मंदी के इस दौर में एक कारोबार ऐसा भी है जिस पर मंदी का कोई असर नहीं है. यह धंधा लगातार तरक्की पर है. धंधा भी ऐसा है कि जो हम सबके जीवन से जुड़ा है, मगर हम फिर भी उससे अनजान हैं. लोगों की निजी जानकारियां 15 से 50 पैसे प्रति व्यक्ति थोक के भाव बिक रही है. यह कारोबार दस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है. वहीं अब इसमें विदेशी कंपनियां इसमें कूद गई हैं. कुछ कंपनियां ऐसी हैं जो उक्त रेट में लोगों की निजी जानकारी से संबंधित डेटा थोक में खरीद लेती हैं और उसके बाद वे दूसरी कंपनियों को अपने दामों पर बेचती हैं. वहीं कोई कानून न बने होने से पुलिस ऐसे मामलों में चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही है.

10 हजार करोड़ रुपये से ऊपर का कारोबार

लोगों के पास कॉल सेंटर से अमूमन रोजाना ही कोई न कोई फोन आ जाता है. कोई इंश्योरेंस लेने की बात कहता है तो कोई प्लॉट, फ्लैट, क्रेडिट कार्ड, या पर्सनल लोन का ऑफर करता है. दर्जनों ऐसे प्रोडेक्ट हैं, जिनकी मार्केटिंग के लिए आपको परेशान किया जाता है. आप सोचते होंगे कि ये इतने सारे फोन कैसे आ रहे हैं, हमने तो किसी को नंबर नहीं दिया था. इस सवाल के बाद ही दिमाग झनझना उठता है.

राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के साइबर सुरक्षा विंग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लोगों की निजी जानकारियां धड़ल्ले से लीक हो रही हैं. ये काम करने वाले कोई दो चार कॉल सेंटर नहीं हैं, बल्कि हजारों छोटे बड़े सेंटर खुल गए हैं.

अधिकारी के मुताबिक, कई कॉल सेंटर तो ऐसे हैं, जो सीधे ही सरकारी विभाग, जैसे बैंक, इंश्योरेंस सेक्टर, दूरसंचार, रेलवे और डाकतार आदि का डेटा उठा लेते हैं. चूंकि अब सब रिकॉर्ड डिजिटल है तो इसमें कोई ज्यादा दिक्कत नहीं आती. संबंधित विभाग में सेटिंग होने के बाद सारा डेटा चंद मिनटों में इधर से उधर हो जाता है. हमारे देश में यह धंधा लगातार बढ़ता जा रहा है. मौजूदा समय की बात करें तो यह जानकारी बेचने का कारोबार 10 हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है.

रुतबे के हिसाब से रेट तय

खास बात है कि लोगों की निजी जानकारी का सौदा करने के इस धंधे में व्यक्ति के रुतबे के हिसाब से रेट तय होता है. मध्यम वर्ग या उससे नीचे के लोगों की जानकारी लेनी है, तो वह 15-20 पैसे प्रति व्यक्ति के हिसाब से मिलेगी. कोई वीआईपी है, उद्योगपति है, नेता है, अफसर है या कोई और ऐसा व्यक्ति जो सामान्य श्रेणी से ऊपर है, उसका रेट 50-55 पैसे प्रति व्यक्ति रहता है.

पिछले दिनों दिल्ली पुलिस ने इस धंधे में शामिल जो गैंग पकड़ा था, उससे पूछताछ में पता चला कि कॉल सेंटर वालों के पास सब लोगों की जानकारी है. हम यह जानकारी खरीदते हैं और उसे आगे बेच देते हैं. कुछ सेंटर ऐसे हैं जो इस निजी जानकारी का इस्तेमाल लोगों को ठगने के लिए करते हैं.

वे लोगों के पास फोन कर उन्हें आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं. किसी परिवार का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है, तो वह जानकारी भी कॉल सेंटर वालों के पास रहती है. ऐसे समय में वे सीधे पीड़ित परिवार के पास इंश्योरेंस एजेंट बनकर फोन करते हैं. जब कोई व्यक्ति ऐसी मुसीबत में होता है तो वह आर्थिक मदद पाने के चक्कर में अपना भारी नुकसान करा बैठते हैं.

विदेशी कंपनियों को भाया ये कारोबार

विदेशी कंपनियां, जो हमारे देश में कारोबार करने के लिए आती हैं, उन्हें सर्वे कर लोगों का डेटा एकत्रित करना पड़ता था. कॉल सेंटरों ने अब उनका काम बहुत आसान कर दिया है. वे इन सेंटर्ल से कोड़ियों के दाम लोगों की निजी जानकारी खरीद लेते हैं. 15 पैसे या 50 पैसे, यह कीमत इन विदेशी कंपनियों के लिए कुछ नहीं होती. उन्हें बैठे बिठाए सारा डेटा मिल जाता है. इससे वे अपने बिजनेस को मनचाहा मोड़ दे सकते हैं. एक नई बात यह है कि अब कई विदेशी कंपनियां खुद इस धंधे में आने लगी हैं, जो सस्ते रेट पर जानकारी थोक में खरीद लेती हैं और बाद में उसे दूसरी कंपनियों को मुनाफे में बेच देती हैं.

रोकने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि सरकार को फौरन इस धंधे पर रोक लगानी चाहिए. असल में दिक्कत यह है कि हमारे देश में इस धंधे को रोकने के लिए अभी कोई कानूनी प्रावधान ही नहीं है. अब यह धंधा एक बड़े उद्योग का रुप लेता जा रहा है. ये लोगों का शोषण है और निजता का उल्लंघन है.

किसी की मर्जी के खिलाफ उसकी जानकारी दूसरे व्यक्ति को दी जा रही है. बड़ी कंपनियां अपने कारोबार का प्रयोग करने के लिए इस डेटा का इस्तेमाल करती हैं. किसी भी नई अर्थव्यवस्था के लिए यह डेटा आत्मा का काम करता है. डेटा प्रोटेक्शन के लिए जस्टिस श्रीकृष्णा कमेटी बनाई गई थी.

इस बाबत एक बिल भी लाने का प्रस्ताव था, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. सरकार ने सुझाव भी मांगे, मगर अभी सब फाइलों में ही चल रहा है. मौजूदा सेक्शन 87 में सूचना प्रौद्योगिकी का जिक्र है, उसमें भी डेटा प्राइवेसी बाबत कुछ नहीं कहा गया है. यही वजह है कि लोगों की निजी जानकारी खुले आम बिक रही है. प्राइवेसी का हनन किया जा रहा है. दुग्गल ने कहा, अगर भारत को आईटी के मामले में सुपरपावर बनना है तो डेटा प्रोटेक्शन कानून लाना ही होगा.

निजी जानकारी बाजारवाद का हिस्सा नहीं

इंडियन साइबर आर्मी (एथिकल हैकर्स), जो कि दिल्ली पुलिस की साइबर क्राइम इंवेस्टिगेशन यूनिट की मदद करती है, इस टीम के सीईओ किश्लय चौधरी का कहना है, हमारे देश में अभी तक इस बाबत कोई कानून नहीं है. लोगों की निजी जानकारी को किसी भी तरह से मार्केटिंग का रुप नहीं दिया जा सकता. एक सीमा तक ही लोगों की जानकारी ली जा सकती है. वह भी कानूनी दायरे में. कानूनी प्रावधान न होने से लोगों ने इसे एक धंधा बना लिया है. वह कहते हैं कि लोगों की निजी जानकारी बाजारवाद का हिस्सा नहीं है. सरकार को इस दिशा में जल्द से जल्द ठोस कानून बनाना चाहिए.

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