विधानसभा चुनाव. जहां राजस्थान की सियासी सोच देश के कई राज्यों के चुनावों में असर डालती रही है, वहीं महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी राजस्थानियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी. राजस्थान के लाखों परिवार महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में हैं. इनका संबंध राजस्थान से बना हुआ है. यही वजह है कि जो सियासी सोच इन राज्यों में रहती है, वही कई बार लहर बन कर राजस्थान आती है, तो राजस्थान में होने वाले बदलावों का असर इन राज्यों में भी नजर आता है. मुंबई जैसे शहरों में किराणा, चाय आदि दुकानें राजस्थानियों की हैं तो कुछ अन्य प्रमुख व्यवसायों में भी हैं. इन दुकानों पर काम करने वाले भी ज्यादातर कर्मचारी राजस्थान के ही हैं.

ये वहां सपरिवार रहते हैं और कार्य-व्यवसाय करते हैं. ये लोग केवल सियासी सोच बनाने के लिए प्रेरक का काम ही नहीं करते हैं, बल्कि अपनी पसंद की पार्टियों, उम्मीदवारों को चंदे के रूप में आर्थिक सहयोग भी करते हैं. इसी तरह, जहां हरियाणा की सियासी सोच का असर उत्तर-पूर्वी राजस्थान पर नजर आता है, वहीं दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा पर राजस्थान की राजनीतिक हवाएं अपना प्रभाव दिखाती रही हैं.

राजस्थान के हनुमानगढ़, शेखावाटी, अलवर के क्षेत्र हरियाणा से जुड़े हैं, तो हरियाणा के हिसार, सिरसा, फतेहाबाद, चरखी दादरी, रेवाड़ी, नारनौल आदि का जुड़ाव राजस्थान से है. यहां सामाजिक रिश्ते तो होते ही हैं, सियासी तौर पर भी एक-दूजे की सोच अपना प्रभाव दिखाती है. देखना दिलचस्प होगा कि इस बार महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा चुनाव में राजस्थानियों की सियासी सोच क्या राजनीतिक रंग दिखाती है!

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