विश्लेषण. देेश में फिर चुनाव का माहौल है, दो राज्यों महाराष्ट्र व हरियाणा की विधानसभाओं लिए चुनाव होने वाले हैं. मतदान में ज्यादा समय नहीं बचा है. इस परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से चुनावों की तैयारियों में जुट गये हैं. गठबंधनों की बातें भी हो रही, सत्ताधारी पार्टी भाजपा और विपक्षी पार्टी कांग्रेस में जम कर युद्ध शुरू हो चुका है. हालांकि दोनों ही राज्यो में पहले से ही भाजपा के नेतृत्व में सरकारें चल रही हैं मगर महाराष्ट्र में जिस तरह पिछले पांच सालों में भाजपा व शिवसेना के रिश्ते रहे हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं. एक बार फिर वे ही रिश्तें कुछ नयी शक्ल के साथ मैदान में है. दूसरी तरफ हरियाणा में भाजपा ने 2014 में  अपने बूते पर पूर्ण बहुमत लाकर चैंकाया था उससे यह तय हो गया था कि भाजपा ने इस राज्य की जाति आधारित राजनीति की जड़ों को उखाड़ दिया. इस जादू जैसे बदलाव का श्रेय नरेन्द्र मोदी को ही दिया जा सकता है. एक बार फिर दोनों ही राज्यों के चुनावो में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का जादू लोगों के सर चढ़कर बोलता हुआ दिखाई दे रहा है.

इस बार दोनों ही राज्यों के चुनाव बहुत दिलचस्प होंगे. महाराष्ट्र में पिछले पांच साल शिवसेना ने सरकार में रहने के बावजूद मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फडणवीस की नाक में दम कर रखा था. अब साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं, हरियाणा में ऐसी स्थिति नहीं है, लेकिन इन चुनावों में दोनों ही प्रांतों में सत्ता एवं विपक्षी दलों के बीच घमासान मचा है. इसके लिए विभिन्न राजनीतिक दल समीकरण बनाने-बिठाने की जोड़तोड़  एवं भाजपा को परास्त करने में जुटे हैं. इन स्थितियों के बीच मतदाता को भी जागरूक होना है. आने वाले चुनाव में मतदाता इतने सशक्त रूप में अपनी भूमिका को प्रस्तुत करें कि राजनीतिक दल चुनाव के बाद उसकी अनदेखी करने का दुस्साहस न कर सके. यहां तक कि मतदाता को लुभाने की कोशिशें और उसे भरमाने के प्रयासों से भी राजनैतिक दल उपरत हों, यही वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा और एक सशक्त संदेश है.

यह वक्त राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को कोसने की बजाय मतदाताओं के जागने का है. आज मतदाता विवेक से कम, सहज वृति से ज्यादा परिचालित हो रहा है. इसका अभिप्रायः यह है कि मतदाता को लोकतंत्र का प्रशिक्षण बिल्कुल नहीं हुआ. सबसेे बड़ी जरूरत है कि मतदाता जागे, उसे लोकतंत्र का प्रशिक्षण मिले. हमें किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है. किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प भी नहीं खोजना है. विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, अकुशलता का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, महंगाई का, राजनीतिक अपराधों का, व्यापारिक निराशाओं का, आर्थिक अस्थिरता का, बेरोजगारी का. इन मुद्दों की इन चुनावों में कोई सार्थक चर्चा नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण है, बल्कि विपक्षों दलों के सामने एक मौका है कि वे इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाये, सत्ता पक्ष भी इन मुद्दों को नहीं उठा रही है. वास्तव में यह बहुत ही हास्यास्पद स्थिति है, चुनावी प्रचार में भाजपा जिस तरह जम्मू-कश्मीर राज्य से धारा 370 के समाप्त किये जाने को  मुद्दा बना रही है उसी से स्पष्ट है कि यह पार्टी इस बार भी नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता पर ही वोट मांग रही है. बेशक धारा 370 से महाराष्ट्र या हरियाणा विधानसभा चुनावों का कोई सीधा लेना-देना नहीं है फिर भी ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दोनों ही राज्यों में चुनावी हार-जीत का निर्णय इसी मुद्दे पर होने वाला है. जिसके पास सब कुछ, वह स्वयंभू नेता और जिसके पास कुछ नहीं वह निरीह मतदाता. जब से यह परिभाषा बनाई गई है तभी से चुनावों में मतदाता को गुमराह किया जाता रहा है, ठगा जाता रहा है. तभी से नेता नाम बदनाम हुआ और तभी से मतदाता ढो रहा है एक अनचाहा भार.

नेतृत्व की पुरानी परिभाषा थी, ‘सबको साथ लेकर चलना, निर्णय लेने की क्षमता, समस्या का सही समाधान, कथनी-करनी की समानता, लोगांे का विश्वास, दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता.’ आज नारों और नोटों से लड़ाई लड़ी जा रही है, चुनाव लड़े जा रहे हैं- सत्ता प्राप्ति के लिए. जो जितना लुभावना नारा दे सके, जो जितना धन व्यय कर सके, वही आज मतदाता को भरमा सकता है.

