खबरार्थ. आज जब कांग्रेस अपने सबसे बदतर दौर से गुजर रही है. पार्टी को एक अदद स्थायी अध्यक्ष की तलाश है ,जो कई महीनों की कवायद के बाद भी मिल नहीं पा रहा और फिर से सोनिया गांधी की यह जिम्मेदारी दी गयी की वे यह खोज पूर्ण करेंगी. लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरी बड़ी हार से कांग्रेस संगठन इतना पस्त नजर आता है की उसे खड़े होने के लिए किसी करिश्में की आस है. लेकिन करिश्मा कौन करेगा ? यही सबसे बड़ा सवाल है. राहुल गांधी नयी कांग्रेस बनाने की बातें करते हैं ,लेकिन कर क्या रहे हैं यह किसी को पता ही नहीं चल रहा ? लोकसभा हार के बाद अध्यक्ष पद छोड़ते हुए बोले थे की कांग्रेस अब इंच -इंच की लड़ाई लड़ेगी!

लेकिन महाराष्ट्र में पार्टी इंतज़ार ही करती रही की राहुल ,सोनिया या प्रियंका गांधी कंहा है. पूरे चुनाव प्रचार में पार्टी के स्टार प्रचारक ही नजर नहीं आये ? यही नहीं पार्टी में फैली गुटबाजी जो सोशल मीडिया में छायी रही उसका निदान या अंकुश लगाने का भी कोई प्रयास नहीं हुआ. नतीजा जो मुंबई शहर साल 2009 तक कांग्रेस का गढ़ हुआ और जंहा पार्टी ने 36 में से 29 विधानसभा सीटें जीती थीं इस बार वह आंकड़ा मात्र 4 रह गया है. इसके पीछे कारण मिलिंद देवड़ा ,संजय निरुपम ,एकनाथ गायकवाड़ जैसे अनेक खेमों में बंटी कांग्रेस है. और इसकी वजह से इस बार कई सीटों पर बहुत कम अंतर् से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. मुंबई में कांग्रेस का यह प्रदर्शन ,महाराष्ट्र में उसे सत्ता की सीढ़ी चढ़ने में बाधक साबित हुआ अगर ऐसा भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा. अगर मुंबई में 10 से 15 और सीटें कांग्रेस जीत जाती थी तो सत्ता स्थापित करने का यह समीकरण ही बदल जाता था. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व और उसके सलाहकार किस रणनीति के तहत कार्य करते हैं यह उन्हें ही पता. लोकसभा चुनाव के लिए ' न्याय ' योजना की घोषणा की. भाजपा और नरेंद्र मोदी ने पुलवामा हमले के बाद जब राष्ट्रवाद का सुर छेड़ा तो इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरु के राष्ट्रवाद की तरफ अपना प्रचार मोड़ने की कोशिश की लेकिन लोगों के बीच उसे पंहुचा ही नहीं पाये. 

आज इंदिरा जी की पुण्य तिथि है और सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती इस अवसर पर जैसा पिछले कई सालों से जैसा नरेंद्र मोदी कर रहे हैं इस बार भी किया. सरदार की स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी के सामने भाषण देकर इस बार भी उन्होंने देश का ध्यान इंदिरा गांधी से हटाने का कार्य बड़ी कुशलता से किया. ऐसे में प्रियंका गांधी ने ट्वीट करके अपना विरोध दर्ज तो किया ,लेकिन सरदार पटेल को लेकर कांग्रेस क्या करती है यह तो लोगों को बताना पड़ेगा ? ट्वीट में प्रियंका ने कहा – ‘सरदार पटेल कांग्रेस के निष्ठावान नेता थे जो कांग्रेस की विचारधारा के प्रति समर्पित थे. वह जवाहरलाल नेहरू के करीबी साथी थे और आरएसएस के सख्त खिलाफ थे. आज भाजपा के उन्हें अपनाने की कोशिशें करते हुए और उन्हें श्रद्धांजलि देते देख के बहुत खुशी होती है, क्योंकि बीजेपी के इस एक्शन से दो चीजें स्पष्ट होती हैं. पहला- उनका अपना कोई स्वतंत्रता सेनानी महापुरुष नहीं है. तकरीबन सभी कांग्रेस से जुड़े थे. दूसरा – सरदार पटेल जैसे महापुरुष को एक न एक दिन उनके शत्रुओं को भी नमन करना पड़ता है.’ कांग्रेस को प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी की छवि दिखती है ,लेकिन राजनीति में सिर्फ छवि से काम नहीं चलने वाला. आपको अपने राजनीतिक शत्रुओं को परास्त करने के लिए सिद्धांतों को भी आत्मसात करने की जरूरत पड़ती है.  प्रियंका गांधी को यह सीखने की जरूरत है की उनकी दादी ,जिनकी विरासत या छवि के आधार पर वे राजनीति करने उतरी हैं अपने राजनीतिक शत्रुओं को लेकर उनकी क्या नीति या सिद्धांत थे. 

