प्रदीप द्विवेदी. विष्णु प्रसाद मेहता ऐसे लेखक हैं जो लिखते कम हैं, पढ़ते बहुत ज्यादा हैं, यही वजह है कि उनके लेखन में अक्सर एक नया नजरिया दिखाई देता है, एक अलग विचार उभरता है! इनदिनों गांधीजी पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है. यकीनन, बहुत अलग, बहुत बेहतर, लेकिन गांधीजी पर मेहता ने जो कुछ लिखा है, वह पढ़ने लायक तो है ही, विचारणीय भी है, वे लिखते हैं.... अपने देश की आजादी के जिन नायकों को मैंने शिद्दत से जानने के बहाने पढ़ने व पढ़ने के बहाने जानने की जतन से कोशिश की उनमें गांधी, जेपी, लोहिया व अम्बेडकर के स्थान सबसे ऊपरी खाने में है.

मेरी वांछा यहां इतिहास के कदमों की पड़ताल व राजनीतिक परिदृश्य में इन कदमों की पदचाप की खोजबीन करने से जियादा देश के जनगत मानस, सामाजिक मिजाज और लोकतांत्रिक धरातल पर इन नायकों के असर व प्रभाव को बूझने व समझने की जियादा रही है. आप यह भी कह सकते हैं कि कही न कहीं यह मेरी एक साधारण नागरिक के नाते अपने देश के इन महान पूर्वजों को हासिल कर खुद को जानने, पकड़ने व पाने की स्वान्त-सुखाय लालसा भी है तो है.

मैं अपनी साधारण सूझ के आसरे यह बुझन प्रयास करता रहा हूं कि वो क्या है जो इन्हें अब भी हमारे लिए उपयोगी व प्रांसगिक बनाए रखें हुआ है. वो क्या है इनके पास जो अब भी एक अच्छा इंसान और उपयोगी नागरिक बनने में मेरी मदद कर सकता है. मैं दुनिया नहीं बदल सकता पर खुद को तो बदल ही सकता हूं और शायद अपने आसपास थोड़ा-सा बदलाव लाने के प्रयास में अपनी रही-सही भूमिका की रफ़ू व तुरपाई भी कर सकता हूं. लोहिया व जयप्रकाश नारायण को मार्क्स के बावजूद पर गांधी के बगैर नहीं समझा जा सकता है.

आजाद भारत में लोहिया व जयप्रकाश का काम बहुत बड़ा है और भीमराव के कद, काम, सोच व व्यक्तित्व का वास्तविक अंदाजा व मूल्यांकन हुआ ही आजादी के बाद हैं. जेपी व लोहिया में मार्क्स का जैसा व जितना समाजवाद हो व्यवहार में वे खाटी गांधीवादियों से ज्यादा गांधीवादी रहे. गांधी व अम्बेडकर कुछ मुद्दों पर परस्पर आमने-सामने ताल ठोकते तो कुछ मुद्दों पर ठीक पास-पास व साथ-साथ आने की भूमिका में प्रतीत होते हैं. मुझे नहीं लगता है कि भारतीय समाज में बसी समस्याओं, परेशानियों, चुनोतियों, उपयोगिताओं को इन मुख्य व ख़ासे चार को जाने व समझे बिना जाना व समझा जा सकता है.

मुझे यह भी लगता है कि भारतीय समाज की स्थितियों को समझने की दृष्टि व दर्शन इन चार के कायम किए 'चौहद्दी' व 'चौराहे' पर मौजूद है वहीं इन स्थितियों के समाधान के उपाय भी इसी 'चौराहे' पर उपलब्ध रोशनी के सहारे खोजे व पाए जा सकते हैं. अपने देश में विपक्ष या प्रतिपक्ष का जो जो भी दावा व चुनोतिया है या थी अथवा नागरिक जरुरत व जनतांत्रिकता के सदके जो और जिस तरह की हलचले अब भी बची है उनमें से इन चारों की दृष्टि व संकल्पों को निकाल दिया जाय तो शायद कुछ भी बचता नहीं है. मार्क्सवादी साहित्य को मैने बड़े रुझान व तल्लीनता से पढ़ा व समझने प्रयास किया है. दर्शन, इतिहास, राजनीति, सामाजिकी व अर्थव्यवस्था आदि के प्रभावो, गुत्थियों व अंतर्विरोधों को समझने-बुझने-पकड़ने में मार्क्स की डायलेक्टिक्स का महत्व व प्रांसगिकता यकीनन देर तक व दूर तक क़ायम रहने वाली है.

