नजरिया. हरियाणा में सरकार बना ली हैं और कुछ समय में महाराष्ट्र की तस्वीर भी साफ हो जाएगी, लेकिन मुख्यमंत्री कोई भी बने, इसके साथ ही मोदी-शाह की नीति और नीयत जरूर एक्सपोज हो गई है?

मोदी-शाह की बीजेपी, अटल-आडवानी की बीजेपी से हटकर है? अटल-आडवानी अपने सहयोगियों को उनकी उम्मीद से ज्यादा देते रहे, तो मोदी-शाह इसके एकदम विपरीत हैं!

अटल-आडवानी बदलते सियासी समय के साथ अपने राजनीतिक रंग बदलते नहीं थे, किन्तु मोदी-शाह के सियासी तेवर समय के साथ बदल जाते हैं, यही वजह है कि शिवसेना को अब जुबानी वादों के बजाय लिखित समझौते की जरूरत पड़ रही है?

वैसे, महाराष्ट्र प्रकरण मोदी-शाह के शेष सहयोगी दलों के लिए भी चेतावनी है, खासकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए!

बीजेपी और शिवसेना के साथ रहने से महाराष्ट्र में शिवसेना का आधार बीजेपी के सापेक्ष कमजोर होता गया है, अब जब शिवसेना के लिए मुख्यमंत्री बनाने का अवसर आया है, तो बीजेपी की राजनीति महाराष्ट्र में 50-50 फॉर्मूले को नकारने की है? हो सकता है, अपने राजनीतिक प्रबंधन के दम पर मोदी-शाह, महाराष्ट्र में भी शिवसेना के बगैर सरकार बना लें, लेकिन इससे क्या सियासी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगेगा?

यदि, बीजेपी महाराष्ट्र में अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब रहेगी तो शिवसेना हार कर भी नैतिकरूप से जीत जाएगी और बीजेपी जीत कर भी सहयोगियों का भरोसा हार जाएगी!

बहरहाल, इन चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि मोदी-शाह के लिए सत्ता ही सर्वोपरि है, सियासी सिद्धांतों के लिए कोई जगह नहीं है?

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