चुनाव-चर्चा. यह तो तय था कि इस बार चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होगी और 200 से ज्यादा सीटे लाएगी, यही नहीं एनडीए को ढाई सौ से ज्यादा सीटें मिलेंगी, लेकिन संघ की सक्रियता और बीजेपी के सियासी प्रबंधन ने चुनावी बाजी पलट दी, बीजेपी अकेले 300 पार हो गई, तो एनडीए 336 का आंकड़ा पार कर गई!

दरअसल, विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी को तगड़ा झटका लगा था, जब तीन प्रमुख राज्यों- एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की प्रादेशिक सत्ता उसके हाथ से निकल गई थी, लेकिन उसके बाद पीएम मोदी टीम सतर्क हो गई और लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए सुधार अभियान शुरू किया. सामान्य वर्ग के मतदाताओं के लिए जहां दस प्रतिशत सवर्ण आरक्षण दिया, वहीं मध्यम वर्ग के लिए आयकर सीमा बढ़ा कर उन्हें खुश करने की कवायद को अंजाम दिया?

बीजेपी को पता था कि यूपी में वह 2014 नहीं दोहरा पाएगी, इसलिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा जैसे राज्यों को फोकस किया, नतीजा यह रहा कि छोटे घाटे की बड़ी भरपाई हो गई!

बीजेपी को सबसे बड़ा फायदा मिला गैर-भाजपाई वोटों के बिखराव का, सारे विपक्षी दल विपक्षी एकता की तो बात करते रहे, किन्तु सब अपनी-अपनी सियासी गणित में ही उलझे रहे, जिनके पास दो दर्जन सीटें जीतने की भी क्षमता नहीं थी, वे प्रधानमंत्री बनने की गणित में लगे रहे, नतीजा- सबके सामने है?  

इस चुनाव में बीजेपी को हिंदी पट्टी में तो थोड़ा नुकसान हुआ, किन्तु पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों में कामयाबी मिल गई, अलबत्ता केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पंजाब जैसे राज्य बीजेपी की पकड़ में नहीं आए.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा था, किन्तु यहां सपा-बसपा ने कांग्रेस को दूर रख कर गठबंधन कर डाला, परिणाम यह रहा कि बीजेपी बड़े नुकसान से बच गई.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली है जहां उसे डेढ़ दर्जन से ज्यादा सीटें मिल रही है. यहा भी ममता बनर्जी एकला चालों की नीति पर चली जिसका असर यह रहा कि टीएमसी को तगड़ा सियासी झटका लगा.

एक्कीस लोकसभा सीटों वाले ओडिशा में भी बीजेपी ने बहुत ताकत लगाई थी, वहां आधा दर्जन के करीब सीटें बीजेपी को मिल रही हैं.

सबसे मजेदार स्थिति रही कर्नाटक की रही जहां कुछ प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को अपने फायदे के आगे केन्द्रीय नेतृत्व की सियासी जरूरत ही समझ नहीं आ रही थी, इसका असर यह रहा कि कांग्रेस-जेडीएस की संयुक्त सियासी ताकत भी बेअसर रही.  

बिहार में बीजेपी ने जीती हुई सीटों का नुकसान उठा कर भी जेडीयू से समझौता किया, हालांकि वैचारिक धरातल पर बीजेपी-जेडीयू में समानता नहीं है, इसलिए ये दोनों दल कब तक साथ रहेंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन अभी तो इनके हिस्से में कामयाबी आ गई है.

इसी तरह चुनावी मौके की नजाकत देखते हुए बीजेपी ने महाराष्ट्र में शिवसेना की शर्तों पर समझौता किया और महाराष्ट्र हाथ से निकलने से बचा लिया.

गुजरात विधानसभा चुनाव तक बीजेपी की सियासी तस्वीर खराब हो गई थी, किन्तु लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के गृहराज्य के कारण बीजेपी 2014 दोहराने में कामयाब रही.

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में सीटें तो कम थी, पर बीजेपी की पकड़ मजबूत रही. यही नहीं, तेलंगाना में भी बीजेपी के लिए संभावनाओं के द्वार खुले.

राजस्थान और मध्य प्रदेश, दो ऐसे राज्य हैं जहां विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हाथ से सत्ता निकल गई थी, लेकिन इन दोनों राज्यों में संघ बेहद मजबूत है. संघ की समर्पित सक्रियता से इन दोनों राज्यों में बीजेपी की कामयाबी का परचम लहराया है.

राजधानी दिल्ली में तो आप और कांग्रेस के गठबंधन का सियासी नाटक अंत समय तक चलता रहा, जिसके कारण बीजेपी 2014 दोहराने में सफल रही.

बहरहाल, गैर-भाजपाइयों को अपनी सियासी गलतियों का अहसास तो हो गया होगा, देखना दिलचस्प होगा कि आगे आने वाले चुनावों में इस हार से कुछ सबक ले पाते हैं या नहीं?

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