मार्क्स के वैचारिक अवदान व तार्किक स्थापनाओं को बिना नकारे अपने देश के संदर्भ व परिप्रेक्ष्य में गांधी मुझे ज्यादा सहज, सटीक, सहोदर, सामयिक व सहयोगी लगते हैं. मार्क्स व अपने देश के 'त्रिदेव' को किसी और दिन के विमर्श के लिए रखते हुए गांधी की एक सौ पचासवीं जयंती के इन उत्सवी,बड़बोले व विज्ञापनी दिनों के नक्कारखाने में अपनी भी तूती बजाना चाहता हूं.

मैं इस शस्य श्यामला वसुंधरा का एक निहायत नाचीज़, नाजिक्र व नामालूम नागरिक मोहनदास करमचंद गांधी से अपने रिश्ते, अपनी सोच व अपने नजरिए की बाबत बतियाना चाहता हूं. आधुनिक भारत की आरंभिक कतारों में बैठे फरिश्तों व फन्ने-खाओ को जो इस देश के संसधानों को खा-पी-निचोड के अधा गए है इस आदमी पर बोलने का हक है तो आखिरी नहीं पर पीछे की कतारो में खड़े हम जैसों को जो गांधी के लिए सबसे प्रिय व पहले थे व जो कारवां गुज़र रहा ग़ुबार देखने को पूरी तरह अभिशप्त है, उन्हें भी है व बराबर है. क्यों है? मैं बताता हूं ना.

यू है तो यह बतलावन स्वांत सुखाय ही पर कही इधर उधर बहुजन हिताय हो जाय तो नेमत ही मानिए. गांधी के उपलब्ध फोटोग्राफस को, अपने पूर्वाग्रह व हठधर्मिता को, यदि है तो, ताक पर रखके देखिए. आप की संवेदनशील आखों को क्या दिखता है? आप का आप जाने, जब क़भी मैं कहीं ये फोटो देखता हूं तो यकीन जानिए अपनी सादगी, सरलता व सहजता में मुझे वे देहात में बसे अपने दादाओ व नानाओ में किसी के फोटोज लगें हैं. इकहरे शरीर को लाठी से ठेलते बापू अपनी वेशभूषा, आने-बाने व देहाती रहन-सहन में मुझे हमेशा ही छुट गए गांव में कभी बसे अपने 'बाबा' अपने 'पूर्वज' प्रतीत होते रहे हैं.

ऐसा घरेलू अपनापा व ऐसी खींचती पारिवारिकता मुझे देश-दुनिया के किसी ओर ज्यादा ही बडे माने जाने वाले नायक या महानायक को देखके क़भी नहीं लगी और इस विशाल वसुंधरा के कोटि कोटि नायकों में इस मजबूरी के नाम बन गए' को चुनने पर आप मुझे गरियाना व लतियाना चाहें तो साहब यह आपकी मर्जी है. अपने तो यही गिरधर गोपाल दूजा न कोई! गांधी ने खुद अपने व अपने देश के जन व मन की शक्ति, सामर्थ्य व संभावनाओं को समझने व बरतने के लिए जिस जीवट व उत्साह से जितनी यात्राएं की उसमें आराम से पूरी पृथ्वी के दो-तीन चक्कर लग जाए.

गांधी ने जिस असाधारण लोकतांत्रिकता के साथ भिन्न-भिन्न मतों व आग्रहों वाले व्यक्तित्वों का स्वतंत्रता आंदोलन के साथ गुणा-जोड़ किया और देश के अनजाने से देहातों में बसे अनगिनत आम-जन की तटस्थता को ख़ास-जन की सक्रियता में जिस नीतिगत रागात्मकता, रणनीतिक कौशल तथा रचनात्मक कुशलता से बदला अचरज, कौतूहल व अचम्भे में डाल देता है. इने-गिने सामान, गिने-चुने वस्त्र, दुबले-पतले शरीर व नितांत फकीराना लब्बो-लुबाब में ठेठ देहाती सा जीवन जीने वाले गांधी का ही जहूरा था कि न केवल उनने नील, खादी, नमक, चरखा, तकली,

