मुंबई. महाराष्ट्र के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने भले ही सीट जीतने में 100 का आंकड़ा पार कर लिया है लेकिन चुनाव जीतने का मोदी मॉडल  यंहा एक बार फिर फेल हो गया है. किसी भी राज्य में चुनाव के दौरान स्थानीय समस्याओं और मुद्दे से दूर हटाकर चुनाव प्रचार को राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों या राष्ट्रवाद से जोड़ने का जो मोदी मॉडल  है वह चला नहीं. प्रचार का यह  मोदी मॉडल  पहली बार बिहार विधानसभा के चुनावों में फेल हुआ था. उस चुनाव प्रचार में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने चुनाव प्रचार को पाकिस्तान ,मांस कारोबार ( पिंक रेवोल्यूशन ) आदि पर केंद्रित कर दिया था ,लिहाजा लालू प्रसाद यादव -नितीश कुमार और कांग्रेस के गठबंधन ने भाजपा को बुरी तरह से पराजित कर दिया था. 

यही फार्मूला भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात विधानसभा के चुनावों में भी अपनाया था लेकिन बामुश्किल सरकार बचा पाये. गुजरात विधानसभा चुनावों में जनता ने कांग्रेस को सत्ता के करीब तक पंहुचा दिया था. राजस्थान ,मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों में भी यही देखने को मिला. मोदी और शाह अपने राष्ट्रीय और राष्ट्रवाद के मॉडल को प्रचारित करते रहे जबकि कांग्रेस ने किसानों के कर्ज ,उनकी फसलों के सही दाम और युवाओं को रोजगार की बात कही और सत्तासीन हो गयी.  मोदी -शाह का मॉडल ,राष्ट्रीय स्वरुप का होने की वजह से राष्ट्र के स्तर यानी लोकसभा चुनावों में तो सफलता हांसिल कर रहा है लेकिन राज्य स्तर पर आकर उसके सामने अड़चने खड़ी हो जा रही हैं या यूं कह लें की विधानसभा के चुनावों में लोगों को अपने स्थानीय मुद्दों और समस्याओं से ज्यादा मतलब होता है.

  मोदी और शाह दोनों ही हरियाणा और महाराष्ट्र में धारा 370 ,सर्जिकल स्ट्राइक और पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात करते रहे लेकिन उन्हें अप्रत्याशित सफलता तो छोडो पिछले बार के अपने प्रदर्शन के अनुरूप भी सफलता नहीं मिल पायी.  भारतीय जनता पार्टी के नेता तर्क देते रहे की धारा 370 हटाने से उनका जनता में समर्थन करीब 20 फीसदी बढ़ गया है लेकिन चुनाव परिणाम देखें तो दोनों ही प्रदेशों में सीटों के साथ -साथ उनका मत प्रतिशत भी कम हुआ है. ये दोनों ही चुनाव लोकसभा चुनाव के करीब 6  माह के अंदर ही हो गए इसलिए भाजपा नेताओं का यह भी अति विश्वास था की उनको लोकसभा में जो सफलता मिली है उससे कंही अच्छी सफलता मिलेगी.  लोकसभा के परिणाम देखें तो महाराष्ट्र में भाजपा -शिवसेना गठबंधन ने करीब 80 % विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हांसिल की थी. उसी आंकड़े को आधार मानकर पार्टी ने 220 प्लस का नारा दिया लेकिन वह अति साबित हो गया. साल 2014 के चुनावों में भाजपा ने कुल 260 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 120 सीटें यानी करीब 45 % जीत हांसिल की थी.  इस बार 160 सीटें लड़कर उसने 100 का आंकड़ा पार कर करीब 75 % सफलता हांसिल की लेकिन 120 के आंकड़े को पार नहीं कर पाए. लोकसभा चुनावों में मिली सफलता को आधार बनाने से भाजपा का यह समीकरण बिगड़ गया.  पार्टी ने उक्त जीत को ना सिर्फ आधार बनाया अपितु लोकसभा के मुद्दों या यूं कह लें की राष्ट्रीय स्तर और राष्ट्रवाद के मुद्दों ( मोदी मॉडल ) को भी अपने चुनाव प्रचार का आधार बना लिया. शायद भाजपा को इस बात का अति विश्वास है की वह कैसा भी चुनाव है मोदी मॉडल  चलाकर जीत सकती है ? कांग्रेस -राष्ट्रवादी कांग्रेस के बड़े नेताओं ,विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करना ,टेलीविजन चैनलों के माध्यम से उन्हें  मेगा भर्ती  जैसे स्लोगन दिलाकर जितनी कवायदें की गयी उसे देखते हुए भाजपा को सीटें मिली हैं वह अनुमान से काफी कम हैं. और यह स्थिति भारतीय जनता पार्टी के लिए भी चिंता का विषय होगी.

 देवेंद्र फडणवीस ने अपने तीन मंत्रियों को टिकट नहीं दिया था ,जिन मंत्रियों को टिकट दिया उनमें से भी आठ को पराजय का सामना करना पड़ा. यह चुनाव परिणाम ना सिर्फ भारतीय जनता पार्टी अपितु कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के लिए भी सोचने का विषय हैं. चुनाव के पहले दल -बदल की हवा में दोनों ही पार्टियों के अनेक नेता पार्टी छोड़ कर भाजपा या शिवसेना में चले गए लेकिन उसके बाद भी लोगों ने उन्हें मतदान कर एक सक्षम विपक्ष की स्थिति में खड़ा कर दिया. दरअसल पिछले पांच साल में इन दोनों ही पार्टियों ने विपक्ष की भूमिका नहीं निभाई लिहाजा उनकी संगठनात्मक स्थिति भी कमजोर होती गयी.  

शरद पवार को जब साथी छोड़कर जाने लगे तो यह ख़याल आया और उन्होंने फिर से अपने आप को देश की राजनीति से हटाकर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय किया और उसका फायदा उनकी पार्टी को हुआ. कांग्रेस के हर विधानसभा क्षेत्र में आज भी अच्छे कार्यकर्ता है लेकिन उन्हें सक्रिय करने के लिए पार्टी हाई कमान को मेहनत करनी होगी. शिवसेना पिछले पांच सालों में अपनी सहूलियत के हिसाब से पक्ष -विपक्ष भी भूमिका निभाती रही. इसका फायदा यह हुआ की पार्टी को विपक्ष वाली जगह का फायदा मिला और उसकी ताकत में ज्यादा गिरावट नहीं आयी.  यदि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस आक्रामक विपक्ष की भूमिका में लोगों के साथ और उनकी समस्या को लेकर आवाज उठाते रहते थे तो आज चुनाव परिणामों की तस्वीर अलग होती थी.  लेकिन लोकसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी एकदम से शिथिल नजर आने लगी जो काफी विपरीत असर डालने वाला साबित हुआ है. राज्य और देश की राजनीति अलग -अलग होती है इस बात का संकेत महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम दे रहे हैं.

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