कश्मीर राष्ट्रीय गौरव का मुद्दा था, जिसे होने नहीं दिया. जब वहां पाकिस्तान परस्त लोग खुलकर भारत की सरकार को चुनौती दिया करते थे कि इस राज्य से उसकी विशेष हैसियत कोई नहीं छीन सकता और वे कश्मीर समस्या के हल में खुद भी एक पक्ष होंगे. इस जटिल स्थिति से मुक्ति का श्रेय नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को ही जाता है, और इसका श्रेय उनको लेना भी चाहिए. यह स्थिति पिछले 72 साल से चल रही थी और भारत की संसद के हाथ बन्धे हुए थे. इसकी वजह धारा 370 ही थी. अकेला ऐसा राज्य था जिसे संविधान में प्रदत्त केन्द्र -राज्य सम्बन्धों की धारों से न जोड़ कर 370 से जोड़ा गया था और क्षेत्रीय कश्मीरी नेता इस बात का फायदा उठाते रहे. असल में यह बोझ देश के जन-जन पर था, उनमें हरियाणा एवं महाराष्ट्र के लोग भी है. इसी स्थिति के मध्यनजर प्रधानमन्त्री ने महाराष्ट्र राज्य की प्रमुख पार्टियों कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस को चुनौती दे दी कि यदि उनमें हिम्मत है तो वे घोषणा करें कि वे धारा 370 को वापस कश्मीर में लेकर आयेंगे? श्री मोदी के इस बयान से ही तय हो गया है कि इन राज्यों में चुनावी एजेंडा क्या होगा? इसी प्रकार हरियाणा में तो इसके मुख्यमन्त्री मनोहर लाल खट्टर ने पहले से ही कश्मीर को चुनावी मुद्दा बना डाला है. इन स्थितियों में कश्मीर मुद्दा विपक्षी दलों की ऐसी विवशता बन गयी कि उन्हें भी कश्मीर राग अलापना ही होगा, चाहे मंद स्वर में ही अलापे. लेकिन प्रश्न यही है कि इस राष्ट्रीय मुद्दें के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों का क्या होगा?

विपक्ष की धार दोनों ही राज्यों में निस्तेज बनी हुई है. दोनों ही राज्यों में विपक्षी पार्टियां सत्ता के विरुद्ध उपजने वाले रोष को प्रकट ही नहीं कर पा रही हैं और आम जनता के दैनिक जीवन के मामलों एवं मुद्दों को केन्द्र में नहीं ला पा रही हैं. इससे विपक्ष थका हुआ लग रहा है. लोकतन्त्र के लिए यह स्थिति अच्छी नहीं मानी जा सकती. महाराष्ट्र और हरियाणा के अपने-अपने मुद्दे हैं. महाराष्ट्र में तो किसानों की समस्या बदस्तूर जारी है, बेरोजगारी भी बड़ी समस्या है, लेकिन सवाल यह है कि विपक्षी दल एवं उनके नेता क्यों थके-थके हैं, क्यों नहीं वे जनता के इन ज्वलंत मुद्दों को उठा पा रहे हैं, जबकि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह लगातार आम आदमी के दिल को जीतने वाली आवाज में बोल रहे हैं, उनको आकर्षित कर रहे हैं. वे विपक्षी दलों की कमजोर मनःस्थिति का फायदा उठा रहे हैं. लेकिन यह स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये घातक हैं.  

लोकतंत्र को मजबूती देने के लिये दोनों ही राज्यों के चुनावों में मतदाता को दोहरी भूमिका निभानी होगी- घर के मालिक की भी और घर के पहरेदार की भी. मालिक के नाते उसका कर्तव्य होगा कि वह जनता के हितों के ठेकेदार कहलाने वालों को ठोक बजाकर देखे-परखे. और घर के पहरेदार के नाते उसका कर्तव्य बनता है कि वह सिर्फ जागता ही नहीं रहे, सतत सावधान भी रहे. इसी जागरूकता और सावधानी का तकाजा है कि वह सत्ता में  बैठने के इच्छुक लोगों की कथनी-करनी को विवेक के तराजू पर तोलेे. चूंकि उसे ही सबसे अधिक खोना और सबसे अधिक पाना है, इसलिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी उसी की है. इस जिम्मेदारी को मतदाता वैयक्तिक स्तर पर भी निभाएं- अपने आप से यह पूछकर कि उसके वोट देने का आधार क्या होगा. पहला निर्णय तो मतदाता को यह करना होगा कि उसे अनिवार्य रूप से वोट देना ही है. फिर यह तय करना होगा कि वह ‘गलत’ के पक्ष में वोट नहीं देगा. चुनाव की स्वस्थ परम्परा में जनता द्वारा चरित्र चयन की परख भी पैनी हो. क्योंकि मतदाता और उम्मीदवार की अर्हताएं ही राष्ट्रीयता का सुरक्षा कवच बनती है. यदि इस सन्दर्भ में हमारे कदम गलत उठते हैं या हम अपने मतदाता होने के दायित्व को ठीक नहीं निभाते हंै तो अच्छे आदमी नेतृत्व से जुड़ नहीं पाते और अयोग्य व्यक्तियों के हाथ में सत्ता सौंप कर अपनी जिम्मेदारी का सम्यक् निर्वाह नहीं करते. धृतराष्ट्र की आंखों में झांक कर देखने का प्रयास करेंगे तो वहां शून्य के सिवा कुछ भी नजर नहीं आयेगा. इसलिए हे मतदाता प्रभु! जागो! ऐसी रोशनी का अवतरण करो, जो दुर्योधनों के दुष्टों को नंगा करें और अर्जुन के नेक इरादों से जन-जन को प्रेरित करें.

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