नजरिया. लोकसभा चुनाव में किंगमेकर की भूमिका से लेकर प्रधानमंत्री पद तक के लिए कांग्रेस को अलग रख कर सपा-बसपा सियासी गठबंधन तैयार करने वाले अब यूपी की सीधी सियासी गणित का उल्टा हिसाब लगाने में व्यस्त हैं कि- क्यों हारे?सीधा-सा हिसाब है... गैर-भाजपाई वोट बंट गए, बिखर गए और ऐसे माहौल में कई गैर-भाजपाई समर्थक उदासीन भी हो गए?

कांग्रेस को प्रधानमंत्री पद में बाधा मानने की मानसिकता के चलते उसे कमजोर करार दे कर सपा-बसपा गठबंधन से अलग रखा गया, परिणाम यह रहा कि गैर-भाजपाई वोटों का बिखराव सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के बीच हो गया.

उल्लेखनीय है कि बीजपी कुछ समय से कई क्षेत्रों में चालीस प्रतिशत से ज्यादा वोट हांसिल करती रही है, मतलब... सारे भाजपा विरोधी वोट एकजुट नहीं हों, तो उसे मात देना आसान नहीं है, बावजूद इसके विपक्षी एकता नहीं हो पाई. पांच से दस प्रतिशत ऐसा दल निरपेक्ष वोटर होते हैं जो समय के सापेक्ष मतदान करते हैं, इन मतदाताओं ने भी बिखराव के बजाय बीजेपी का साथ देना ज्यादा बेहतर समझा!

लोकसभा चुनाव हाथ से निकल जाने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती अब अपनी अगली रणनीति की तैयारियों में जुट गई हैं. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए बना सपा, बसपा और आरएलडी का महागठबंधन, कांग्रेस को अलग रखने के कारण नुकसान में रहा, कांग्रेस के पास तो खोने के लिए कुछ खास नहीं था, किन्तु कांग्रेस के बगैर अपने दम पर बीजेपी को मात देने के सपने, सपने ही रह गए और 80 में से केवल 15 सीटों पर ही जीत मिली. महागठबंधन में शामिल चैधरी अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल का तो इस लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुल पाया, अखिलेश यादव की सपा को 5 और मायावती की बसपा को 10 सीटें मिलीं.

लोकसभा चुनाव में मिली चुनावी पराजय के बाद मायावती ने दिल्ली में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई और उनके सामने अपनी नई रणनीति का खुलासा किया. इस दौरान मायावती ने यूपी में महागठबंधन को लेकर अपने पुराने रुख पर कायम रहने के भी संकेत दिए.

याद रहे, इससे पहले अखिलेश यादव ने भी लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई थी, जिसमें सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भी मौजूद थे.

खबरें हैं कि... बैठक में आए सपा कार्यकर्ताओं ने कहा कि पार्टी के अंदर से ऐसे नेताओं को बाहर किया जाए, जो बड़े पदों पर बैठे हैं और जिनका जमीनी आधार नहीं है. समझा जाता है कि सपा में कुछ बड़े बदला होंगे.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संगठन में कोई भी बदलाव किए जाएं, परन्तु जब तक मतों की गणित के मद्देनजर विपक्षी एकता नहीं बनेगी तब तक केन्द्र की सत्ता तो निकल ही गई है, यूपी की सत्ता भी गैर-भाजपाइयों के हाथ नहीं आएगी?

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