अभिमनोज. पर्दे पर जगमगाती दुनिया की पर्दे के पीछे की असली तस्वीर कमलेश पारे अक्सर दिखाते रहते हैं. इस वक्त दीपावली उत्सव के बीच खेती-किसानी की असली तस्वीर उनके नजरिए.... किसानी के इस संकट से हम सब अछूते थोड़े ही रहेंगे, से झलकती है!

समय की एक उल्टी लिखावट, जो हम पढ़ नहीं पा रहे हैं, उसे सीधा करके कमलेश पार दिखा रहे हैं, वे लिखते हैं.... आसमान में छाये काले बादलों और कहीं-कहीं हल्की बूंदा-बांदी, खेतों में बची सोयाबीन की कटाई और सिर पर खड़ी रबी की बुआई ने भारत के ग्राम-समाज के माथे पर चिंता की बड़ी लकीर खेंच रखी है. मंडियों में रौनक आई ही नहीं है.

ऐसे समय में हम शहरी, दीवाली की तैयारी कर रहे हैं. अपने अखबार सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात, घर-हवेलियों सहित कार-मोटरों और रंग बिरंगे कपड़ों के विज्ञापनों से अटे पड़े हैं, क्योंकि हमें किसानों की स्थिति न मालूम है, और न हम मालूम रखना चाहते.

याद रखिये, इस देश की अर्थव्यवस्था में जितना हिस्सा आप देते हैं, उससे कहीं ज्यादा हिस्सा गांव-देहात और आदिवासी इलाकों से आता है.

इन्हीं हालातों के वर्णन के साथ आपसे यह सोचने का निवेदन करता है, दैनिक सुबह सवेरे के अंक में छपा लेख- किसानी के इस संकट से हम सब अछूते थोड़े ही रहेंगे!

इस लेख में उन्होंने हमारी नासमझी और सरकार की लापरवाही को कुछ इस तरह से उभारा है- हम भारतीयों को अंदाज ही नहीं है कि इस साल की खरीफ फसलें लगभग बर्बाद हो गई हैं. हम अंदाज रखना भी नहीं चाहते, तभी तो सरकार के एक मंत्रीजी कहते हैं कि फिल्मों के कलेक्शन में कोई कमी नहीं आई है, तो फिर मंदी का तो प्रश्न ही नहीं उठता. यानी समाज अपने में ही मस्त है, किसी को किसी की कोई फिकर ही नहीं है.

इस लम्बी बारिश, और अभी भी जारी मौसम की नमी से धरती इतनी गीली है कि रबी की बुआई में भी देरी होने की आशंका है. दोनों ही स्थितियों में हमें अन्न के लाले जरूर पड़ने हैं.

वे खेती-किसानी की बर्बादी से बढ़ते खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं कि- याद रखिये, हम कितनी ही तनखा बढ़वा लें, कारें, गहने, फ्रिज और टीवी खरीद-बेचकर लाभ कमा लें, या रोटी के बजाय डबलरोटी खाने की कल्पना कर लें पर यह संकट आपको जरूर छुएगा.

शायद आपको याद हो कि इसी साल अपने प्रधान मंत्रीजी ने सबको सलाह भी दी थी कि अब हम भी मोटा अनाज खाना शुरू कर दें, जबकि इस साल तो मोटा अनाज ही संकट में आ गया है.

किसान अपनी जगह खुद चिंतित हैं. लेकिन लगता तो ऐसा है कि समाज और सरकार को तो पता ही नहीं कि हो क्या रहा है. तभी तो नुकसान का सर्वे हो, कैसा हो या फिर उसमें क्या हो पर तू-तू मैं-मैं ही जारी है.

बहरहाल, यह लेख जनता और सरकार, दोनों की आंखें खोलनेवाला है!

पूरा लेख यहां पढ़ें.... 

https://www.facebook.com/kamlesh.pare.9/posts/3027965213887440 

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