राहु नशा देता है,वह जिस भाव का मालिक होता है,उसी भाव का नशा दिमाग में छाने लगता है और धीरे धीरे वह उसी प्रकार के काम करने का नशा दिमाग में इस कदर फैला देता है कि दिमाग अन्य कहीं काम करने का नाम ही नही लेता है. राहु गुरु शनि और केतु जो कुछ भी होते है अपना असर अपने से छोटों पर फ़िर अपने पुत्र पुत्रियों पर और अपने जानकार और जीवन साथी पर साथ ही अपने कुल के ऊपर असर देते है,केवल शनि कुल पर अपना असर इसलिये नही दे पाता क्योंकि जो जैसा करता है वह वैसा फ़ल प्राप्त करता है,कर्म का फ़ल कर्मानुसार ही मिलता है. इन्दौर के एक सज्जन की कुन्डली देखी तो उनके जीवन और उनके द्वारा किये गये सवालों का उत्तर राहु के देखते ही मिलना शुरु हो गया था. उनकी कुन्डली तुला लगन की है,और छठे तथा तीसरे भाव के मालिक गुरु वक्री होकर लगन में विराजमान है,उनके बारहवें भाव में दूसरे और सातवें भाव के स्वामी मंगल विराजमान है,मंगल का साथ भी चौथे और पांचवें भाव के स्वामी शनि के साथ है लेकिन शनि बक्री है,ग्यारहवें भाव में चन्द्रमा विराजमान है,नवें भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु विराजमान है,लगनेश और अष्टमेश शुक्र सप्तम मे विराजमान है,भाग्येश और व्ययेश बक्री होकर अष्टम मृत्यु स्थान में विराजमान है,ग्यारहवें भाव के मालिक सूर्य भी आठवें यानी मृत्यु के भाव में विराजमान हैं.

इस व्यक्ति की जीवनी बहुत ही रहस्यमय और मजेदार है,जथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे कथन के अनुसार यह सभी ग्रह अपने अपने अनुसार जन्म के समय में आसमान में अपनी स्थिति तो दर्शा रहे थे,लेकिन जातक के शरीर में भी इस प्रकार का मेल उन्होने पैदा कर दिया था,लगन का मतलब होता है,शरीर की बनावट और शरीर का तेज नाम और पहिचान,गुरु का लगन में होना साफ़ तौर पर जाहिर करता है कि जातक ज्ञानी है,और छठे तथा तीसरे भाव का मालिक होने का भी मतलब साफ़ है कि वह छुपी हुयी बातों को साफ़ तौर पर जाहिर कर सकता है,लेकिन बक्री होने का मतलब भी साफ़ है कि जातक किसी भी काम को करने के लिये अपने आगे नही अपने पीछे देखता है,यानी जब कोई ग्रह बक्री होता है तो वह अपने से आगे के भाव को नही पीछे के भाव को देखता है,अगर यह गुरु मार्गी होता तो यह काफ़ी खतरनाक था,जैसे कि यह अपने द्वारा प्राप्त किये जाने वाले ज्ञान को प्रकाशित करने के लिये अपने से दूसरे धन भाव को देखता,लेकिन बक्री होने के कारण यह अपने द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले ज्ञान को केवल इसलिये प्रकाशित करता है कि इसे मोक्ष की जरूरत है,बारहवां भाव मोक्ष का कारक है. बक्री गुरु आशिकी का भी एक उदाहरण माना जाता है,लेकिन सप्तम में मंगल के घर में शुक्र यानी पत्नी के आने से यह भटक नही सकता,सप्तम में शुक्र होने से यह जातक अपनी सलाह में अपनी पत्नी को रखेगा,लालकिताब के अनुसार जीवन का राजा लगन है तो सप्तम उस राजा का मंत्री है,और आठवां भाव उस राजा के नेत्र है और ग्यारहवां भाव उसके पैर है,जातक की लगन में गुरु तो राजा है,मंत्री शुक्र है बुध नेत्र है और चन्द्रमा पैर. लालकिताब के अनुसार ही माना जावे तो गुरु जीव है,शुक्र उसकी पत्नी बुध उसकी बहिन बुआ या बेटी,और चन्द्रमा उसकी माता.

