेता चुना है ,भाजपा द्वारा मीडिया और सोशल मीडिया पर यह फैलाया जा रहा है कि ,बनने वाली सरकार अस्थिर होगी और एक ही साल के अंदर फिर से विधानसभा चुनाव होंगे. 

इस अफवाह को फैलाने के लिए सट्टा बाजार के हवाले से भी खबर महाराष्ट्र के बड़े -बड़े समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित करायी गयी. शिवसेना के विधायकों को तोड़ने की खबर भी इसी क्रम का एक हिस्सा थी. राम जन्मभूमि और अयोध्या मुद्दे पर शिवसेना के रुख को लेकर कांग्रेस की जो अड़चन है ,उसे देखते हुए शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार को कांग्रेस किस तरह से समर्थन देगी यह भी सवाल ही बना हुआ था. ऐसे में पवार को आगे रखकर नयी रणनीति बनायी गयी और उस पर ना तो कोई कांग्रेस को दिक्कत आ रही है और ना ही शिवसेना को. शिवसेना इस बात को लेकर संतुष्ट है की आदित्य ठाकरे को उप मुख्यमंत्री पद मिलेगा और सत्ता में उनको सम्मान के साथ हिस्सेदारी मिलेगी. और एक महत्वपूर्ण बात है केंद्र की सरकार के इशारे पर होने वाली परेशानियों को निपटने में पवार जैसे सक्षम नेता का साथ मिलेगा. पवार के नेतृत्व में सक्षम और स्थिर सरकार चलने में किसी को कोई आशंका नहीं रहने वाली है. बताया जा रहा है कि भाजपा को सत्ता से दूर रख कर प्रदेश में आने वाले दिनों में तीनों मुख्य पार्टियां एक साथ आने में सहज महसूस कर रही हैं. यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि सत्ता के दम पर भाजपा ने जिन नेताओं को राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस से तोड़कर अपने दल में शामिल हुआ था उनकी घर वापसी का बड़ा खेल भी नयी सरकार के बनने के बाद शुरु होगा. हाल ही में कांग्रेस -राष्ट्रवादी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए नेताओं में से 10 विधायक चुने गए हैं. यदि दल बदल का पांच साल की तस्वीर देखें तो करीब 35 ऐसे नेता हैं जो कांग्रेस -राष्ट्रवादी से भाजपा में जाकर विधायक बने हुए हैं. इनमें शरद पवार के रिश्तेदार भी शामिल हैं. इन सभी उठापठक के बीच भाजपा ने फडणवीस की शपथ की तैयारी शुरु कर दी है और मीडिया में सूत्रों के हवाले से नए मंत्रिमंडल की जानकारियां भी प्रकाशित करानी शुरु कर दी है. ऐसे में यह देखने है कि फडणवीस के चुनाव प्रचार के दौरान ,सामने लड़ने के लिए कोई पहलवान ही नहीं है के दावे को महाराष्ट्र कुश्ती संघ के अध्यक्ष शरद पवार धोबी पछाड़ मार पाते हैं की नहीं.

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