नजरिया. किसी भी प्रदेश में केन्द्र सरकार की प्रत्यक्ष भूमिका होती ही कितनी है? अभी भी मध्यप्रदेश की सत्ता तो कांग्रेस के पास है, लिहाजा यदि एमपी की कांग्रेस सरकार जनहित के काम करके दिखा दे तो आने वाले समय में कांग्रेस लोकसभा चुनाव की हारी बाजी पंचायत, स्थानीय निकाय आदि चुनावों में पलट सकती है!

एमपी में कांग्रेस को जितना खतरा भाजपा से नहीं है, उससे कई ज्यादा कांग्रेस के भीतर है? कांग्रेस के प्रमुख प्रादेशिक नेताओं को पार्टी से ज्यादा अपनी चिंता है, अपनी राजनीति की चिंता है और इसी कारण से बीजेपी को प्रत्यक्ष मात देने के बजाय पार्टी के भीतर ही अप्रत्यक्ष सियासी रस्साकशी चल रही है! अगर सारे कांग्रेसी एकजुट हो जाएं तो बीजेपी की एकतरफा जीत संभव नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस में ऐसी एकता संभव है?

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने ऐसी ही सियासी बाजी पलट कर साबित किया है कि यदि दृढ़ता से जनहित के प्रायोगिक कार्य किए जाएं तो सबकुछ संभव है. ओडिशा में बीजेपी के तमाम प्रयासों के बावजूद पटनायक ने मोदी लहर को बेअसर कर दिया!

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि विधानसभा चुनाव में एमपी में कांग्रेस की जीत को बीजेपी लोकसभा में हार में बदल सकती है तो कांग्रेस सियासी बाजी क्यों नहीं पलट सकती है? लेकिन, यह तभी संभव है जब कांग्रेस, संगठन के भीतर की राजनीतिक रस्साकशी से मुक्ति पा ले!

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