हाल ही में जब महाराष्ट्र चुनाव के लिए अपने घोषणा पत्र में भारतीय जनता पार्टी ने विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की बात कही तो कांग्रेस ने बयान देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगे कर दिया. सिंह ने कहा कि कांग्रेस को सावरकर से कोई वैर नहीं है ,इंदिरा जी ने तो उनके ऊपर छापे डाक टिकट का विमोचन तक किया हुआ है. लेकिन आज की कांग्रेस इंदिरा जी की उस राजनीतिक चाल को चलने में सफल नहीं रही. इंदिरा जी की वही बात करतीं थीं जो आज प्रियंका गांधी ने ट्वीट की है. वे नहीं चाहती थी सावरकर ,जिनकी जो भी भूमिका रही है आजादी के आंदोलन में उसका भी आरएसएस कोई लाभ उठा सके. इंदिरा गांधी ने सावरकर को दुश्मन या आतंकवादी नहीं माना था. वह किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को अस्वीकार करने या आरएसएस को सौंपने के लिए तैयार नहीं थीं क्योंकि वे राजनीति जानती थीं.  

वे आरएसएस और सावरकर में एक दूरी दर्शाना चाहती थी और उसमें सफल भी रही.  यही नहीं आज जिस सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर प्रियंका गांधी और राहुल गांधी चलकर मंदिर -मंदिर और गंगा यात्रा कर रहें हैं उसका भी इंदिरा जी ने बखूबी इस्तेमाल आरएसएस के खिलाफ किया था. नेहरु के बाद जब इंदिरा गांधी सत्ता में आयीं थी तो उसने इर्द गिर्द वामपंथी विचारकों या सलाहकारों की कमी नहीं थी. उन्होंने उन सलाहकारों की गरीबों और उनके कल्याण के लिए बनायी जाने वाली नीतियों को हमेशा माना और उनके विचारों से प्रभावित भी रही लेकिन कभी भी अपनी छवि को हिन्दू विरोधी नहीं दिखने दिया. वे रुद्राक्ष की माला, पूजा, साधु और तांत्रिक जैसे धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी रहती थीं और कभी भी किसी भी उनके वामपंथी या समाजवादी सलाहकारों ने इस पर उनकी आलोचना  नहीं की. 