सफाई, प्रार्थना, एकासने, उपवास आदि रोजमर्रा की चीजों व गतिविधियों को एक बड़े देशव्यापी आंदोलन के प्रभावी, गतिशील व उपजाऊ मोर्चों में बदल दिया बल्कि दिल्ली, लखनऊ, बम्बई, कलकत्ता की चमचमाती सड़कों की बजाय वर्धा, सेवाग्राम, नोआखाली, साबरमती की ऊबड़खाबड़ पगडंडियों को स्वतंत्रता आंदोलन के क्षेत्र तथा केंद्र बनाके रख दिए जहां की चौपालों पे आने जाने में इस महादेश के छोटे से छोटे व गए बीते मान लिए अदने पर सबसे जरुरी साधारण लोगो को क्या तो संकोच होगा और क्या भगा दिए जाने का डर होगा.

मोहनदास ने कुछ ख़ास भद्रपुरुषों की स्वतंत्रता प्रदर्शनी को गांव गांव में लगने वाले जीवंत मेलों में बदल दिया जहां लोगों के 'इकट्ठे' होके 'परस्पर हालचाल' जानने मात्र से बड़े-बड़े अंग्रेजी अफसरों, गवर्नरों, वायसरायों व लाड़- साहबों के अगवाडो में धुकधुकी व पिछवाडो में फुकफुकी होने लगती थी. गांधी के उन दिनों निकाले अखबारों हरिजन, यंग इंडिया, इंडियन ओपिनियन में क्या तो पूंजी लगी हुई थी और क्या उनका प्रचार-प्रसार था? इन अखबारों की छपाइ व बिकाइ गरीबी में आटा गिला थी तो थीं, साख व प्रभाव उन दिनों इनका किसी इंडिपेंडेंट, न्यूयॉर्कर से कम नहीं था. गांधी से बड़ा लिख्खाड़ कौन होगा ? इन अखबारों के अलावा उन्होंने जो जो लिखा उससे पचासेक हजार पृष्टों की पेट-पूजा तो हो ही चुकी है और लिखा हुआ है कि देश-दुनिया के किन-किन कोनों से बाहर आ रहा है.

गांधी ने बहुत लिखा और बालपोथी से लेकर गीता व भारतीय देहात से लेकर दक्षिण अफ्रीका, जीवन को छूते हर विषय पे लिखा व पूरे दिल से लिखा तथा कॉपी मिल गयी तो कॉपी कतरन मिली तो कतरन पे लिखा. वह मिट्टी-पकड़ पहलवान मोका मिले तो हवा-पानी-रेत पे लिख-उकेर सकता था. कह लीजिए नंगा क्या तो नहायेगा और क्या तो निचोड़ेगा? गांधी का लिखा हुआ पढ़िए और देखिए कि वैचारिकी के आंच व ताप को प्रयोग व अनुभव की भट्टी में पकाके तथा बेजान- बेमानी बौद्धिक कचरे को छानते-बीनते धरती पर धड़कती जीवंत भाषा कैसे हासिल की जाती है जो न सिर्फ आपसे सरल व सटीक संवाद करने का मन व इरादा रखती हो बल्कि बिना किसी छिप-छिपायी के दिल-दिमाग को भिगोती हुई सीधे पकड़ के साथ बस जाती हैं.

इंग्लैंड की इंटेकचुअल आबोहवा में बेरिस्टरी पढ़े किसी साहेब की बजाय यह खेती-बाड़ी से खाद-पानी जुटाने वाले और प्रकृति की नैसर्गिक चौपाल में बतियाते किसी सीधे सादे धरती-पके दाने भगत की सहज विज़डम ज्यादे लगती है. आदमी अपनी बोली-बानी या मातृभाषा में ही ज्यादा खरा ,ज्यादा खुला व ज्यादा सच्चा होता है और इसलिए गांधी का ज्यादेतर लिखा गुजराती या हिन्दी में है जबकि अंग्रेजी पर उनकी महारथ अनेकों अंग्रेजीदां भारतीय मैकाले-पुत्रों से कम नहीं कुछ ज्यादा ही थी. रविन्द्रनाथ टैगोर व सुभाषचंद्र बोस से उनके वैचारिक मतभेद किसी से छुपे हुए नहीं है और इसे इन दोनों विराट व्यक्तित्वों की हदयग्राहीकता ही मानिए कि बावजूद इसके एक ने उन्हें 'महात्मा' तो दूसरे ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' का सम्मान दिया.

