खबरार्थ. वर्ष 2014 में देश की जनता ने नरेन्द्र मोदी को अकल्पनीय समर्थन दिया था, जिसकी बदौलत वे बीजेपी की पहली पूर्ण बहुमत की केन्द्र सरकार के प्रधानमंत्री बने, जनता ने उनके अच्छे दिनों के वादों-इरादों पर विश्वास किया? लेकिन, जैसे-जैसे समय गुजरता गया, वे सियासी लोकप्रियता के शिखर से नीचे आते गए, तब पलपल इंडिया ने सबसे पहले लिखा था कि- जनता का पीएम मोदी के वादों-इरादों से भरोसा लड़खड़ा रहा है और 2019 के चुनाव में पीएम मोदी को 2014 जैसा अवसर नहीं मिलेगा!

खबर है कि... अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने कवर पेज पर जगह तो दी है, परन्तु इसमें विवादास्पद सवाल भी है कि- क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से मोदी को पांच साल का मौका देने को तैयार है?

मैगजीन का जवाब है कि- बेशक मोदी फिर से चुनाव जीतकर सरकार बना सकते हैं, लेकिन अब उनमें 2014 वाला करिश्मा नहीं है? तब वे मसीहा थे! लोगों की उम्मीदों के केंद्र में थे, एक ओर उन्हें हिंदुओं का सबसे बड़ा प्रतिनिधि माना जा रहा था, तो दूसरी ओर लोग उनसे साउथ कोरिया जैसे विकास की उम्मीद कर रहे थे, किन्तु इससे उलट अब वे केवल एक राजनेता हैं, जो अपने तमाम वादों को पूरा करने में असफल रहे हैं!

जाहिर है, कोई चमत्कार ही अब नरेन्द्र मोदी को 2014 वाली कामयाबी दिला सकता है और इसीलिए बड़ा सवाल है कि- क्या महान प्रधानमंत्री बनने का अवसर गंवा चुके हैं पीएम नरेन्द्र मोदी?

क्योंकि, पीएम मोदी इन पांच वर्षों में कोई भी सर्वमान्य उपलब्धियां हांसिल नहीं कर सके हैं, जैसी कि- पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के साथ युद्ध करके हांसिल की थी या फिर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण करके प्राप्त की थी, इसलिए माना जा रहा है कि अब पीएम मोदी के लिए 2014-19 जैसे अच्छे दिन नहीं आएंगे और वे महान प्रधानमंत्री बनने का अवसर गंवा चुके हैं!

ऐसा क्यों हुआ? इस पर भी समय-समय पर पलपल इंडिया सबसे पहले लिख चुका है!

इस मैगजीन का मानना है कि 2014 में लोगों को आर्थिक सुधार के बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले मोदी अब इस बारे में बात भी नहीं करना चाहते? अब उनका सारा जोर हर नाकामी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराकर लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना का संचार करना है! 

मैगजीन का कहना है कि- यह जरूर है कि लोगों को एक बेहतर भारत की उम्मीद थी, लेकिन मोदी के कार्यकाल में अविश्वास का दौर शुरू हुआ. अपनी नाकामियों के लिए अक्सर कांग्रेस के पुरोधाओं को निशाना बनाने वाले मोदी जनता की नब्ज को बेहतर समझते हैं. यही कारण है कि जब भी उलझन महसूस करते हैं, तो स्वयं को गरीब का बेटा बताने से नहीं चूकते? तीन तलाक को खत्म करके उन्होंने मुस्लिम महिलाओं का मसीहा बनने की कोशिश भी की!

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2019 चुनाव में एक ओर राष्ट्रवाद का मुद्दा है, तो दूसरी ओर रोटीवाद का मुद्दा है, इसलिए चुनावी नतीजे देश की नई राजनीतिे दिशा तय करेंगे कि क्या केवल लोकप्रियता के दम पर ही चुनाव जीता जा सकता है? 

क्योंकि, पीएम मोदी सरकार की उपलब्धियां तो कुछ खास हैं नहीं, इसलिए यह देखना भी दिलचस्प होगा कि पीएम मोदी टीम का पाॅलिटिकल मैनेजमेंट चुनावी परिणामों को कितना प्रभावित कर पाता है?

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