देवी मां के दर्शन करने के लिए किसी दिन विशेष की जरूरत नहीं होती बस श्रद्धा चाहिए, लेकिन नवरात्रि को खास माना गया है. भारत में देवी दुर्गा के कई मंदिर हैं, नवरात्रि में इन मंदिरों में देवी मां का दर्शन करना बहुत ही खास माना जाता है. ये कुछ ऐसे मंदिर हैं, जहां शारदीय नवरात्रि में मां की विशेष कृपा पाने के लिए देशभर से भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है.

51 शक्तिपीठों में से एक नैना देवी मंदिर हिंदू धर्म के पवित्र गंतव्यों में से एक है. मां की आराधना के प्रमुख स्थल में शामिल यह मंदिर उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित है. सरोवर नगरी नैनीताल के उत्तरी किनारे पर स्थित मां नयना देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है. यह मंदिर नेपाल की पैगोड़ा और गौथिक शैली का समावेश है.

ऐसी मान्यता है कि ये मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया है, लेकिन भूस्खलन के कारण यह नष्ट हो गया था और बाद में 1883 में, मंदिर स्थानीय लोगों द्वारा फिर से बनाया गया. मंदिर के अंदर नैना देवी के साथ गणेशजी और मां काली की भी मूर्तियां हैं. मंदिर के प्रवेशद्वार पर पीपल का एक विशाल वृक्ष है. यहां माता पार्वती को नंदा देवी कहा जाता है. मंदिर में नंदा अष्टमी के दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. 

नैना देवी मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया था. 1883 में इसका पुनर्निर्माण किया गया था. ऐसी मान्यता है कि जब शिव सती का मृत शरीर लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. नैनी झील के स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे. इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर का नाम नैना देवी पड़ा. प्रचलित मान्यता के अनुसार मां के नैनों से गिरे आंसू ने ही ताल का रूप धारण कर लिया और इसी वजह से इस जगह का नाम नैनीताल पड़ा. 

अम्बाजी मंदिर मां का सिद्धपीठ

गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बनासकांठा जिले की दांता तालुका में गब्बर पहाड़ियों के ऊपर अम्बाजी का मंदिर बना हुआ है. यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है. सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है. मंदिर का शिखर एक सौ तीन फीट ऊंचा है. शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं. इस मंदिर में ना तो कोई मां की मूर्ती है ना ही कोई पिंडी. इस मंदिर में मां अम्बाजी की पूजा श्रीयंत्र की आराधना से होती है जिसे भी सीधे आंखों से देखा नहीं जा सकता. 

ज्वाला देवी

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी का प्रसिद्ध मंदिर है. ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर भी कहा जाता है. यहां किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं को पूजा जाता है. 51 शक्तिपीठ में से एक इस मंदिर में नवरात्र में भक्तों का तांता लगा रहता है. नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला माता जो चांदी के दीये के बीच स्थित है उसे महाकाली कहते हैं. अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं. 

अकबर ने इस ज्वाला को बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन वो नाकाम रहे थे. ज्वाला देवी शक्तिपीठ में माता की ज्वाला के अलावा एक अन्य चमत्कार देखने को मिलता है. यह गोरखनाथ का मंदिर भी कहलाता है. मंदिर परिसर के पास ही एक जगह 'गोरख डिब्बी' है. देखने पर लगता है इस कुण्ड में गर्म पानी खौल रहा है जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है.

ज्वाला देवी

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी का प्रसिद्ध मंदिर है. ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर भी कहा जाता है. यहां किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं को पूजा जाता है. 51 शक्तिपीठ में से एक इस मंदिर में नवरात्र में भक्तों का तांता लगा रहता है. नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला माता जो चांदी के दीये के बीच स्थित है उसे महाकाली कहते हैं. अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं. 

अकबर ने इस ज्वाला को बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन वो नाकाम रहे थे. ज्वाला देवी शक्तिपीठ में माता की ज्वाला के अलावा एक अन्य चमत्कार देखने को मिलता है. यह गोरखनाथ का मंदिर भी कहलाता है. मंदिर परिसर के पास ही एक जगह 'गोरख डिब्बी' है. देखने पर लगता है इस कुण्ड में गर्म पानी खौल रहा है जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है.

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