व्यक्ति को मोक्ष के लिये यह माना जाता है कि उसके पुत्र संतान नहीं होती है,अगर होती भी है तो वह नालायक होती है,और खुद को संतान पैदा करने के लिये योग्य नही मानती है,अथवा उसकी पत्नी के द्वारा अनैतिक रूप से अवैद्य संतान के रूप में पुत्र को प्राप्त कर लिया जाता है,साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि उसकी पुत्र संतान अपनी औकात अपने से तीन सौ कोश यानी चार सौ पचास किलोमीटर के आगे जाकर बनाती है,लेकिन इस जातक को मोक्ष प्राप्त नही है,कारण गुरु लगन में है,और अगर यह गुरु बारहवें भाव में होता,तो इसे मोक्ष प्राप्त हो सकता था,मोक्ष के स्थान में मंगल शनि (वक्री) के साथ विराजमान है,शनि चौथे और पांचवें भाव का मालिक है,मंगल दूसरे और सातवें भाव का मालिक है,इसकी मृत्यु चौथे,पांचवें,सातवें और दूसरे भाव के कारणों से ही होगी,यह तो निश्चित है,इन कारणों को और भी साफ़ तरीके से देखने के लिये कुंडली को पलट कर देखा जावे तो शुक्र चन्द्र केतु एक तरफ़ और गुरु राहु एक तरफ़ होने से गुरु राहु का युद्ध शुक्र चन्द्र केतु से है.

गुरु जीव है और राहु उसका सिर केतु उसका धड,शुक्र उसकी जननेद्रियां चन्द्र उसके शरीर का पानी,उसकी सोच और उसके जान पहिचान के लोग. शुक्र चन्द्र का मतलब है कि माता के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला धन और भौतिक सम्पत्ति,और केतु का मतलब है उसकी रखवाली करना,देखभाल करना,केतु कुत्ता है,तो कुत्ते की भांति उस भौतिक संपत्ति पर नजर रखना. सूर्य पिता भी है और पुत्र भी,पत्नी के भाव से दूसरे भाव में (अष्टम) सूर्य के आने से अपने को पिता की तरह से दिखाना और अपना नाम रोशन करना पत्नी के कुटुंब के अन्दर ही समझ में आता है,पत्नी से नवें भाव में केतु का आना,धर्म पुत्र की तरह से अपनी औकात चलाना,पत्नी के द्वारा जनता के अन्दर अपने को धार्मिक रूप से प्रदर्शित करना,बुध बक्री होने से संतान के रूप में पत्नी की बहिन के पुत्र को संभालना और उसकी ही देखभाल करना,आदि कारण माने जाते है.

जातक के द्वारा जो प्रश्न किया गया है उसका रूप भी मंगल से सम्बन्धित है,उसने पूंछा है कि उसने अपने सीधे हाथ की सूर्य की उंगली में मूंगा पहिन रखा है,गुरु बक्री होकर बारहवें भाव के मंगल को देख रहा है,पूरे तीस अंश का अन्तर है,मंगल का रत्न मूंगा है,मंगल को त्रिकोणात्मक रूप से देखने वाले ग्रह बुध और सूर्य है,सूर्य सोना है और बुध गोल अंगूठी,लेकिन बुध बक्री होने से वह हमेशा नही पहिनी जा सकती है,भाग्येश का बक्री होना और आठवें भाव में बैठना तथा बक्री होकर सूर्य के साथ अपने को समाप्त कर लेना,और असहाय होकर लगातार पत्नी की तरफ़ देखना,पत्नी को सूर्य की चकाचौंध में खुद के भाग्य में केवल इकलौते पुत्र का समझ में आना,आदि बातों से मंगल किसी भी प्रकार से जातक की कुन्डली में दोषी नही है,साथ ही शनि के साथ मंगल के होने से अंगारे को बर्फ़ पर रखने से वह अपना प्रभाव कहां तक दिखा सकता है,अगर पहिनना ही तो बक्री बुध को सम्भालने के लिये रैनबो पहिनना जरूरी है,जो ग्यारहवें चन्द्र की तरह सफ़ेद हो,नवें राहु का नीला प्रकाश  आठवें सूर्य की रोशनी से प्राप्त करने के बाद बक्री गुरु (गले) में चांदी में पहिना जावे.

साभार :astrobhadauria1414 dot wikidot dot com

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