गांधी अपने करोडों जनसाधारण सहोदर को जिस बडी लड़ाई व पूरे हक-हकूक के लिए तैयार व तत्पर करने के उद्देश्य में जुटे हुए थे वहां इन निजी सम्मानों का महत्व उनके लिए अफवाह से ज्यादा नहीं था. अमरीकी मूर्तिकार ज्यो डेविडसन ने जब लंदन में उनसे महात्मा का मतलब पूछा तो विनोदिया स्वभाव गांधी ने बताया कि महात्मा यानी एक महत्वहीन आदमी और इसके दो दिन बाद ही चर्चिल ने इस 'अधनंगे फ़क़ीर' से ड्रेस-कोड के बहाने मिलने से साफ इंकार कर दिया था.

मोहनदास का पहला व आखिरी अपमान तब हुआ था जब उन्हें टिकिट होने के बावजूद अफ्रीका में ट्रेन से उतार फेका गया था उसके बाद एक गुलाम देश में अपने सम्मान की कल्पना ही उनके लिए बेहूदगी व टुच्चापन था. विभिन्न आंदोलनों के बूते भारतीय सभ्यता अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता पाने में तो सफल हुई किन्तु इसकी कोख़ से एक कि बजाय लड़ते-झगड़ते जो दो देश जन्मे उनने गांधी के सपनों को छिन्न-भिन्न व तार-तार कर दिया. चौदह व पन्द्रह अगस्त के बीच यह आदमी नितांत अकेला खड़ा था जितना यह तब भी अकेला नहीं था जब अफ्रीका में उसे ट्रेन से उतार दिया गया था.

आजाद भारत व नएबने पाकिस्तान को गांधी व उसके हिंद स्वराज्य की कोई जरुरत नहीं थी. एक ही देश के विभाजन से बनने जा रहे दो देश अपने साथ इतिहास की सबसे पतित हिंसा व पलायन को अपने साथ लेके आए थे. राजमार्ग की दहलीज़ पर खड़े दोनों देशों के पुराने स्वतंत्रता सेनानी अब नए राजनीतिक अवतार में थे और सत्ता-हस्तांतरण के व्यस्त परिदृश्य में सत्ता व पद से हजार हाथ दूर रहने वाले गांधी व उनके इने-गिने साथी अप्रासंगिक होने की हद तक बाहर थे. मोहनदास करमचंद ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं था जो मायूस होके हाथ पे हाथ धरे बैठ जाए. सत्ता की राजनीति के घने कुहासे वाले इस मुश्किल दिनों में वे अपनी इस अप्रांसगिकता का रोना रोने व विभाजित आजादी से कुचले छिन्न भिन्न सपनों का छाती माथा कुटने के बजाय विभाजन से निकली नाजायज़ हिंसा के विरुद्ध समूचे जीवट, उत्साह, दृढ़-संकल्प और पूरे दिलों जान से जुट गए.

जदि तोर डाक शुने केओना आसे तबे एकला चलो रे. कबीर की तरह निंदक नियरे राखिए में गांधी का अटूट विश्वास था. आज़ाद भारत के लिए जारी ताप खाए उन दिनों गांधी के साथ जो 'विरुद्दो का जमावड़ा' था उनमें उनकी लानत-मलालत करने वाले लोगों की संख्या कुछ कम नहीं थी व आज़ाद भारत में यह बढ़ी नहीं तो घटी भी नहीं है. गांधी के उन दिनों के फ़ोटो देखिए, पोपले मुंह पे फक्कड़ हल्की मुस्कान लिए ज्यादेतर वे कुछ खोजते-से नजर आते है, कैमरे को देखते और बेचैनी, गुस्सा, चिड़चिड़ापन कही झलके ऐसे गांधी-फ़ोटो कही नहीं है, हो तो मुझे भी बताना? यह समंदर जैसा तरल आदमी विरोधों के चरम पे भी अपनी आब व तरावट जस की तस रखता था.

दूसरी तरफ बौनों के बावनगजी किस्सो की गूंजती दोगली सच्चाई यह है कि जिनके पूरे कुटुंब, कुनबे या खानदानी श्रृंखला में गवर्नर-वायसराय को तो छोड़िए उन दिनों किसी दो-टकिया अंग्रेज अफ़सर को एक कड़कती चिट्ठी लिखने का साहस व हौसला नहीं था स्वतंत्र भारत में उनका तथाकथित शूरमा वंशज गांधी की सत्य व अहिंसक विरासत व उसमें अटूट रुप से निहित अवज्ञा, असहयोग, अपरिग्रह आदि तरीकों का मजाक व खिल्ली उड़ाता मिल जाएगा पर जब उसे खुद किसी अन्याय का विरोध करना होगा वह धरने पर बैठके उपवास करने लग जाएगा!