आरएसएस के एक अग्रणी बुद्धिजीवी और उसके मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी भी इस बारे में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक टिप्पणी किये हैं. वे कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने कभी भी संघ/भाजपा को हिंदू दल नहीं कहा. वह अपनी राजनीति को हिंदूवाद के मुकाबले खड़ा करने, या भारतीय बहुसंख्यकों के धर्म को अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के हवाले करने का काम कभी नहीं कर सकती थी.  उन्होंने दृढ़ता से और जानबूझ कर उसे महज एक ‘बनिया’ पार्टी कहकर खारिज किया था. आप अंतर पर गौर करें , यदि आप उन्हें ‘हिंदू’ कहते हैं, आप बहुत से हिंदुओं को अपने से दूर कर लेंगें.  दूसरी ओर बनिया मतदाताओं का छोटा-सा समूह है.  साथ ही, चूंकि वे धनपतियों, मुनाफाखोरों और साहूकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए खास कर ग्रामीण भारत में, बाकी हिंदू समाज उनसे उतना लगाव महसूस भी नहीं करता है.  इसके जरिए उन्हें जनसंघ/भाजपा के आर्थिक सुधार या मुक्त-बाज़ार समर्थक दावे को भी खारिज करने में मदद मिली कि वे ‘अनुपयोगी’ व्यापारी मात्र हैं ,बनिया हैं. चारी के अनुसार सोनिया के नेतृत्व में आज की कांग्रेस ने वणिकवाद की जगह हिंदुत्व/हिंदूवाद से लड़ना शुरू कर दिया.  

इंदिरा युग और उसके बाद की कांग्रेस के बीच मौलिक अंतर यही है. आज राहुल गांधी -प्रियंका गांधी जब राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं तो जिस तरह से वे हिंदुत्व पर आक्रमण करते हैं उसका एक दूसरा सन्देश उनके विरोधी समाज में फैलाने का काम करते हैं. भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के हिंदुत्व की इस लड़ाई को मुस्लिम परस्त कहकर प्रचारित करने में पीछे नहीं रही. उसने कांग्रेस की छवि एक मुस्लिम पार्टी के रूप में ही स्थापित कर दी है और यही कारण है की कांग्रेस से देश का बहुसंख्यक वर्ग अलग हो गया है. आज से ही नहीं पिछले कई दशकों से आरएसएस/भाजपा के समक्ष एक बड़ी समस्या रही है. वह समस्या है उनके खेमे में  स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का अभाव. 

संघ और भाजपा के नेताओं को आज भी अनेक मंचों से यह चुनौती दी जाती है की आप अपने संगठन के किसी ऐसे नेता का नाम जाहिर करें जिनका देश की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान रहा है ? इन नायकों की कमीं को पूरा करने के लिए करीब तीन दशक से भाजपा परेशान रही. शुरुवात में उसने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे  गैर-कांग्रेसी नायकों को साधने का कार्य किया. बाद में अपने मंचों से भगत सिंह की तस्वीर इस लिए लगानी बंद कर दी की यह जाहिर हो चूका था कि भगत सिंह वामपंथी विचारों से बहुत प्रभावित रहे थे. सरदार पटेल को तो पहले ही वे ले जा चुके थे. नरेंद्र मोदी सरकार तो पटेल को भारतीय गणतंत्र के नेहरू से भी बड़े संस्थापक के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है. इसके पीछे उनका एक मकसद साफ़ तौर पर दिखता है वह है नेहरु के कद को कम करना. मोदी सरकार को यह अच्छी तरह से पता है की नेहरु का कद छोटा किये बगैर वे संघ की विचारधारा को इस देश में लागू नहीं करा सकते. इसलिए गाहे बगाहे नेहरु के चरित्र के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. आज  इस बात पर कौन ध्यान देता है कि पटेल आरएसएस के प्रशंसकों में से नहीं थे और महात्मा गांधी की हत्या किए जाने के बाद उन्होंने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था.  उनके आरएसएस विरोधी रुख के पक्ष में तमाम दस्तावेज उपलब्ध हैं.  लेकिन, चूंकि नेहरू से उनके मतभेद गहरे थे, जिसके अच्छे दस्तावेजी सबूत भी उपलब्ध हैं, इसलिए कांग्रेस के पुराने दिग्गजों में से भाजपा सर्वप्रथम उनको ले गई. मदन मोहन मालवीय जैसे कांग्रेस के पुराने हिंदूवादियों को अपने खेमे में खींचना तो भाजपा के लिए बहुत आसान था. अगर आज कांग्रेस को संघ या भाजपा से लड़ना है तो उसे इंदिरा गांधी की नीतियों से सीखने की जरूरत है ना की उनकी छवि और नाम स्मरण की.

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