मंगलवार (27 अगस्त 2019). मुकेश जैसे गायक सदियों में पैदा होते हैं जिनकी आवाज गीत के भावों को दिल के अंदर तक उतार देती है. उनके गाए ज्यादातर गीत वैसे तो प्रेम की भावनाओं को उजागर करते हैं लेकिन राष्ट्रभक्ति की लय में गाए- फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी... जैसे गीत आज भी लोगों के दिलों में जिन्दा हैं! यही नहीं, एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, मैं पल दो पल का शायर हूँ... जैसे गीत जीवन की सच्चाइयों से रूबरू करवाते हैं.

27 अगस्त, 1976 को यह दिल को छूने वाली आवाज हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गई, लेकिन उनके गीतों में मुकेश आज भी जिन्दा हैं. जरूरत इस बात की है कि उनके गाए प्रेरणास्पद गीतों को संरक्षित किया जाए और उसे राष्ट्र की संपत्ति घोषित किया जाए. मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को लुधियाना के जोरावर चंद माथुर और चांद रानी के घर हुआ था. इनकी बड़ी बहन संगीत की शिक्षा लेती थीं और मुकेश बड़े चाव से उन्हें सुना करते थे. मोतीलाल के घर मुकेश ने संगीत की पारम्परिक शिक्षा लेनी शुरू की.

मुम्बई आने के बाद इन्हें 1941 में निर्दोष फिल्म में बतौर एक्टर सिंगर पहला ब्रेक मिला. इंडस्ट्री में शुरुआती दौर मुश्किलों भरा था. लेकिन के एल सहगल को इनकी आवाज बहुत पसंद आयी. पचास के दशक में इन्हें एक नयी पहचान मिली, जब इन्हें राजकपूर की आवाज कहा जाने लगा. अनेक साक्षात्कार में खुद राज कपूर ने अपने मित्र मुकेश के बारे में कहा है कि- मैं तो बस शरीर हूँ मेरी आत्मा तो मुकेश है! मुकेश ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना लेने के बाद, कुछ नया करने की सोची और इसलिए वे फिल्म निर्माता बन गये.

साल 1951 में मल्हार और 1956 में अनुराग बनाई भी लेकिन कामयाबी नहीं मिली. पचास के दशक के आखिरी सालों में मुकेश फिर पाश्र्वगायन के शिखर पर पहुँच गये. यहूदी, मधुमती, अनाड़ी जैसी फिल्मों ने उनके अंदाज को एक नयी पहचान दी और फिर- जिस देश में गंगा बहती है, के गाने के लिए वे फिल्मफेयर के लिए नामांकित हुए. साठ के दशक की शुरुआत मुकेश ने कल्याण-आनंद के डम-डम डीगा-डीगा, नौशाद का मेरा प्यार भी तू है और एस डी बर्मन के नगमों से की और फिर राज कपूर की फिल्म संगम में शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध किए गानों ने धूम मचा दी.

सत्तर के दशक का आगाज मुकेश ने- जीना यहाँ मरना यहाँ गाने से किया. उस वक्त के हर बड़े फिल्मी सितारों की ये आवाज बन गये थे. साल 1970 में मुकेश को मनोज कुमार की फिल्म पहचान के गीत के लिए दूसरा फिल्मफेयर मिला और फिर 1972 में मनोज कुमार की ही फिल्म के गाने के लिए उन्हें तीसरी बार फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया. साल 1974 में फिल्म रजनीगंधा के गाने के लिए मुकेश को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया. सत्तर के दशक में भी इन्होंने अनेक सुपरहिट गाने दिये जैसे.... एक दिन बिक जाएगा, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है और संगीत प्रेमियों की धड़कन बन गए.

किसी भावना को दिल से कैसे व्यक्त किया जाता है, यह कोईं मुकेश से सीखे!

*यादें 27 अगस्त...

फ्लैश बैक-

27 अगस्त, 1604- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में आदि गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतिस्थापना की गई.

27 अगस्त, 1870- भारत के पहले मजदूर संगठन के तौर पर श्रमजीवी संघ की स्थापना की गई.

27 अगस्त, 1976- भारतीय सशस्त्र सेना की प्रथम महिला जनरल मेजर जनरल जी अली राम मिलिट्री नर्सिंग सेवा की निदेशक नियुक्त हुई.

27 अगस्त, 1979- आयरलैंड के समीप एक नौका विस्फोट में लॉर्ड माउंटबेटन का निधन.

27 अगस्त, 1985- नाइजीरिया में सैनिक क्रान्ति में मेजर जनरल मुहम्मद बुहारी की सरकार का तख्ता पलटा गया और जनरल इब्राहिम बाबनगिदा नये सैनिक शासक बने.

27 अगस्त, 1999- सोनाली बनर्जी भारत की प्रथम महिला मैरिन इंजनियर बनीं.

27 अगस्त, 1999- भारत ने कारगिल संघर्ष के दौरान अपने यहाँ बंदी बनाये गये पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा किया.

27 अगस्त, 2004- शौकत अजीज पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री चुने गये. 27 अगस्त, 2008- सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके माथुर को सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल का पहला अध्यक्ष बनाया गया.

27 अगस्त, 2008- झारखण्ड मुक्तिमोर्चे के प्रमुख शिबु सोरेन ने झारखण्ड के छठे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की. 27 अगस्त, 2009- बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती को अध्यक्ष पद पर तीसरी बार चुन लिया गया.

निधन-

27 अगस्त, 1976- मुकेश, सुप्रसिद्ध पाश्र्वगायक

27 अगस्त, 2006- ऋषिकेश मुखर्जी, भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्माता व निर्देशक

महत्वपूर्ण दिवस-

27 अगस्त, राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा

आज का दिन : ज्योतिष की नज़र में


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