सियासत. पीएम नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में राजस्थान को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. यही नहीं, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, हनुमान बेनीवाल और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है.केन्द्र में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने की आंशकाओं के चलते चुनाव से पहले हर स्तर पर समझौता करके चलने वाली मोदी-शाह टीम बहुमत मिलने के बाद फिर से अपने पुराने सियासी अंदाज में आ गई है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़, हनुमान बेनीवाल और दुष्यंत सिंह को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने के अलग-अलग कारण हो सकते हैं.

सबसे पहले राज्यवर्धन सिंह राठौड की बात. पिछली सरकार में लोकप्रिय मंत्री रहे राज्यवर्धन सिंह राठौड़ इस बार मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हैं, तो इसकी वजह यही मानी जा रही है कि उनकी सियासी सक्रियता और लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें सत्ता-संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है. वैसे तो उन्हें राजस्थान का नेतृत्व उन्हें देने की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं, इसलिए हो सकता है कि उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक विकल्प के तौर पर आगे बढ़ाया जाए. राजे और मोदी टीम के सियासी रिश्ते जगजाहिर हैं, लेकिन राजे जैसा लोकप्रिय और प्रभाव रखने वाला कोई दूसरा नेता पूरे प्रदेश में अब तक नहीं है, इसलिए अब राठौड़ को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है. सबसे चैंकाने वाला निर्णय यह हो सकता है कि उन्हें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाए. यह तय है कि राठौड़ को किसी बड़े उद्देश्य के लिए मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है.

लोकसभा चुनाव में मिशन 25 पूरा करने के नजरिए से जाट बेल्ट में विशेष असर रखने वाले हनुमान बेनीवाल को बीजेपी ने अपने साथ लिया था और इसका फायदा भी मिला, लेकिन एक एमपी वाले दल को मंत्रिमंडल में जगह देना मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब हो सकता था, शायद इसीलिए उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है. क्योंकि इस वक्त बेनीवाल के दल के बीजेपी में विलय की सियासी चर्चाएं भी हैं, लिहाजा यह भी माना जा रहा है कि उनके दल को बीजेपी में शामिल करने के बाद ही उन्हें मंत्रिमंडल के अगले विस्तार में जगह मिल सकती है.

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह ने इस बार रिकार्ड जीत हांसिल की है. वे लगातार जीत कर अपनी राजनीतिक क्षमता और योग्यता दिखा रहे हैं, किन्तु सियासी कारणों से न तो पिछली बार उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली थी और न ही इस बार मिली है.

देखना दिलचस्प होगा कि विभिन्न प्रमुख नेताओं की नाराजगी के चलते मोदी-शाह टीम अपनी सियासी सोच के सापेक्ष राजस्थान की राजनीतिक तस्वीर कैसे तैयार करती हैं?

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