व्यक्ति वास्तु शास्त्र के नियम अनुसार यदि निवास करता है तो समस्त बाधाए समाप्त हो जाती है. वास्तु शास्त्र प्राचीन वैज्ञानिक जीवन शैली है वास्तु विज्ञान सम्मत तो है ही साथ ही वास्तु का सम्बन्ध ग्रह नक्षत्रों एवम धर्म से भी है ग्रहों के अशुभ होने तथा वास्तु दोष विद्यमान होने से व्यक्ति को बहुत भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है. वास्तु शास्त्र अनुसार पंच तत्वों पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश और वायु तथा वास्तु के आठ कोण दिशाए एवम ब्रह्म स्थल केन्द्र को संतुलित करना अति आवश्यक होता है जिससे जीवन हमारा एवं परिवार सुखमय रह सके.

वास्तु शास्त्र के कुछ नियम रोग निवारण में भी सहायक सिद्ध होते है… आपको विस्मय होना स्वाभाविक है जो रोग राजसी श्रेणी में आ कर फिर की समाप्त नहीं होता बल्कि केवल दवाईयों के द्वारा नियंत्रित हो कर जीवन भर हमें दंड देता रहता है वही मधुमेह को हमारे ऋषि मुनिओं ने वास्तु शास्त्र के द्वारा नियंत्रण की बात तो दूर है पूरी तरह से सफाया करने पर अग्रसित हो रहा है दुर्भाग्य कि बात है कि हम विशवास नहीं करते आपकी बात बिलकुल सही है इससे पहले मै भी कभी विशवास नहीं रखता था लेकिन जब से वास्तु शास्त्र के नियम मेने अपने घर एवं अपने व अपने परिवार के लोगों पर लगाए तो कुछ समय बाद मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा मै शत प्रतिशत सफल हुआ आज में समाज की भलाई के लिए साथ ही यह भी बताने का पूरा प्रयास करूँगा की आधुनिक दौड़ में अपने पीछे कि सभ्यता को भी याद रखे जो कि सटीक व हमारे जीवन में शत प्रतिशत कारगर सिद्ध होती आई है. वास्तु सही रूप से जीवन की एक कला है क्योंकि हर व्यक्ति का शरीर उर्जा का केन्द्र होता है. जंहा भी व्यक्ति निवास करता है वहाँ कि वस्तुओं की उर्जा अपनी होती है और वह मनुष्य की उर्जा से तालमेल रखने की कोशिश करती है. यदि उस भवन/स्थान की उर्जा उस व्यक्ति के शरीर की उर्जा से ज्यादा संतुलित हो तो उस स्थान से विकास होता है शरीर से स्वस्थ रहता है सही निर्णय लेने में समर्थ होता है सफलता प्राप्त करने में उत्साह बढता है,धन की वृद्धि होती है जिससे समृधि बढती है यदि वास्तु दोष होने एवं उस स्थान की उर्जा संतुलित नहीं होने से अत्यधिक मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती. वह व्यक्ति अनेक व्याधियो व रोगों से दुखी होने लगता है अपयश तथा हानि उठानी पडती है.

भारत में प्राचीन काल से ही वास्तु शास्त्र को पर्याप्त मान्यता दी जाती रही है. अनेक प्राचीन इमारतें वास्तु के अनुरूप निर्मित होने के कारण ही आज तक अस्तित्व में है. वास्तु के सिद्धांत पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं, क्योंकि इस शास्त्र् में हमें प्राप्त होने वाली सकारात्मक ऊर्जा शक्तियों का समायोजन पूर्ण रूप से वैज्ञानिक ढंग से करना बताया गया है.

वास्तु विषय में दिशाओं एवं पंच-तत्त्वों की अत्यधिक उपयोगिता है. ये तत्त्वं जल-अग्नि-वायु-पृथ्वी-आकाश है. भवन निर्माण में इन तत्त्वों का उचित अनुपात ही, उसमें निवास करने वालों का जीवन प्रसन्नए एवं समृद्धिदायक बनाता है. भवन का निर्माण वास्तु के सिद्धांतों के अनुरूप करने पर, उस स्थल पर निवास करने वालों को प्राकृतिक एवं चुम्बकीय ऊर्जा शक्ति एवं सूर्य की शुभ एवं स्वास्थ्यपद रश्मियों का शुभ प्रभाव पाप्त होता है. यह शुभ एवं सकारात्मक प्रभाव, वहाँ पर निवास करने वालों के सोच-विचार तथा कार्यशैली को विकासवादी बनाने में सहायक होता है, जिससे मनुष्य की जीवनशैली स्वस्थ एवं प्रसन्नचित रहती है और बौद्धिक संतुलन भी बना रहता है. ताकि हम अपने जीवन में उचित निर्णय लेकर सुख-समृद्धिदायक एवं उन्नतिशील जीवन व्यतीत कर सकें.

जब तक मनुष्य के ग्रह अच्छे रहते हैं वास्तुदोष का दुष्प्रभाव दबा रहता है पर जब उसकी ग्रहदशा निर्बल पड़ने लगती है तो वह वास्तु विरुध्द बने मकान में रहकर अनेक दुःखों, कष्टों, तनाव और रोगों से घिर जाता है. इसके विपरीत यदि मनुष्य वास्तु शास्त्र के अनुसार बने भवन में रहता है तो उसके ग्रह निर्बल होने पर भी उसका जीवन सामान्य ढंग से शांति पूर्ण चलता है.

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