नई दिल्ली. मुंबई के बाद अब दिल्ली के एक सहकारी बैंक में धोखाधड़ी का मामला सामने आया है. दिल्ली असेंबली पेटिशन कमिटी ने मंगलवार को पाया कि दिल्ली के को-ऑपरेटिव बैंक दिल्ली नागरिक सहकारी बैंक ने जाली इनकम टैक्स रिटर्न और जाली प्रॉपर्टी के पेपर्स और सरकारी पहचान पत्र के आधार पर बहुत सारे लोगों को लोन बांट दिए हैं. दिल्ली नागरिक सहकारी बैंक रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटिज में रजिस्टर्ड है.

ग्रेटर कैलाश के विधायक सौरभ भारद्वाज की अगुआई में हाउस पेटिशंस कमिटी ने पाया कि दिल्ली नागरिक सहकारी बैंक में करीब 600 करोड़ रुपये जमा हैं और बैंक का नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स करीब 38 फीसदी (225 करोड़ रुपये से ज्यादा) है. हाउस पेटिशंस कमिटी ने कि यह सहकारी बैंक भी पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक की राह पर चल पड़ा है.

पैनल ने पाया कि चार जांच कमिटी, इनमें एक इंटरनल प्रोब और तीन इंडिपेंडेंट ऑडिटर्स- जिसमें से एक भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नियुक्त- ने पाया कि बहुत सारे लोगों को लोन देने में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है और बैंक के चीफ एक्सक्यूटिव ऑफिस जितेंद्र गुप्ता ने बड़े पैमाने पर घोटाले को अंजाम दिया है जब वो अपने पिछले कार्यकाल में सीनियर मैनेजर ऑफ ऑडिट और पर्चेज डिपार्टमेंट के मुखिया हुआ करते थे.

सीईओ जितेंदर गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई की इजाजत आरसीएस के वीरेंदर कुमार ने 24 सितंबर को दी. डीसीएस एक्ट 2003 के सेक्शन 121(2) के तहत यह कार्रवाई की गई. गुप्ता इसके खिलाफ दिल्ली फाइनेंशियल कमिश्नर की अदालत में चले गए और कार्रवाई के खिलाफ स्टे हासिल करने में कामयाब रहे. आरसीएस ने इस स्टे ऑर्डर को चुनौती दी थी.

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