मैरिज काउंसलिंग शादीशुदा जोड़ों के लिए की जाने वाली एक तरह की साइकोथेरेपी है जिसके जरिए उनके रिश्ते में आने वाली समस्याओं को दूर करने की कोशिश की जाती है. इसके तहत पति-पत्नी (या दोनों पार्टनर) एक साथ पेशेवर मनोवैज्ञानिक, काउंसलर या थेरेपिस्ट के पास जाते हैं और वो रिश्ते सुधारने की दिशा में दोनों की मदद करता है.

क्लीनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ. नीतू राणा के मुताबिक उनके यहां आने वाला हर 10 में से एक मामला मैरिज काउंसलिंग से जुड़ा होता है. आम तौर पर वो साइकॉलजिस्ट और थेरेपिस्ट मैरिज काउंसलिंग करते हैं जिन्होंने इसके लिए खास प्रशिक्षण लिया है. हर साइकॉलजिस्ट की अलग-अलग दक्षता होती है. इनमें से कई लोग 'मैरिज और फैमिली काउंसलिंग' में विशेषज्ञता हासिल करते हैं.

भारत के अलग-अलग संस्थान छात्रों को मनोविज्ञान और 'मैरिज और फ़ैमिली काउंसलिंग' से जुड़ी ट्रेनिंग देते हैं. उदाहरण के तौर पर नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज़ (NIMHANS) भी फैमिली थेरेपी ट्रेनिंग देता है.

डॉ. नीतू राणा के मुताबिक मैरिज काउंसलिंग के कुछ तय नियम होते हैं जो थेरेपिस्ट दोनों पार्टनरों को पहले सेशन में बता देता है. मसलन:

- साइकॉलजिस्ट एक थर्ड पार्टी है जो पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ है. वो दोनों पार्टनरों में से किसी एक की तरफ नहीं झुक सकता.

- साइकॉलजिस्ट न तो किसी पार्टनर को जज करेगा और न ही उनके रिश्ते या रिश्ते की समस्याओं को.

- साइकॉलजिस्ट किसी एक को सही या गलत नहीं ठहराएगा.

- साइकॉलजिस्ट दोनों से एक साथ बात भी करेगा और एक-एक करके अलग-अलग भी.

- साइकॉलजिस्ट दोनों पक्षों में से किसी से जुड़ी जानकारी कहीं और शेयर नहीं करेगा

मैरिज काउंसलिंग में आम तौर पर दो तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है:

1) सिस्टमेटिक थेरेपी- इसमें लोगों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की तह तक जाकर उनकी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की जाती है.

उदाहरण के तौर पर, अगर एक पार्टनर ऐसे परिवार से आता है जहां उसके माता-पिता दोनों अपने काम में बेहद व्यस्त रहते थे, उसकी जिंदगी में दखल नहीं देते थे और दूसरा पार्टनर ऐसे परिवार से आता है जहां बच्चों को हमेशा माता-पिता की देखरेख में रखा गया तो जाहिर दोनों के स्वभाव में अंतर होगा.

ऐसी स्थिति में थेरेपिस्ट दोनों के बीच मतभेद के बीच छिपी वजहों की पड़ताल करता है और उन्हें हल करने की कोशिश करता है.

2) बिहेवियरल थेरेपी- इसमें थेरेपिस्ट ज्यादा पीछे नहीं जाता और न ही मतभेद के वजहों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि की पड़ताल करता है. वो सीधे लोगों के बर्ताव की पड़ताल करता है और उसे बदलने या सुधारने की कोशिश करता है.

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