पश्चिमी सभ्यता की तरह हिंसा हमारी जैविक व स्वभाविक प्रतिक्रिया कभी नहीं रही है, हम स्वभाव से ही अहिंसक हैं और सनातनी गांधी से ज्यादा यह कौन जानता था कि जो हममे है ही नहीं उसके उगने व जगने की क़भी सम्भावनाए भी नहीं हैं.मार्क्सवादी थीसिस व रुसी क्रांति के विश्वव्यापी प्रभाव के उन गर्म दिनों में समूची दुनिया के युवाओं को नए जोश, नए उत्साह व नयी उम्मीद के सपनों से भरा और उन्होंने अपनी शक्ति, क्षमता व प्रयासों के माध्यम से देश भर में संगठन खड़े व सक्रिय करने के पूरे प्रयास किए पर हमारी आबादी के कितने लोग उन तरह के क्रांतिकारी संगठनों से सक्रिय सदस्यों के रुप में जुड़े.

रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा पढ़िए, बिस्मिल का आत्मकथ्य उन दिनों के टूटते बिखरते क्रांतिकारी आंदोलन का मार्मिक एकांतवास हैं. फिर भी ऊधम, आज़ाद, बिस्मिल,भगतसिंह,खुदीराम, सुभाषचंद्र आदि की जो क्रांतिकारी परम्परा थीं व है और उस इंकलाबी विरासत का अपना प्रभाव, महत्व तथा प्रांसगिकता है व थीं.

जिस देश में विदेशी सेना गुजरते देख खेती-मजूरी, अपने काम-धंधे में लगे खुले-हदय आम लोग निड़र-भाव से सैनिकों से राम-राम करने का स्वभाव रखते हों, जिस देश में किसी को पराया या दूसरा समझने की मनोदशा ही परायी हो, जिस देश में लडके जीतने की बजाय प्रेम से अपने बनाने के अभय-संस्कार हो वहां कितने लोगों को 'बम का दर्शन' समझाया जा सकता हैं व कितने लोग सचमुच की गन-पिस्टल उठाएंगे? गांधी अच्छे से जानते थे कि हजारों अंग्रेजों का लूट व शोषण से लदा अन्यायी शासन भारत में इसलिए चल रहा था कि देश के करोड़ों लोग तटस्थ, निष्क्रिय, लापरवाह या निन्द्राग्रस्त थे, करोड़ों लोगों के जगने भर की देर थी अंग्रेज किसी भी कीमत पर यहां रुक व टिक नहीं सकते थे. अंधेरा इसलिए राज कर पा रहा है की रोशनी नहीं है.

एक बार करोड़ों दियों के जगमगाने की देर है, अंधेरा बिला जाएगा. गांधी यह भी अच्छे से जानते थे कि प्रार्थना, सत्संग, उपवास, पदयात्रा, कताई-बुनाई आदि रचनात्मक कार्यों का आयोजन कर इस देश में लाखों-लाख लोगों की जनभागीदारी व जनएकत्रीकरण किया जा सकता है जो स्वत ही जनजागरुकता व स्वदेशी-जागरण का आधार व प्लेटफॉर्म बन जाएगें. मैं अक्सर सोचता हूं कि आखिर गांधी क्या थे? लेखक, वकील, विचारक, राजनीतिज्ञ, समाज-सुधारक, आध्यात्मिक, संत-महात्मा या एक साधारण मनुष्य. वे न तो चवन्नियां सदस्यता वाली कांग्रेस के नामजद सदस्य थे, न वे गुलाम या आज़ाद भारत में किसी पद पर क़भी रहे.

स्वतंत्रता के भिन्न-भिन्न आंदोलन उनके दम-खम के साथ व उनके इर्दगिर्द अवश्य चलते रहे पर वे औपचारिक रूप से उनके 'नेता' कभी नहीं रहे और न कभी उन्होंने अपने आप को इस या उस तरह की नेतागिरी के लायक या नालायक खुद को माना व बरता. आजादी आंदोलन में वे सन्तन को कहा सीकरी के सबसे सटीक, बेजोड़ व प्रमाणिक उदाहरण थे...

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